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सुशीला मोहन मार्ग: बल्लीमारान की बस्ती में सुशीला दीदी की यादें
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अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली में फतेहपुरी से चांदनी चौक, घंटाघर तक जाने वाली सड़क का नाम 'सुशीला मोहन मार्ग’ रखा गया था, पर यहां सुशीला मोहन के बारे में कोई नहीं जानता। कुछ समय पहले दिल्ली के वयोवृद्ध पूर्व सांसद (अब स्वर्गीय) शिवचरण गुप्ता ने दिल्ली के मेयर डॉ. कंवरसेन को एक पत्र लिखकर मांग की थी कि 'सुशीला मोहन मार्ग’ के दोनों सिरों पर एक पट्टिका लगाई जाए, जिसमें उनके बारे में संक्षिप्त विवरण अंकित हो।
यदि यह इबारत लिख दी गई, तो भी किसे फुर्सत होगी कि वह उसे पढ़ सके। यह जानना कितना रोमांचकारी है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय काकोरी के मुकदमे की पैरवी के लिए सुशीला दीदी ने अपनी शादी के लिए रखा हुआ दस तोला सोना दान में दे दिया था। लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने वाले ब्रिटिश पुलिस अफसर साण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह जब दुर्गा भाभी के साथ छद्म वेश में कलकत्ता पहुंचे, तब वहां रेलवे स्टेशन पर उनका स्वागत करने सुशीला दीदी और भाभी के पति शहीद भगवतीचरण ही पहुंचे थे।
उन दिनों दीदी कलकत्ता में सेठ सर छाजूराम चौधरी की बेटी सावित्री की गृह शिक्षिका थीं। छाजूराम को अंग्रेज सरकार ने ‘सर’ की उपाधि दी थी। पर उन्होंने अपनी बेटी को मिशनरी स्कूल न भेज जालंधर कन्या महाविद्यालय से ऐसी शिक्षिका की मांग की, जो उनके घर रहकर उसे राष्ट्रीय संस्कारों की शिक्षा दे सके। वहां की प्रधानाचार्या शन्नो देवी ने सुशीला दीदी को छाजूराम जी के घर भेज दिया।
सुशीला दीदी ने कभी एक गीत लिखा था-जुग-जुग गगन लहरावे झंडा भारत दा। देशबंधु चित्तरंजन दास एक बार लाहौर आए, तो दीदी ने सार्वजनिक सभा में अपना यह पंजाबी गीत सुनाया, जिस पर देशबंधु रो पड़े। भारत-कोकिला सरोजनी नायडू भी उनका गीत सुनकर भाव विभोर हो उठी थीं। पांच मार्च, 1905 को पंजाब के दत्तोचूहड़ (अब पाकिस्तान) में जन्मीं दीदी की शिक्षा जालंधर के आर्य कन्या महाविद्यालय में हुई।
पिता सेना में डॉक्टर थे, पर विचारों से आर्य समाजी। मां बचपन में ही नहीं रहीं, इसलिए सभी बच्चे गुजरांवाला में अपने चाचा के यहां रहते थे। उसी दौरान पंजाब से कुछ छात्राओं का एक दल देहरादून हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिस्सेदारी करने गया, जिनमें दीदी भी थीं। वहां उनकी मुलाकात लाहौर के नेशनल कॉलेज से आए छात्रों से हुई, जो भगत सिंह आदि से परिचित थे। उसके बाद दीदी, भगवतीचरण और उनकी पत्नी दुर्गा देवी (भाभी) से मिलीं और क्रांतिकारी दल से जुड़ गईं।
19 दिसंबर, 1927 को काकोरी के चार क्रांतिकारियों की फांसी की सजा का समाचार सुनकर बीए का पहला पर्चा देते हुए दीदी परीक्षा हॉल में बेहोश हो गई थीं। उस केस के क्रांतिकारियों को जेल से छुड़ाने के लिए उन्होंने अपनी सोने की चूड़ियां उतारकर दे दीं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के केंद्रीय असेंबली में विस्फोट करने के लिए जाने से पहले लाहौर से दिल्ली पहुंचकर दीदी और भाभी ने सुखदेव के साथ कश्मीरी गेट के पास पहुंचकर इन दोनों क्रांतिकारियों को अपने रक्त से तिलक कर अश्रुपूर्ण विदाई दी थी।
असेंबली बम केस के लिए वह चंदा जमा करने कलकत्ता पहुंचीं। वहां उन्होंने अपनी महिला टोली के साथ मेवाड़ पतन नाटक का मंचन करके 12 हजार रुपये जमा किए। फिर दीदी ने दिल्ली आकर वायसराय की ट्रेन के नीचे बम विस्फोट से पहले स्टेशन पर वायसराय के डिब्बे का निरीक्षण कर जरूरी सूचनाएं एकत्र कीं। भगत सिंह के साथ 63 दिन के अनशन में शहीद होने वाले यतींद्रनाथ दास का शव लाहौर से कलकत्ता पहुंचा, तो दीदी ने उनकी आरती उतारी थी।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल से छुड़ाने की योजना बनने पर दीदी पूरे समय दल के काम में लग गईं। भगवतीचरण के बम परीक्षण करते हुए शहीद होने के बाद उन पर दो गिरफ्तारी वारंट और इनाम था। फिर भी 1932 में प्रतिबंधित कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में वह 'इंदु’ नाम से एक महिला टोली का नेतृत्व करते हुए जेल गईं। वर्ष 1933 में दीदी ने दिल्ली के अपने सहयोगी वकील श्याम मोहन से विवाह कर लिया।
1942 के आंदोलन में वह पति के साथ जेल गईं। इस वीरांगना को कभी झांसी वाले क्रांतिकारी पं. परमानंद ने ‘भारत की जोन ऑफ आर्क’ कहा था। आजादी के बाद दीदी ने पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में एक शिल्प विद्यालय का संचालन शुरू किया। वह दिल्ली की हरिजन बस्तियों में भी खूब काम करती थीं। वहां उन्होंने कई सौ स्त्रियों को प्रशिक्षण देकर इस लायक बनाया कि वे 60 रुपये मासिक कमाने लगीं। कलकत्ता में उन्होंने एक नवजात अनाथ शिशु को भी गोद लिया और पाला।
दीदी दिल्ली नगर निगम में कुछ समय 'एल्डर पर्सन’ रहीं और दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष भी। यहीं 13 जनवरी, 1963 को उनका निधन हुआ। मैं दीदी की स्मृतियों को चुनता हुआ बल्लीमारान की सड़क के पिछले छोर पर आ गया हूं, जहां उनके द्वारा संचालित शिल्प विद्यालय की इमारत ध्वस्त हो चुकी है। दीदी जिस कमरे में बैठती थीं, उसमें ताला पड़ा है। यह परिसर अब डीसीएम के कब्जे में है। सामने के रास्ते पर नगर निगम के पार्क में दीदी की एक प्रतिमा लगाकर उसे ‘सुशीला मोहन पार्क’ बना दिया गया है।