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चिंता: घरों में भी हवा कहां शुद्ध है? समस्या के स्थायी समाधान के लिए जरूरी है देश के राजनीतिक वर्ग का साथ
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वायु प्रदूषण
- फोटो :
Adobe stock
विस्तार
एक ग्यारह वर्षीय बच्चा, जिसकी मां दक्षिणी दिल्ली के एक पार्लर में ब्यूटी थेरेपिस्ट के रूप में काम करती है, इन दिनों काफी दुखी है। उस बच्चे ने बीते सप्ताह मुझसे कहा, ‘खेल की कक्षाएं निलंबित हैं। मैं खेल से प्यार करता हूं। मुझे इससे नफरत है, क्योंकि अब सारी पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है और मैं फुटबाल का अभ्यास भी नहीं कर सकता।’
मामूली सुधार के बावजूद दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में हवा जहरीली बनी हुई है। सर्वविदित है कि इसका हमारे बच्चों और सबसे कमजोर लोगों के स्वास्थ्य पर कितना विपरीत असर पड़ता है। बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिकृत संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिसेफ के अनुसार, बच्चों के फेफड़े बढ़ने और विकसित होने की प्रक्रिया में होते हैं, जिससे प्रदूषित हवा के प्रति वह काफी संवेदनशील हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का कहना है कि बच्चे वयस्कों की तुलना में दोगुनी क्षमता से सांस लेते हैं और अपने शरीर के वजन की अपेक्षा ज्यादा सांस लेते हैं।
कई किशोर अक्सर मुंह से सांस लेते हैं, जिससे प्रदूषित तत्व उनके अंदर ज्यादा चले जाते हैं। बच्चे जमीन के करीब भी होते हैं, जहां कुछ प्रदूषक तत्वों की चरम सांद्रता का उन्हें अनुभव करना होता है। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों की तुलना में कमजोर होती है और उनकी श्वसन नलिकाएं अधिक पारगम्य होती हैं। शुरुआती बचपन के दौरान उन्हें वायरस, बैक्टीरिया या अन्य तरह के संक्रमणों का जोखिम अधिक रहता है। जो बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, उनको सांस संबंधी संक्रमण का उच्च जोखिम रहता है। जो लोग प्रदूषित वातावरण में रहते हैं, उनके फेफड़ों की क्षमता बीस फीसदी तक कम हो सकती है। यह एक तरह से ऐसे घर में बड़े होने के जैसा है, जहां किसी वयस्क को सिगरेट पीने की आदत हो। वायु प्रदूषण निमोनिया से भी जुड़ा है, जो वैश्विक स्तर पर बच्चों की मौत का सबसे बड़ा संक्रामक कारण है।
भारत की प्रदूषित हवा को लेकर मुख्यधारा के विमर्श में जिस बात पर कम जोर दिया गया है, वह यह है कि अब बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका असर पड़ना शुरू हो गया है। सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब तबके के बच्चे हैं, जैसे कि वह लड़का, जिसने हाल ही में अपने दिल की बात मुझे बताई थी। राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में ज्यादातर स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करना शुरू कर दिया है, जिससे कोरोना महामारी की यादें ताजा हो गई हैं, जब स्कूल बंद थे और बच्चों को पढ़ाने के लिए ऑनलाइन जरिया अपनाया गया था। समृद्ध परिवारों के बच्चों के पास घर पर बेहतर सुविधाएं थीं, जैसे-स्मार्टफोन, कंप्यूटर और स्थिर इंटरनेट कनेक्शन। यही वजह है कि अमीर और गरीब बच्चों के बीच सीखने के परिणामों में अंतर उभरकर सामने आया। यूनिसेफ की सितंबर 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी के दौरान भारत के 14 से 18 वर्ष की उम्र के करीब अस्सी फीसदी बच्चों के सीखने का स्तर कम था। वास्तव में, छह से तेरह वर्ष की आयु वर्ग के 42 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल बंद होने के दौरान किसी भी प्रकार की दूरस्थ शिक्षा का उपयोग करने की जानकारी नहीं दी थी। आज फिर से वही संकट बुरे सपने की तरह मंडरा रहा है।
