मन में लगाओ झाड़ू यार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हमारे इस नवजात मोदी युग में मुदित हो रहे मंत्री से लेकर सरकारी संतरी तक सब सफाई के सफर में डंड-झाड़ू थामकर ऐसी शैली में सामूहिक अभियान में समायोजित हो गए कि मीडियाई कैमरों की जद में आकर विशिष्ट दृष्टिगोचर हो सकें। देखने में आया कि कूड़ा केंद्रित स्थल एक था, किंतु सफाई कर्म के अभिनेता अनेक। ऐसे अनेक हाथों में झाड़ुएं परस्पर इस कदर टकराती दिखीं, जैसे वे दावा ठोक रही हों कि ये वाला कूड़ा तेरे नहीं, मेरे श्रम का होने वाला शिकार है। यह भी दिखा कि उस 'बिखरे शिकार' को समेटने की जगह नेता और अभिनेता नई सींकों वाली झाड़ुओं से सहला रहे थे। कूड़े-कीचड़ के अन्य स्रोतों तक तो ध्यान ही नहीं जा रहा था।
सोचने की जरूरत है कि अगर पान-तंबाकू-गुटखा चबाना छोड़ दें, तो दीवारें व फर्श पीक-पिचकारी से कत्थई नहीं दिखेंगी। अगर केले और मूंगफली के छिलकों को कूड़ेदान में डालने की चेतना पैदा हो जाए, तो सरेराह न कोई गिरेगा, न ही पैरों तले किर्च-किर्च की तान बजेगी।
समस्या की जड़ में तो हम झांकते ही नहीं। हालांकि दफ्तरों और सार्वजनिक जगहों पर तंबाकू के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, पर इसका कितना पालन होता है, यह सबको पता है। और कई तरह से फैलता है कूड़ा। जैसे चुनावी जीत पर, ईद-दशहरा-दिवाली पर, झांकियों पर, बाराती जुलूसों पर अनार-बम-पटाखों की झुलसी चिंदियां, अजगर जैसी कुंडली मारने वाली विशाल मालाओं की उतरन, जूठन भरे पत्तल और पॉलिथीन की पन्नियां-इन सब कूड़ा कारकों का निस्तारण कहां-कहां करेंगे स्वच्छता प्रेमी।
यहां मुझे भक्तिकालीन एक कवि याद आते हैं, मन मंदिर में गाफिला झाड़ू रोज लगाया कर। दिल्ली में चुनाव की सुगबुगाहट से सक्रिय केजरीवाल जी भी यह बात गांठ बांध लें। वास्तव में झाड़ू तो अज्ञानता और दुर्भावना की गंदगी पर चलनी चाहिए। पर गंदगी साफ करने के बजाय झाड़ू मारते हुए फोटो खिंचवाने को आतुर हमारे राजनेताओं का ध्यान इस ओर जाता ही नहीं।