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खेती: बरकरार हैं गन्ना किसानों की मुश्किलें, इन हालात में कैसे दोगुनी होगी आय
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गन्ने की खेती (फाइल फोटो)
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विस्तार
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिश पर मंत्रिमंडल ने आगामी अक्तूबर से प्रारंभ सत्र में गन्ना मूल्य में मामूली बढ़ोतरी कर इससे जुड़े करोड़ों किसानों को पुन: निराश किया है। मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है। पिछले वर्ष के मुकाबले यह बढ़ोतरी मात्र तीन फीसदी है। इसी सत्र में इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य 20 फीसदी रखा गया है, जिससे अर्थव्यवस्था को सुधारने में काफी मदद मिलने के आसार हैं। आयोग राज्य सरकारों से भी राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाने की सिफारिश करती है, पर पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने इसे अमल में लाने से इन्कार कर दिया।
दूसरी ओर, चीनी मिल मालिकों की संस्थाएं गन्ने का दाम न बढ़ाने के प्रस्ताव पास कर रही हैं और चीनी के दामों में बढ़ोतरी करने की मांग कर रही हैं। सरकार का यह तर्क भी गले से नीचे नहीं उतर रहा है कि गन्ना उत्पादन में 157 रुपये प्रति क्विंटल की लागत आती है और आयोग के सुझाव पर इसमें दो गुना बढ़ोतरी की गई है। इसी वर्ष कई संस्थानों ने इन दावों को चुनौती दी है। यहां तक कि पिछले बजट सत्र के दौरान कृषि मंत्री ने भी संसद में स्वीकार किया कि एक किसान परिवार की आमदनी 6,426 रुपये और मासिक खर्च 6,223 रुपये है।
कहने को तो गन्ने की फसल ‘नकद फसल’ है, लेकिन इस फसल का पैसा वर्षों तक खरीदार पर बकाया रहता है, जिसे पाने के लिए किसान को संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि ‘शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 1996’, जिसे भार्गव फॉर्मूला भी कहते हैं, के अनुसार, गन्ना उत्पादक किसान जिस दिन अपना गन्ना मिल गेट पर पहुंचा देता है, उसके 14 दिन के अंदर उसका भुगतान मिल मालिक को करना जरूरी है। अन्यथा उसके बाद लंबित भुगतान पर 15 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने का प्रावधान है, लेकिन मिल मालिकों और सरकार की मिलीभगत के कारण इसे कभी अमल में नहीं लाया जाता।
भारत में पांच करोड़ किसान और 50 लाख मजदूर इस उद्योग से अपनी जीविका चलाते हैं। यह उद्योग सालाना एक लाख करोड़ रुपये की आय पैदा करता है। भारत में 690 चीनी मिलें पंजीकृत हैं, जिनमें 93 मिलें पांच पेराई सत्र से काम नहीं कर रहीं और बंद होने के कगार पर हैं। शेष 597 में से कई पूरे साल नहीं चलतीं। इनमें दो चीनी रिफाइनरी हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में कुल 119 मिलों में से 95 निजी, 23 सरकारी व एक राज्य चीनी निगम की है। आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष चीनी उत्पादन 328 लाख टन तक पहुंच चुका है।
नीति आयोग के कार्य बल की क्रियान्वयन रिपोर्ट ने गन्ना किसानों की नींद उड़ा दी है। आयोग ने गन्ने की खेती का रकबा घटाने की सलाह देकर उन्हें दुविधा में डाल दिया है। रिपोर्ट में गन्ने की खेती की लागत बढ़ने के कई दुष्परिणाम बताए गए हैं, लेकिन विकल्प पर रिपोर्ट खामोश है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी मिल मालिकों द्वारा उत्पादन में आए खर्च के आकलन को आधार मानकर किसानों के गन्ना उत्पाद की कीमत तय करने का प्रावधान है। जाहिर है, मिल मालिकों का हित ही मूल्य निर्धारण में हावी रहेगा।
निस्संदेह गन्ना किसानों का यह संकट नव उदारवादी आर्थिक नीतियां लागू किए जाने तथा किसान मजदूरों के हितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून-नियमों को बदलने से पैदा हुआ है। विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है कि बीमा योजना समेत अन्य किसान कल्याण योजनाएं धरातल पर कारगर नहीं हो पा रही हैं, जिसके चलते खेती-किसानी घाटे का सौदा बनी हुई है। किसानों की आत्महत्या रुकने का नाम नहीं ले रही है और गांव से निरंतर पलायन जारी है। जीडीपी में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भागीदारी दिन-प्रतिदिन कम से कमतर होती जा रही है।
ऐसे में जरूरत है कि किसान संगठनों की मांग के अनुसार, सी-2 आधारित उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित कर सख्त निर्देशन में फसलों की कीमतों का भुगतान किया जाए। अन्य उद्योगों की तरह कृषि को भी घाटे से उबारने के लिए सख्त कानून और किसान-मुखी योजनाएं बनाई जाएं। साथ ही, कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश की भी आवश्यकता है, तभी किसानों की आय दोगुनी होगी।
-लेखक पूर्व सांसद हैं।
sugarcane farmers income