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सुभाष चंद्र बोस: विवादों से घिरा एक महानायक
Fri, 05 Feb 2021 02:39 AM IST
Pradip Kumar
प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार
Published by: Pradip Kumar
Updated Fri, 05 Feb 2021 02:39 AM IST
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सुभाष चंद्र बोस
- फोटो : पीटीआई
कांग्रेस और देश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि जनवरी, 1939 में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद और राजा जी की संयुक्त ताकत के मुकाबले उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हराकर कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीता था। उस विजय से जुड़ा बड़ा विवाद यह है कि उन्हें काम नहीं करने दिया गया और यहीं से उनके कांग्रेस त्याग और हिटलर के जर्मनी और तोजो के जापान की कहीं ज्यादा विवादास्पद यात्रा की शुरुआत हुई। कोई आश्चर्य नहीं, नेता जी की 125वीं जयंती के अवसर पर कोलकाता में आयोजित समारोह में भी तल्खी पैदा हो गई।
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भाजपा ने 'पराक्रम दिवस' मनाया, तो राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने 'देशप्रेम दिवस।' समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भाजपा कार्यकर्ताओं ने 'जय श्रीराम' के नारे लगाए, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस पर भड़क गईं और यह कहकर भाषण करने से इन्कार कर दिया कि दलगत लाभ के लिए देशनायक (गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्द) का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कुछ महीने बाद पश्चिम बंगाल में होेने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तृणमूल कांग्रेस के कई नेता-मंत्रियों के भाजपा में शामिल होने के सिलसिले से राज्य में माहौल अभी से गर्माने लगा है। स्पष्ट संकेत हैं कि तृणमूल और भाजपा, दोनों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है। राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के लिए नायक-महानायकों का सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं और इस मारामारी में बहुत सारे असुविधाजनक तथ्यों पर पर्दा दाल दिया जाता है, इसलिए नेताजी के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाओं का पुनर्पाठ प्रासंगिक हो जाता है।
जो महात्मा गांधी पट्टाभि सीतारमैया की हार को पचा नहीं पचा पाए, उनसे और जवाहरलाल नेहरू से नेताजी के निजी रिश्ते कैसे थे? नेताजी गांधी जी का इतना आदर करते थे कि रंगून से अपने रेडियो प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। नेहरू से उनके नितांत व्यक्तिगत संबंध थे। यहां तक कि जब कमला नेहरू स्विट्जरलैंड में इलाज के लिए भर्ती थीं, तब नेताजी उन्हें देखने गए थे। समाजवाद और औद्योगिकीकरण जैसे बुनियादी मुद्दों पर नेहरू और नेताजी के विचार एक थे। लेकिन नेताजी की अपेक्षा रहती थी कि गांधी जी के मोहपाश से नेहरू मुक्त हों। समस्या यह थी कि गांधी जी के विचारों, रणनीति और समग्र नेतृत्व की समझ अलग-अलग थी।
गांधी जी के होने का अर्थ नेहरू और सरदार पटेल सहित सभी बड़े कांग्रेसी नेता, भीमराव आंबेडकर और चर्चिल जैसे कुछ अपवादों को छोड़ बाकी ब्रिटिश शासक बेहतर समझते थे। जनवरी, 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद जो स्थितियां नेताजी के सामने थीं, लगभग वैसी ही स्थतियां नेहरू के सामने 1936 में अध्यक्ष बनने के समय थीं। नेहरू और नेताजी के विरोधी एक ही थे। दोनों के सामने कठिन कार्य था-कांग्रेस वर्किंग कमेटी का गठन। भारी उद्योग, समाजवाद और आधुनिकीकरण जैसे विषयों पर नेहरू गांधी जी का खुलकर विरोध करते थे, लेकिन लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन उनकी कल्पना से परे था। वर्किंग कमेटी के गठन पर विवाद के बाद नेताजी ने गांधी जी को लिखे पत्र में कहा, 'अगर हम अलग होते हैं, तो कटु गृहयुद्ध शुरू हो जाएगा', (इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी : नेहरू ऐंड बोस : पैरेलल लाइव्स, पृष्ठ 192)। दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू गांधी जी के सामने झुके और अपने विरोधी 'दक्षिणपंथियों' को वर्किंग कमेटी में शामिल किया। बड़े वाजिब कारण थे कि जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और नेताजी अंतिम पड़ाव तक एक पथ के सहगामी नहीं बन पाए।
स्वतंत्रता संग्राम की लौ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को एक आयामी बना दिया था। आजादी के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। मुस्लिम लीग को ही लें। वर्ष 1937 के चुनाव के बाद नेहरू ने जिन्ना और उनकी पार्टी को सहयोग के लायक नहीं माना। लेकिन नेताजी ने आखिरी दम तक हार नहीं मानी। भारत का विभाजन रोकने के लिए उन्होंने जिन्ना के सामने अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री बनने तक का प्रस्ताव रख दिया।
यही धुन उन्हें हिटलर तक ले गई। लेकिन जब हिटलर ने सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध में सहयोग मांगा, तो वह मुकर गए। तोजो के सैन्यवादी-विस्तारवादी जापान से सहयोग भी सफल नहीं रहा। दूसरी ओर गांधी जी, नेहरू और अन्य नेता मानव सभ्यता पर मंडरा रही काली खौफनाक घटाओं को साफ देख रहे थे। जर्मनी, ऑस्ट्रिया और पोलैंड में तब तक लाखों यहूदियों का कत्ल कर चुके हिटलर और मंचूरिया में व्यापक अत्याचार कर चुके जापान का व्यवहार भारत के प्रति भिन्न नहीं हो सकता था। लेकिन जब लाल किले में आजाद हिंद फौज के योद्धाओं पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया, तो नेहरू बरसों बाद काला कोट पहन कर वकालत करने पहुंच गए।
नेताजी की 125वीं जयंती वर्ष के दौरान बारूद की गंध के माहौल में पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। वैसे भी छह दशक का इतिहास हिंसक राजनीति का रहा है। इस मौके पर नेताजी की सर्वाधिक प्रासंगिकता यह है कि उनके मार्ग पर चलते हुए राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द हर हाल में बनाए रखा जाए। बयासी साल पहले कांग्रेस नेता की हैसियत से अपने अंतिम संबोधन में नेताजी ने कहा था, 'राष्ट्रवाद के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप अल्पसंख्यकों की समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए। आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़े समान हित सांप्रदायिक मतभेदों से ऊपर हैं।' आज जब बंगाल में वोट की खातिर नई-नई जातियों पर हाथ धरा जा रहा है, तब नेताजी के जीवन की एक घटना याद आती है। सिंगापुर में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव बरतने वाले एक मठ का निमंत्रण उन्होंने ठुकरा दिया था। वह वहां तभी गए, जब उनके साथ आजाद हिंद फौज के दो मुसलमान सेनानियों को भी जाने दिया गया। आशा की जाए कि नेताजी की विरासत पर झगड़ने वाली पार्टियां इन आदर्शों की अनदेखी नहीं करेंगी।