गरीब बच्चे एयर-प्यूरीफाइड घरों में नहीं रहते। प्रदूषित हवा के अतिरिक्त वे वित्तीय बाधाओं और सीमित ऑनलाइन संसाधनों से जूझ रहे हैं। सामान्यत: उनके घरों का वातावरण सीखने पर ध्यान केंद्रित करने के अनुकूल नहीं होता। कई बच्चे छोटे घरों में रहते हैं, जो भीड़भाड़ वाले होते हैं, जबकि उनके माता-पिता अक्सर ऑनलाइन शिक्षा के लिए सहायक संसाधन उपलब्ध करवाने में असमर्थ होते हैं। इसका उनके समग्र कल्याण और शैक्षणिक प्रदर्शन पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। कम आमदनी वाली पृष्ठभूमि से संबंधित विद्यार्थी अक्सर स्कूल जाना पसंद करते हैं, इससे उन्हें अपने घरेलू वातावरण से कुछ देर के लिए सही निजात मिलती है। साथ ही वे शिक्षकों और सहपाठियों से मुखातिब होने के लिए उत्सुक रहते हैं। प्रदूषण के चरम के दौरान ऑनलाइन शिक्षा को अस्थायी तौर पर अपनाने से ये आमने-सामने की व्यस्तताएं कम हो जाती हैं और इससे सामाजिक-भावनात्मक विकास, प्रेरणा और सीखने में भी बाधा पहुंचती है।
मैं जब यह लेख लिख रही थी, तब आठ अभिभावकों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिक दायर कर गुहार लगाई कि स्कूलों को बंद करना दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण की समस्या का समाधान नहीं है। उनका तर्क था कि जहरीले धुएं में लिपटे शहर में हर घर को ‘शुद्ध हवा’ नहीं मिलती और इस तरह के बंद होने से बच्चों की ‘शिक्षा का मौलिक अधिकार’ बाधित हो सकता है। अभिभावकों की ओर से भौतिक कक्षाएं फिर से शुरू करने को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा, ‘स्कूल और आंगनवाड़ी बंद होने से कुछ विद्यार्थियों को मध्याह्न भोजन की सुविधा से वंचित होना पड़ रहा है।’ अदालत ने कहा कि कई विद्यार्थियों के पास ऑनलाइन शिक्षा के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स संसाधन और घरों में एयर प्यूरीफायर नहीं हैं। 25 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को मध्याह्न भोजन और घरों में वायु गुणवत्ता की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए दिल्ली-एनसीआर में स्कूल बंद करने के अपने निर्णय की समीक्षा करने के लिए निर्देशित किया, विशेषकर दसवीं से बारहवीं की कक्षाओं के लिए। संक्षेप में, दिल्ली-एनसीआर में स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों की भौतिक कक्षाओं पर प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार करें, जो पिछले सप्ताह गंभीर वायु प्रदूषण के कारण लगाए गए थे। देखते हैं क्या होता है?
भारत जैसे भारी असमानताओं वाले देश में गंभीर रूप से प्रदूषित हवा के कारण भले ही स्कूलों को अच्छे इरादे से बंद किया गया हो, लेकिन यह उन गरीब बच्चों के लिए विभाजनकारी हो सकता है, जिन्हें कई मोर्चों पर तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बच्चों का भविष्य ही भारत के भविष्य को आकार देगा। यदि देश का राजनीतिक वर्ग राजधानी और उसके आसपास और छोटे शहरों की वायु प्रदूषण की समस्या के स्थायी समाधान के लिए साथ नहीं आता है, और केवल फौरी उपाय ही जारी रखता है, तो इससे वह न केवल लाखों बच्चों के सपनों और आकांक्षाओं को खत्म कर रहा है, बल्कि भारत की कहानी को भी खतरे में डाल रहा है।