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सरोगेसी पर सवाल: श्रम बिकाऊ है, शरीर नहीं 

Thu, 10 Feb 2022 08:35 AM IST
taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 10 Feb 2022 08:35 AM IST
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सार
पुराने जमाने से आज तक यही चलन बना हुआ है कि जो व्यक्ति भीड़ से अलग खड़ा होता है, जो आदमी बहुमत से भिन्न विचार व्यक्त करता है, उसे विवादास्पद और गलत बता दिया जाता है।
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surrogacy: Labor is for sale, not the body read Taslima Nasreen article
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

एक स्वस्थ समाज वह है, जहां तर्क-वितर्क की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाता है। तर्क-वितर्क को प्रोत्साहित किया जाता है, और समाज के लोग इनमें सहभागिता करते हैं, तो मस्तिष्क सक्रिय होता है। ऐसे में, दुविधाग्रस्त लोग भी उनके साथ खड़े होने का साहस दिखाते हैं, जिनके तर्क में दम होता है। लेकिन मुश्किल यह है कि हमारा समाज तर्क-वितर्क को अच्छा नहीं मानता। वह अक्सर बगैर तर्क-वितर्क के उस पक्ष को सही मान लेने का अभ्यस्त हो चुका है, जो पक्ष बड़ा और प्रतिष्ठित होता है तथा जिसके पक्ष में अधिकांश लोग खड़े होते हैं। 



पुराने जमाने से आज तक यही चलन बना हुआ है कि जो व्यक्ति भीड़ से अलग खड़ा होता है, जो आदमी बहुमत से भिन्न विचार व्यक्त करता है, उसे विवादास्पद और गलत बता दिया जाता है। मनुष्य बहुमत से अलग विचार से डरता है, कोई खुद को विवादास्पद नहीं बनाना चाहता। यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है, यह तो एक बंद जलाशय की तरह है। मैं जब बहुमत से अलग विचार व्यक्त करती हूं, तो समाज के सभी स्तरों के लोग मुझे निशाना बनाते हैं। विवादास्पद बताकर वे मुझे दूसरों से अलग करते हैं। जैसे, समाज किसी का हुक्का-पानी बंद कर देता है, वैसी ही स्थिति मेरी है।


भारत का समाज बांग्लादेश के समाज से बहुत अलग नहीं है। धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाने पर यहां भी लोग मुझे अजीब निगाहों से देखते हैं। बांग्लादेश ने मुझे जिस तरह अपने से अलग कर दिया है, भारत में भी कमोबेश वैसी ही स्थिति है। कुछ ही दिनों पहले मैंने सरोगेसी के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे। चूंकि मेरे विचार प्रतिष्ठित व्यक्तियों के विचार से नहीं मिलते, इसलिए लोगों ने मुझे निशाना बनाना शुरू कर दिया। सरोगेसी पर समाज का बहुमत यह है कि धनी और व्यस्त महिलाएं अगर पैसे देकर गरीब महिलाओं की कोख किराये पर लेती हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इससे जहां धनी महिलाओं की इच्छा पूरी हो जाती है, वहीं गरीब महिलाओं को भी अपनी कोख किराये पर देने की अच्छी-खासी कीमत मिल जाती है। लेकिन मैं सरोगेसी का समर्थन नहीं करती। मेरा मानना यह है कि किसी के शरीर की बिक्री नहीं की जा सकती, किराया चुकाकर उसके शरीर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। श्रम बिकाऊ है, शरीर नहीं। भारत में सरोगेसी के जरिये संतान प्राप्त करना कोई नई बात नहीं है। बॉलीवुड की नायिकाओं या नायकों की स्त्रियों द्वारा सरोगेसी के माध्यम से संतान प्राप्त करने की सूचनाएं जब-तब आती रहती हैं। यहां तक कि दूसरे धनी देशों से भी लोग भारत में गरीब महिलाओं की कोख किराये पर लेने आते हैं। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। मैं मानती हूं कि सरोगेसी एक चमत्कारिक वैज्ञानिक आविष्कार है। लेकिन सरोगेसी का चलन तभी तक रहेगा, जब तक दुनिया में गरीबी रहेगी। धनी लोग नौ महीने के लिए गरीब महिलाओं की कोख किराये पर लेते हैं।

