एक आदिवासी समुदाय का संघर्ष

क्रिस्टिना इओना ड्रागोमीर Updated Tue, 14 Mar 2017 06:22 PM IST
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भारतीय संविधान ने ऐसे समुदायों के लिए कुछ विशेष सुरक्षा सुनिश्चित की है, जिन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया गया है। हालांकि किन समूहों को ऐसी मान्यता मिलनी चाहिए, इसे लेकर विवाद है। एसटी का दर्जा मिलने का मतलब है कि उस विशेष वर्ग के लोगों के लिए स्कूलों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण। वर्षों से सामाजिक और राजनीतिक गोलबंदी के कारण अनुसूचित जनजाति समूहों की संख्या 1960 में 225 से बढ़कर आज 700 हो गई है। जिस तरह से एसटी के दर्जे की मांग करने वाले समुदायों की संख्या बढ़ी है, उसके साथ ही ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ रही है, जो एसटी का दर्जा दिए जाने की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं, जिससे एसटी की मान्यता से संबंधित अर्हताएं समीक्षा के दायरे में आ गई हैं।
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भारतीय संविधान सिर्फ इतना कहता है कि राज्यपाल के साथ सलाह करके राष्ट्रपति एसटी समूहों को निर्दिष्ट करेंगे; इसमें किसी तरह की विशेष प्रक्रिया का जिक्र नहीं है। आदिवासी मामलों के मंत्रालय के मुताबिक मानदंड (विधायी रूप में यह परिभाषित नहीं है) स्पष्टतया स्थापित है और इसमें आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बाहरी समुदायों से संपर्क में झिझक और 'पिछड़ापन' शामिल है। ये सामान्य मानक, 1931 की जनगणना, प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट 1955, कालेकर सलाहकार समिति और लोकुर समिति द्वारा एससी/एसटी समीक्षा संबंधी रिपोर्ट में स्थापित है। हालांकि आधी सदी बाद इस वृहत मानदंड पर कुछ सवाल उठते हैं।
एसटी का दर्जा प्राप्त करने पर मिलने वाली सुरक्षा और लाभ के लिए भारत में अनेक समुदाय खुद को इन मानदंडों के अनुरूप साबित करने की कोशिश करते हैं। ऐसा ही एक समुदाय है नर्रीकुरोवर, यह उत्तर भारत की अर्ध घुमंतू जनजाति है, जिसने करीब हजार वर्ष पहले दक्षिण में तमिलनाडु की ओर विस्थापन किया। पारंपरिक रूप से यह जनजाति शिकारी है, इनके जन्म की कहानियों से पता चलता है कि यह उच्च जाति से संबद्ध रही थी और राजाओं को सुरक्षा प्रदान करती थी। हालांकि हमलावरों द्वारा उनके क्षेत्रों में जहां उनकी बसाहट थी, कब्जा कर लेने के बाद नर्रीकुरोवर भी दूसरी जनजातियों की तरह आदिम बन गईं और जंगलों में बस गईं, जहां उन्होंने अपनी परंपरा और स्वतंत्रता को संरक्षित किया। शिकार अवैध होने से उनकी परंपरा पर रोक लग गई। इसके बाद से नर्रीकुरोवर समुदाय समाज के सबसे निचले तबके के रूप में अत्यंत गरीबी में स्थानीय बाजारों और मंदिरों के आसपास मनके और इसी तरह के आभूषण बेचकर गुजर-बसर कर रहा है।
अपने शोध में मैंने पाया है कि नर्रीकुरोवर धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक लक्षणों के आधार पर यूरोप के रोमा समूह से काफी मिलते-जुलते हैं। ऐसा लगता है कि उनका जन्म भारत के उत्तर-पश्चिम में हुआ था और हमलों के कारण वे विभिन्न दिशा में बिखर गए।

नर्रीकुरोवर समुदाय आज साक्षारता के अत्यंत निम्न स्तर, स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों और बेरोजगारी से जूझ रहा है। तमिलनाडु में आज मुश्किल से 8500 नर्कीकुरोवर परिवार है, जिनकी आबादी 30,000 के करीब है। तमिलनाडु सरकार ने उन्हें अत्यंत पिछड़ा वर्ग के रूप में मान्यता दी है। इससे इस समुदाय के बारे में गलत धारणा बनी है। नर्रीकुरोवर समुदाय को ओबीसी में रखने से यह धारणा बनी है कि यह वर्ग गरीबी की रेखा से ऊपर है।

-लेखिका, एसयूएनवाई ओस्वेगो में राजनीति विज्ञान की सहायक प्राध्यापक हैं।
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