निशाने पर मुम्ब्रा की दो बेबस औरतें
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मुंबई से लगा महाराष्ट्र के ठाणे जिले का बहुत बड़ा इलाका है मुम्ब्रा। यह मुस्लिम बहुल इलाका है। मुंबई दंगे के बाद कई मोहल्लों के मुस्लिम परिवारों ने मुम्ब्रा को आबाद किया। उन्हें उम्मीद थी कि वे वहां सुरक्षित होंगे। पर इसी मुम्ब्रा में दो परिवार आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। दोनों परिवारों की मुखिया विधवा हैं। शमीमा अपने पति के साथ बीस साल पहले पटना से मुंबई आई थी। 2002 में पति का देहांत होने के बाद वह सिलाई का काम करने लगी। फिर उनकी बड़ी बेटी ने पढ़ाई के साथ ट्यूशन शुरू कर दिया। पड़ोसियों ने उसकी नौकरी एक छोटे कारोबारी के पास लगवा दी। काम से उसे मुंबई के बाहर भी जाना पड़ता था। एक फिर वह ऐसी गई कि लौटकर नहीं आई। 15 जून, 2004 को अहमदाबाद के बाहर पुलिस ने उसे गोलियों से भून डाला। बताया गया कि वह आतंकवादी थी। उसका नाम इशरत जहां था।
दिल दहलाने वाली इस खबर के बाद शमीमा अपनी बेटी को बेगुनाह साबित करने और हत्यारों को सजा दिलवाने के काम में जुट गई। नतीजा यह हुआ कि इशरत की मौत को अहमदाबाद के जिला न्यायालय ने फर्जी मुठभेड़ मान लिया, और इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को, जो अन्य मुठभेड़ों के मामले में पहले से सजा काट रहे थे, दंडित करने का फैसला सुनाया।
पर 2014 के लोकसभा चुनाव ने सब कुछ बदल दिया। सीबीआई की तरफ से चलाए जा रहे मुकदमे की चाल पहले धीमी हुई, फिर रुक गई। जेलों में बंद पुलिस अधिकारी छूटने लगे। दो प्रमुख आरोपी-डीजीपी वंजारा और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पीपी पांडेय पिछले हफ्ते जमानत पर छूटे हैं। गुजरात में वंजारा का प्रवेश वर्जित होगा। पर पांडेय केवल गुजरात वापस ही नहीं पहुंचे हैं,संयुक्त डीजीपी के पद पर उनकी बहाली भी हुई है। उन्हें उस पुलिस अधिकारी की जांच भी सौंपी गई है, जिसने अदालत और सीबीआई की जांच के दौरान इन पुलिस अधिकारियों को दोषी और इशरत जहां को निर्दोष साबित करने के सुबूत जुटाए थे। अब शमीमा का अहमदाबाद और दिल्ली जाना खतरनाक हो गया है।
दूसरी औरत शीरीन दलवी उर्दू प्रकाशन के क्षेत्र में देश की अकेली महिला संपादक थी। उनकी सफलता बहुतों को रास नहीं आई।विगत जनवरी में फ्रांस में शार्ली हेब्डो नाम की कार्टून पत्रिका के दफ्तर पर आतंकी हमले में बारह लोग मारे गए थे। शीरीन ने अपनी पत्रिका में इस विषय पर कहानी छापी, साथ ही, शार्ली हेब्डो में छपा एक कार्टून भी छाप दिया, हालांकि उन्हें फ्रेंच नहीं आती थी। बाद में उस कार्टून के आपत्तिजनक होने के बारे में पता चलने पर उन्होंने माफीनामा छापा। पर कुछ उर्दू पत्रकारों ने पुलिस में शिकायत कर दी थी, इसलिए उनकी गिरफ्तारी हुई। उनकी जमानत हो गई है, लेकिन उन पर मुकदमा चल रहा है, और अगर न्यायालय मदद नहीं करता, तो वह जेल जा सकती हैं।
शमीमा और शीरीन, तथा उनके बच्चे जिस असुरक्षा का अनुभव कर रहे हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है? शीरीन को तो उनके पेशे से जुड़े लोग, जो उनके ही मजहब से हैं, जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं। जबकि राज्य सरकार उनकी मुसीबतों को बढ़ाने का काम कर रही है।