दूसरी तरफ कभी कोई धनी महिला अपनी कोख किराये पर नहीं देगी, क्योंकि गर्भावस्था के तमाम जोखिम होते हैं, शिशु के जन्म के समय भी खतरा कोई कम नहीं रहता। जाहिर है, दरिद्रता के कारण ही गरीब महिलाएं जान-बूझकर यह जोखिम उठाती हैं। धनी महिलाएं ऐसा जोखिम भला क्यों उठाना चाहेंगी? गरीब महिलाएं या उनका परिवार भी विवश होकर ही ऐसा जोखिम उठाता है। और यह भी तय है कि हर गरीब महिला यह जोखिम नहीं उठाती। धनी और व्यस्त महिलाओं को अगर बच्चे ही चाहिए, तो वे अनाथ बच्चों को गोद ले सकती हैं। आखिर अनाथ बच्चों को गोद लेने का चलन दुनिया भर में है ही। लेकिन नहीं, सरोगेसी की इच्छुक महिलाएं अपने जीन के साथ रेडिमेड बच्चा चाहती हैं।

सरोगेसी का समर्थन मैं तभी करूंगी, जब सिर्फ दरिद्र स्त्रियां ही नहीं, बल्कि धनी महिलाएं भी दूसरों को अपना कोख इस्तेमाल करने देंगी, पैसों के लिए नहीं, बल्कि उन महिलाओं की मदद करने के लिए, जो संतान जन्म देने में अक्षम हैं। सरोगेसी एक अद्भुत वैज्ञानिक आविष्कार है, लेकिन सिर्फ गरीब महिलाओं की कोख ही इसकी प्रयोगशाला क्यों बने? इसी तरह मैं बुर्के को भी मान लूंगी, लेकिन तब, जब पुरुष भी बुर्का पहनेंगे। ऐसे ही वेश्यालयों का समर्थन करूंगी, जब जगह-जगह पुरुष वेश्यालय भी खुलें। ऐसा नहीं होता है, तो इसका मतलब यही है कि सरोगेसी, बुर्का और वेश्यालय वस्तुतः स्त्रियों और गरीबों के शोषण के ही औजार हैं।

मैंने जैसे ही सरोगेसी के खिलाफ अपना मत व्यक्त किया, समाज के बंद जलाशय से मानो लहरें उठने लगीं। चूंकि पितृसत्तात्मक समाज स्त्री के शरीर को बिकाऊ समझता है, इसलिए वह सरोगेसी को अनुचित नहीं मानता। समाज का मानना है कि धनी महिलाओं को कोख किराये पर लेने का अधिकार होना चाहिए। कोई उस दरिद्र स्त्री के बारे में नहीं सोचता, जो सिर्फ पैसे के लिए इतना बड़ा जोखिम उठाती है। सरोगेसी के समर्थकों का कहना है कि कोख किराये पर लेने का अच्छा-खासा पैसा दिया जाता है। यह समृद्ध समाज का वही पुराना तर्क है, जिसके तहत गरीब अगर पैसों के बदले जीवन का जोखिम उठाते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत या अनैतिक नहीं है। हालांकि जो समाज वेश्यालय का समर्थन करता है, वह समाज किराये की कोख का भी समर्थन करेगा ही। कुछ लोग सरोगेसी को उचित ठहराने के लिए कहते हैं कि गरीब महिलाएं ही पैसे के लिए अपनी कोख किराये पर देती हैं, उनसे जबर्दस्ती नहीं की जाती। पैसे के लिए अपना शरीर बेचने वाली महिलाओं के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे अपनी इच्छा से ऐसा करती हैं। यह कुतर्क है। 

सच्चाई यह है कि कोई महिला अपना शरीर या अपनी कोख विवशता में ही बेचती हैं। मीडिया का कहना है कि चूंकि बॉलीवुड की नायिका प्रियंका चोपड़ा ने सरोगेसी के जरिये संतान जन्म दिया है, इसलिए सरोगेसी के खिलाफ विचार व्यक्त कर दरअसल मैंने उन्हें निशाना बनाया है। ऐसा कतई नहीं है। मैं समाज में व्याप्त प्रवृत्तियों के खिलाफ बोलती-लिखती हूं, किसी व्यक्ति को निशाना बनाना मेरा उद्देश्य नहीं है। इसलिए खुद पर होते हमले से भी मैं असहज नहीं हूं। मैं चाहती हूं कि एक दिन इस दुनिया में ऐसी समानता आए कि पैसे के लिए किसी गरीब महिला को अपना शरीर या अपनी कोख बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।

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