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पोक्सो पर ऐसी बेरुखी

Wed, 03 May 2017 06:48 PM IST
ajay setia अजय सेतिया
Updated Wed, 03 May 2017 06:48 PM IST
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Such ridiculousness on pocos
अजय सेतिया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गायत्री प्रजापति को जमानत देने वाले लखनऊ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ओम प्रकाश मिश्रा को निलंबित कर सही कदम उठाया है। कोई भी कानून तब तक सार्थक नहीं हो सकता, जब तक उसे लागू करने वाली एजेंसियां ईमानदारी से काम नहीं करतीं। यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण से संबंधित पोक्सो कानून को लागू हुए अब पांच साल होने को हैं, लेकिन देश के सभी जिलों में स्पेशल पोक्सो अदालतें नहीं बनाई गई हैं। कानून में राज्य सरकारों को सलाह दी गई है कि वे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह कर के विशेष अदालतों का गठन करें। इसी कानून में राज्य सरकारों को एक राहत यह दी गई है कि वे चाहें, तो किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत गठित अदालतों को ही पोक्सो की विशेष अदालतों का दर्जा दे दें।


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राज्य सरकारों की नौकरशाही का हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट की डांट पड़ने से पहले वे न तो किसी कानून से संबंधित नियमावली बनाते हैं और न ही अन्य औपचारिकताएं पूरी करते हैं। पोक्सो के मामले में भी यही हुआ है। तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को डांट पिलाई, तो आनन-फानन में कहीं विशेष महिला अदालतों को पोक्सो की विशेष अदालत के अधिकार दे दिए गए और कहीं किशोर न्याय बोर्डों को विशेष पोक्सो अदालतों का दर्जा दे दिया गया। किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत तो एक राज्य को छोड़कर विशेष अदालतें बनाई ही नहीं गई हैं। इस तरह खानापूर्ति करने का नतीजा यह निकला कि विशेष अदालतों के जज विषय विशेष के विशेषज्ञ नहीं हैं। इन न्यायालयों के जज अपने अतिरिक्त कार्य को अस्थाई मानते हैं और कानून का गहराई से अध्ययन नहीं करते और न ही राज्य सरकारें उनकी ट्रेनिंग की व्यवस्था करती है।

अभी यह नहीं कहा जा सकता कि पोक्सो मामले में गिरफ्तार गायत्री प्रजापति की जमानत अपराध की गंभीरता को समझने के बावजूद दी गई। उच्च न्यायालय ने ओम प्रकाश मिश्रा की ओर से दी गई जमानत पर रोक लगाते हुए, जो टिप्पणी  की है वह इस मामले में भ्रष्टाचार होने का संदेह पैदा करती है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बाबासाहेब भोसले ने अपनी टिप्पणी में कहा कि 'अतिरिक्त सेशन जज के इरादों पर संदेह पैदा होता है, क्योंकि वह आज ही रिटायर होने वाले हैं, और उन्होंने मामले की गंभीरता के साथ इसे भी नजर अंदाज किया कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर दायर हुआ था।'

बच्चों के साथ यौन अपराध की इस घटना से न्याय देने वाले दो अदारों की पोल खुली है। सबसे पहले तो पुलिस की पोल खुली है कि बच्चों के साथ यौन अपराध की शिकायत मिलने के बावजूद उसने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इस संबंध में पोक्सो कानून में ही पुलिस को स्पष्ट निर्देश हैं कि वे शिकायत को तुरंत लिपिबद्ध करेंगे। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट सभी राज्यों के डीजीपी को हिदायत भी दे चुका है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश की पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को नहीं समझा। दूसरी पोल न्यायपालिका की भी खुली है, जिसने बाल यौन अपराध के एक आरोपी को जमानत दे दी।

बाल यौन अपराध भारत में एक गंभीर मामला है, इसीलिए 2012 में बच्चों से संबंधित अलग कानून, अलग अदालतें, अलग सरकारी वकील की व्यवस्था करनी पड़ी है। इसलिए पुलिस और जजों को ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है।

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