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मजबूत बैंकिंग व्यवस्था जरूरी

Mon, 22 Aug 2016 07:01 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 22 Aug 2016 07:01 PM IST
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Strong banking systems necessary
जयंतीलाल भंडारी

रिजर्व बैंक के आगामी गवर्नर उर्जित पटेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती बैंकिंग क्षेत्र में सुधार करने की होगी। हाल ही में फिच द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की विकास दर बढ़ाने के लिए बैंकिंग संबंधी दो प्रमुख सुधारों की जरूरत है। एक ओर देश के सरकारी बैंकों को मिलाकर कुछ बड़े बैंक बनाए जाने चाहिए। इसी के साथ बैंकिंग धोखाधड़ी और डूबते कर्ज से अर्थव्यवस्था को बचाया जाना चाहिए। छोटे सरकारी बैंकों को मिलाकर बड़े बैंक बनाए जाने का सुझाव नया नहीं है। वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के लिए बनी नरसिम्हन समिति ने सबसे पहले बैंक सुदृढ़ीकरण का विचार पेश किया था। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा गठित एक कार्य समूह ने इसकी विस्तृत योजना पेश की थी। इसी परिप्रेक्ष्य में जहां 17 अगस्त को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बैंक कर्ज नहीं लौटाने पर संपत्ति जब्त करने के कानून को मंजूरी दी, वहीं 18 अगस्त को भारतीय स्टेट बैंक के निदेशक मंडल ने पांच सहायक बैंकों व भारतीय महिला बैंक के विलय प्रस्ताव को मंजूर किया।

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स्टेट बैंक जैसे बड़े बैंकों में सहायक बैंकों के विलय से जहां उद्योग, कारोबार व विभिन्न वर्गों की कर्ज जरूरत पूरी होगी, वहीं वित्तीय समायोजन का लक्ष्य भी पूरा होगा। प्रस्तावित विलय के बाद भारतीय स्टेट बैंक 550 अरब डॉलर की परिसंपत्ति के साथ दुनिया का 44वां सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। चाइनीज बैंक आईसीबीसी दुनिया का सबसे बड़ा बैंक है, जिसकी कुल परिसंपत्ति 3,432 अरब डॉलर है।
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वसूल नहीं हो पा रहे कर्ज (एनपीए) भी बैंकों की एक बड़ी चुनौती हैं। बढ़ते एनपीए से परेशान केंद्र सरकार ने कानून बनाया है कि यदि बैंक कर्ज नहीं लौटाता, तो कर्ज लेते समय गारंटी स्वरूप रखी गई संपत्ति और प्रतिभूति को बैंक जब्त कर सकता है।
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यद्यपि देश में बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी रोकने व डूबे हुए कर्ज की वसूली के लिए कई कानून हैं। पर इन कानूनों से कारगर परिणाम नहीं मिल पा रहे, क्योंकि उनका प्रवर्तन सही ढंग से नहीं हो पा रहा। बैंक ऋण वसूली पंचाट (डीआरटी) पर भरोसा करते हैं। अभी देश भर में कार्यरत 33 पंचाट में करीब 60 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें बैंकों के 38 खरब रुपये से भी अधिक की राशि फंसी है। पंचाटों में करीब 10 फीसदी मामलों में ही वसूली हो पाती है। ऐसे में बैंकिंग से संबंधित देश के कानूनी ढांचे में त्वरित सुधार की जरूरत है।


बैंकों को एनपीए से बचाने और धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए बिग डेटा और नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाना जरूरी हो गया है। बिग डेटा के तहत विभिन्न बैंकों को आपस में सूचना साझा करना चाहिए, ताकि बैंक डूबते कर्ज की समस्या का समाधान निकाल सकें। बैंकों को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वे दोषी कंपनियों का प्रबंधन हाथ में लेकर अपने कर्ज की वसूली के लिए रणनीतिक प्रयास करें। बैंकों को यह अनुमति भी दी जानी चाहिए कि वे अपने डूबे हुए लोन के लिए संकटग्रस्त कंपनी की संपत्ति को खुली नीलामी से बेचने की व्यवस्था से हटकर सीधे बेचने की डगर पर आगे बढ़ें। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बैंकों का सुदृढ़ीकरण मौजूदा समस्याओं को खत्म नहीं कर पाएगा। बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को 51 फीसदी से कम करना एक प्रभावी उपाय हो सकता है। मौजूदा अधिनियमों में संशोधन करने की जरूरत है, ताकि सार्वजनिक बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी घटाकर 33 प्रतिशत तक किया जा सके।

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