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सत्ता और संगठन के अस्तित्व का संघर्ष : बाल ठाकरे की शिवसेना पर दावा, 'हिंदुत्व' के इर्द-गिर्द पनपा वैचारिक भ्रम

Sun, 26 Jun 2022 04:40 AM IST
योगेश साहू दिनेश गुणे
दिनेश गुणे Published by: योगेश साहू Updated Sun, 26 Jun 2022 04:40 AM IST
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सार
अब शिवसेना का असली दावेदार कौन है, इसे लेकर एकनाथ शिंदे गुट और ठाकरे गुट में कानूनी संघर्ष शुरू होगा। जाहिर है, सत्ता के लिए वैचारिक भ्रम ने ही उसे यहां ला खड़ा किया है।
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Struggle for power and organizations existence: claim on Bal Thackerays Shiv Sena, ideological confusion around Hindutva
उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और बालासाहेब ठाकरे - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

शिवसेना के 56 साल के कदमताल के साक्षी रहे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी ने पार्टी के पहले चार दशक की गतिविधियों पर शिवसेना-कल, आज और कल नामक शोध प्रबंध लिखा है। करीब एक हजार पन्ने के इस शोध में जोशी ने शिवसेना के साल 2007 तक की गतिविधियों यानी भूतकाल को समेटने का प्रयास किया है। हालांकि उन्होंने शिवसेना के भविष्य पर जान-बूझकर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन कुछ समकालीन नेताओं के मत जरूर प्रकट किए हैं। इस पुस्तक में लिखे तथ्यों से आज की राजनीतिक हलचल की छानबीन की जा सकती है।



इस पुस्तक के संदर्भों पर गौर करें, तो आज की शिवसेना और दिवंगत बाल ठाकरे की शिवसेना में बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। मराठी मानुष के हक के लिए बनी शिवसेना राज्य की राजनीति को मोड़ देने वाली रही है, लेकिन वर्तमान में यह पार्टी एक वैचारिक भ्रम की अवस्था में पहुंच गई है। साल 1987 में तत्कालीन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने विले पार्ले विधानसभा उपचुनाव में प्रखर हिंदुत्व की आवाज बुलंद करते हुए कहा था कि 'हिंदुत्व शिवसेना की सांस' है। 


हालांकि इसके बाद उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया। लेकिन ठाकरे ने हिम्मत से कानूनी लड़ाई का सामना किया और पूरे आत्मविश्वास के साथ राजनीति में हिंदुत्व की अलख जगाए रखी। बाद में 'हिंदुत्व' राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रबिंदु बन गया। आज इसी हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना दो फाड़ हो गई है। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार एक समय में बाल ठाकरे की अयातुल्ला खोमैनी से तुलना कर खिल्ली उड़ाते थे, आज वह शिवसेना के संकटमोचक बन गए हैं। 

यही नहीं, उद्धव ठाकरे की शिवसेना के प्रथम पंक्ति के कुछ नेताओं को भी यह लगने लगा है कि शरद पवार की राजनीतिक सूझबूझ से ही सत्ता और उनके संगठन को बचाया जा सकता है। यह सही है कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। साल 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन में मिले जनादेश को दरकिनार कर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाविकास आघाड़ी तैयार किया। यह गठबंधन भले ही असांविधानिक नहीं था, लेकिन अनैसर्गिक जरूर था। 

इस गठबंधन के बाद हिंदुत्व के लिए जानी जाने वाली शिवसेना की काफी फजीहत हुई। विधानसभा में मुख्यमंत्री के रूप में दिए अपने पहले भाषण में उद्धव ठाकरे का सुर बदला नजर आया। इसके कुछ महीने बाद उद्धव ठाकरे हिंदुत्व को लेकर निशाना बनते रहे। खुद उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में कबूल किया कि धर्म और राजनीति का मिश्रण शिवसेना की बड़ी चूक साबित हुआ। उसी समय से प्रखर हिंदुत्ववादी विचारधारा के साथ जुड़े पारंपरिक शिवसैनिकों के मन में नई विचारधारा को लेकर शंका शुरू हो गई थी। 

अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त होने पर माना जाने लगा कि अब हिंदुत्व का मुद्दा खत्म हो गया है। लेकिन हिंदुत्व का मुद्दा देश की राजनीति का केंद्रबिंदु बना रहा। इसके मद्देनजर शिवसेना ने बड़ी सावधानी के साथ हिंदुत्व पर अपना विचार रखना शुरू किया। लेकिन राज्य में उठे हिंदुत्व से संबंधित प्रसंग पर शिवसेना की भूमिका तटस्थ रही। इससे भविष्य की भूमिका को लेकर शिवसेना में द्वंद्व बढ़ने लगा।

महाविकास आघाड़ी सरकार में सहभागी होने के बाद शिवसेना को कई मुद्दों पर अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ा। जनसभाओं में कहा जाता रहा कि मेरा हिंदुत्व 'गदाधारी' हिंदुत्व है, लेकिन असल में सरकार बचाने के लिए उसे हिंदुत्ववाद के विरोध पर पली पार्टियों के एजेंडे पर चलना था। उद्धव सरकार के बीते ढाई साल के कार्यकाल में पालघर प्रकरण, अजान स्पर्धा, त्योहारों को लेकर बदली हुई भूमिका, राम मंदिर समेत कई मुद्दों पर बना रुख जैसे कई मामले हुए। 

उसके अतिरिक्त सत्ता की सुविधाजनक भागीदारी में एनसीपी और कांग्रेस का अलग रुतबा था। जैसा कि कहा गया है, शिवसेना के अपने लोगों की उपेक्षा का आलम यह था कि वे मुख्यमंत्री से मिल भी नहीं पाते थे। संवाद की यह टूट इस स्तर पर हुई कि शिवसेना के केंद्रीय नेतृत्व को अपने इतने बड़े हिस्से के अलग होने की भनक तक नहीं थी। कुछ दिन पहले राज्यसभा के लिए हुए चुनाव में शिवसेना का अंतर्कलह सामने आया था। 

भाजपा ने अपने 106 विधायकों के अलावा निर्दलीयों सहित 113 मत हासिल किए, जिससे भाजपा के तीनों उम्मीदवारों की विजय हुई। उसी समय यह पता चल गया था कि शिवसेना में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उसके बाद हुए विधान परिषद चुनाव में शिवसेना में नाराजगी की चिनगारी उठी और बगावत का बीजारोपण हो गया। उधर, भाजपा के पास अपने पांचवें उम्मीदवार को जिताने के लिए एक भी अतिरिक्त मत नहीं था, फिर भी उसने दांव खेला और जीत हासिल की। 

ये संकेत थे। लेकिन कांग्रेस-एनसीपी के भरोसे पर राजनीति कर रहे शिवसेना नेतृत्व ने इससे कोई सबक नहीं सीखा। इस घटनाक्रम के बीच शिवसेना के स्थापना दिवस पर ठाकरे ने हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा को चुनौती देने की जरूर कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब शिवसेना का असली दावेदार कौन है, इसे लेकर एकनाथ शिंदे गुट और ठाकरे गुट में कानूनी संघर्ष शुरू होगा। जाहिर है, सत्ता के लिए वैचारिक भ्रम ने ही उसे यहां ला खड़ा किया है।

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