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सख्त कानून काफी नहीं

Wed, 18 Sep 2013 08:02 PM IST
उर्मिलेश
उर्मिलेश Updated Wed, 18 Sep 2013 08:02 PM IST
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strict law is not enough

हमारे समाज में यौन हिंसा एक बड़ी समस्या है। दिल्ली में पिछले वर्ष 16 दिसंबर की जघन्य घटना के खिलाफ देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया हुई। आंदोलन-प्रदर्शन के दबाव में आकर सरकार को न्यायमूर्ति जे एस वर्मा की अगुवाई में उच्चस्तरीय कमेटी बनानी पड़ी। वर्मा कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कुछ जरूरी कानूनी संशोधन हुए। पर वर्मा कमेटी रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य को शासन और समाज के स्तर पर पूरी तरह समझा जाना अभी बाकी है।

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वर्मा कमेटी ने कई तरह के प्रशासनिक सुधारों की जरूरत को भी रेखांकित किया। लेकिन आज भी हर यौन हिंसा के बाद हमारे राजनेताओं, शासन-प्रशासन और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों का बड़ा हिस्सा ऐसी समस्याओं का समाधान सिर्फ कड़े कानून-कठोर अदालती फैसलों और कड़ी सुरक्षा में देखता है। अभी जब 16 दिसंबर के गुनाहगारों को स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, तब भी ज्यादा जोर इसी पर था। बीते 22 अगस्त को मुंबई के महिला फोटोग्राफर बलात्कार कांड के बाद भी इसी तरह की बातें दोहराई गईं। यहां तक कहा गया कि कुछ अरब देशों की तरह अपने यहां भी यौन हिंसा के गुनाहगारों को चौराहे पर खड़ा कर फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए।
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चाक-चौबंद सुरक्षा, कड़े कानून और कठोर अदालती फैसलों से हमारे समाज को यौन अपराधों से क्या सचमुच मुक्ति मिल जाएगी? थोड़ी देर के लिए हम यह दलील भी मान लें कि देश की हर सड़क, हर ट्रेन, हर बस में पुलिस तैनाती से यौन हिंसा में कुछ कमी आएगी। लेकिन घरों में, दफ्तरों में, खेत-खलिहानों और कारखानों या मठों-आश्रमों में क्या करेंगे?
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अपने बेतुके सुझावों के लिए विवादास्पद महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर आर पाटिल ने मुंबई की घटना के बाद फरमाया कि कोई महिला पत्रकार किसी जोखिम वाले इलाके में अगर जाती है, तो मांगने पर उसे निजी सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। क्या ऐसे कदम समाधान की सार्थक दिशा सुझाते हैं? हमारे वीवीआईपी तो संगीनों की छांव में चौबीसों घंटे रह सकते हैं, पर आम आदमी या आम कामकाजी औरत के पास ऐसा कोई विकल्प कहां है!

पूरे समाज को लगातार असुरक्षित बनाते जाना और किसी घटना-विशेष पर उठे जनाक्रोश के दबाव में आकर किसी व्यक्ति विशेष को निजी सुरक्षा देने की बात असल मुद्दे से ध्यान हटाने का बहाना भर है। पूरे समाज को सुरक्षित करने की पहल क्यों नहीं होती? जाहिर है, इस तरह की सुरक्षा कदम-कदम पर पुलिस की तैनाती से संभव नहीं होगी। मुंबई की महिला पत्रकारों ने किसी खास एसाइनमेंट या जोखिम वाले इलाके में जाते वक्त पुलिस सुरक्षा लेने के सरकारी-प्रस्ताव को सिरे से खारिज करके अच्छी नजीर पेश की है।

अपराध और भय से मुक्त समाज बनाने के बजाय निजी सुरक्षा का चलन भारत जैसे विशाल विकासशील देश में कैसे कारगर हो सकता है! दुनिया के कई विकासशील और अपेक्षाकृत पिछड़े देशों में यह खतरा अपने भयानक रूप में सामने आ चुका है। असमानता-पिछड़ेपन से ग्रस्त होंडूरास के शहर-कस्बे हों, दक्षिण अफ्रीका का जोहान्सबर्ग हो या कांगो का किंशासा, सुबह की सैर पर निकलने वाले गोरे, स्थानीय विशिष्ट लोग और समृद्ध पर्यटक अपने साथ सुरक्षा लेकर चलने को विवश हैं। क्या हमारे राजनेता और नीति-निर्धारक भारतीय नगरों-महानगरों को ऐसा ही बनाना चाहते हैं?

यौन हिंसा की वीभत्स घटनाओं के बाद आम लोगों या भुक्तभोगी परिवारों के बीच से जब अपराधियों को फांसी देने की मांग उठती है, तो उनके सामूहिक गुस्से या निजी आक्रोश की बात समझ में आती है। पर जब संसद के कई वरिष्ठ सदस्यों, सिविल सोसाइटी और वैकल्पिक राजनीति के प्रवक्ताओं को भी यही कहते सुना जाता है, तो हैरत होती है! क्या फांसी के प्रावधान से समाज में हत्याएं या हत्या की साजिशें रुकी हैं?

हमारे शहरों-कस्बों में आज यौन अपराधों के अलग-अलग रूप सामने आ रहे हैं। कई क्षेत्रों में ऐसे अपराधों में सामंती पृष्ठभूमि के दबंग लोगों के अलावा राज्य-एजेंसियों, खासकर पुलिस व सुरक्षा बलों के लोग भी शामिल दिखाई देते हैं। शहरों-कस्बों में गरीब परिवारों के खास किस्म के बेरोजगार-बेहाल युवा लंपट इस तरह के अपराधों की तरफ तेजी से मुखातिब होते दिख रहे हैं।

समय-समय पर मध्यवर्गीय सहकर्मी, अफसर, प्रॉपर्टी डीलर-नेता या बड़े बाबा-तांत्रिक भी आरोपी बनते रहे हैं। पर संपन्न या रौबदार पृष्ठभूमि के लोगों पर यौन हिंसा के आरोप कम लगते हैं और लगते हैं, तो छानबीन के दौर में उन्हें राहत मिल जाती रही है या फिर वे किसी न किसी तरह बरी हो जाते रहे हैं। प्राथमिकी के बावजूद ‘एक बाबा’ को हिरासत में लेने में दस दिन लग जाते हैं।

अपने यहां आरोपों और अदालत में चले मुकदमों के मुकाबले सजा की दर बहुत कम है। विकसित देशों और हमारे देश के बीच यह एक बड़ा फर्क है। ऐसे में कड़ा से कड़ा कानून क्या करेगा? सभाओं-जुलूसों या टीवी चैनलों के पर्दों पर लगने वाली ‘फांसी दो, फांसी दो’ की आवाजें एक खास किस्म के ‘लोकप्रियतावाद’ की अभिव्यक्ति हैं, समस्या का समाधान नहीं।


अगर सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों, अशिक्षा-अज्ञान, बेरोजगारी, तेजी से बढ़ती असमानता और अपराध-दंड विधान की बुनियादी समस्याओं को हल करने की कोशिश नहीं होगी, तो अपराध चाहे वह आम अपराध हों या स्त्री-विरोधी यौन हिंसा, सिर्फ ‘कठोर कानून या कड़े अदालती फैसलों’ से इन्हें कैसे रोका जा सकता है! अपराध और अपराधियों को खुराक देने वाली परिस्थितियों को भी बदलने की जरूरत है।

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