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न्यायपालिका: संसद की सर्वोच्चता पर मुहर, केशवानंद भारती निर्णय के आगे एक बड़ी छलांग

Tue, 12 Dec 2023 07:43 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Tue, 12 Dec 2023 07:43 AM IST
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सार
केंद्र के अधिकारों को मजबूती देने के साथ न्यायपालिका की सीमा निर्धारित करने वाला यह फैसला केशवानंद भारती के आगे एक बड़ी छलांग है।
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Supreme Court Verdict on Article 370 abrogation strengthens rights of Centre, determine limits of judiciary
अनुच्छेद 370 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मार्क ट्वेन ने कहा था कि सच के जूते पहनने तक झूठ आधी दुनिया का सफर तय कर लेता है। अनुच्छेद-370 संविधान के अध्याय-21 का हिस्सा है, जिसका शीर्षक 'अस्थायी और संक्रमणकालीन' है। इस अस्थायी प्रावधान को स्थायी बताने के झूठ का पर्दाफाश करने में सात दशक लग गए। इस मामले में शीर्ष अदालत के न्यायिक फैसले से घड़ी की सुइयों को पीछे ले जाना मुश्किल था। संविधान पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के साथ बाकी चार जजों में से तीन आने वाले समय में शीर्ष अदालत के प्रधान न्यायाधीश होंगे। सभी पांच जजों ने सर्वसम्मति से फैसला देकर संविधान के तहत संसद और राष्ट्रपति की सर्वोच्चता पर मुहर लगाई है।



इस फैसले में कुछ बातें बड़ी साफगोई से कही गई हैं। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और विलय के बाद राज्य के पास कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं बची थी। अनुच्छेद-356 के तहत राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति और संसद राज्य की विधानसभा के अधिकारों को टेकओवर कर सकते थे। संविधान सभा का अस्तित्व खत्म होने के बाद अनुच्छेद-370 को हटाने के लिए जनमत संग्रह की कोई जरूरत नहीं थी। भारतीय संविधान के तहत राज्य के किसी हिस्से को केंद्र-शासित प्रदेश में बदलने के लिए संसद और केंद्र सरकार को अधिकार हासिल हैं। इसलिए लद्दाख को बगैर विधानसभा के केंद्रशासित प्रदेश बनाने का फैसला सही है। सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन के अनुसार जल्द चुनाव होंगे। इसलिए जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने और अनुच्छेद-3 की व्याख्या के मामले पर शीर्ष अदालत ने फिलहाल फैसला नहीं दिया है।


न्यायमूर्ति कौल ने दक्षिण अफ्रीका के जुलू कबीले में प्रचलित उबंटू प्रथा को उद्धृत करते हुए करुणा और क्षमा के मानवीय आधार पर फैसला लिखा है। दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी का गहरा नाता था। तथ्यों और सच की जांच करने वाले आयोग से कश्मीर में भरोसा बढ़ेगा या नफरत की कहानियां? सोशल मीडिया में झूठ और फरेब के दौर में इसका फैसला जनता की अदालत में ही होगा। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक माना जाता है, लेकिन वह हर मर्ज की दवा नहीं है। कुछ लोग इस फैसले की नैतिकता के आधार पर आलोचना कर रहे हैं।

हकीकत यह है कि अनुच्छेद-370 कश्मीर में भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण का सबसे बड़ा माध्यम बन गया था। नेताओं, आंदोलनकारियों और बड़े वकीलों को यह समझने की जरूरत है कि सच या झूठ के नैरेटिव को गढ़ने के लिए अदालतों के बेजा इस्तेमाल से संविधान के साथ लोकतंत्र कमजोर होता है। फैसले के बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और घुसपैठ से पीड़ित कश्मीर में अनिश्चितता के बादल छटेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार के अधिकारों को मजबूती देने के साथ न्यायपालिका की सीमा निर्धारित करने वाला यह फैसला केशवानंद भारती के आगे एक बड़ी छलांग है।

370 की तर्ज पर किसी भी क्षेत्र या वर्ग के लिए विशिष्ट प्रावधान बनाना आसान है, लेकिन उन्हें खत्म करना कठिन है। इससे नेताओं और सरकारों को चेतना जरूरी है। न्यायपालिका के लिए इस फैसले के अनेक सबक हो सकते हैं। 2015 से लंबित मामलों की  सुनवाई में कई साल का विलंब होने से शीर्ष अदालत की साख कमजोर हुई। उसके बाद इस मामले की 16 दिन तक मैराथन सुनवाई हुई। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में हर पक्ष के वकील को आधे घंटे बहस का मौका मिलता है। लेकिन भारत की शीर्ष अदालत में बड़े वकीलों से जुड़े मामलों में सुनवाई की कोई समय-सीमा न होने से बहमूल्य अदालती समय नष्ट होता है। इसकी भरपाई आम जनता और जूनियर वकीलों से जुड़े मामलों में होती है।

राज्यपाल और स्पीकर द्वारा फैसलों में विलंब के खिलाफ शीर्ष अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। उसके द्वारा जारी गाइडलाइंस के अनुसार सुनवाई के बाद रिजर्व किए गए मामलों में तीन माह के भीतर फैसला होना चाहिए, जिसका इसमें पालन नहीं हुआ। जजों के अनुसार, फैसले संक्षिप्त और तार्किक होने चाहिए, जिसकी इस फैसले में अनदेखी हुई है। इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर हो सकती है, लेकिन उससे फैसले में बदलाव की नगण्य संभावना है। पर राज्य में जल्द चुनाव नहीं हुए, तो नए राउंड की मुकदमेबाजी फिर से शुरू हो सकती है।

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