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शिक्षा की बुनियाद कैसे मजबूत हो: राजनीतिक उथल-पुथल और अनिश्चितताओं के बीच भविष्य के मुद्दे पर राष्ट्रीय विमर्श

Thu, 29 Sep 2022 07:13 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 29 Sep 2022 07:13 AM IST
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सार
भारत में जहां 9.9 करोड़ बच्चे ईसीई सेवाओं (जनगणना, 2011) के लिए पात्र हैं, वहीं आंगनवाड़ी सेवाओं के माध्यम से ईसीई सेवाओं और सरकारी स्कूलों में पूर्व-प्राथमिक वर्गों में केवल 3.14 करोड़ बच्चे शामिल हैं।
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strengthen foundation of education: national discourse on future amidst political turmoil uncertainties
(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media

विस्तार

राजनीतिक उथल-पुथल और अनिश्चितताओं के बीच हम अक्सर भूल जाते हैं कि भारत का भविष्य एक ऐसे मुद्दे पर निर्भर है, राष्ट्रीय विमर्श में शायद ही जिसका जिक्र होता है। किसी भी देश का भविष्य उसकी अगली पीढ़ी पर निर्भर होता है और बच्चों का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि शुरुआती उम्र में उसके मस्तिष्क का विकास किस तरह से हुआ। जन्म से लेकर आठ वर्ष तक की उम्र के बच्चे के मस्तिष्क विकास के लिए असाधारण होते हैं और सीखने की क्षमता इन्हीं वर्षों पर निर्भर करती है। 



यूनेस्को का कहना है कि प्रारंभिक बचपन की देखभाल और उस उम्र में दी जाने वाली शिक्षा सही अर्थों में समावेशी हो, तो वह प्राथमिक विद्यालय में दाखिले दिलाने की तैयारी से कहीं अधिक उपयोगी होती है। जन्म से लेकर छह वर्ष की उम्र तक बच्चों के मस्तिष्क का विकास सर्वाधिक तेजी से होता है। शोध से पता चला है कि मस्तिष्क के विकास की नींव और बाद में आजीवन विकास क्षमता- शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक क्षमताएं - एक बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्षों में अन्योन्याश्रित और निर्धारित होती हैं। 


यही कारण है कि तीन से छह साल के बच्चों के लिए एक मजबूत और व्यापक प्रारंभिक बचपन शिक्षा (ईसीई) कार्यक्रम, इस आयु वर्ग की विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए, न केवल बच्चे के लिए, बल्कि समुदाय और देश के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन अधिकांश विकासशील देशों में इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके बावजूद भारत में यह कोई मुद्दा नहीं है और न ही मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा है, क्योंकि बच्चे कोई वोट बैंक नहीं। 

बहुत थोड़े से अभिभावक वाकिफ हैं कि प्रारंभिक बचपन शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण है। बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 संभवतः पहली शिक्षा नीति है, जिसने ईएसई के सार्वभौमिकरण पर जोर दिया है और 2030 तक प्रारंभिक बचपन शिक्षा (ईसीई) को सार्वभौमिक बनाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त वित्तीय निवेश की जरूरत है। एनईपी, 2020 ईसीई को 'वित्तपोषण के लिए प्रमुख दीर्घकालिक जोर क्षेत्रों' में से एक के रूप में उजागर तो करती है, यह ईसीई के सार्वभौमिकरण के लिए आवश्यक धन की मात्रा पर चुप है। 

सेंटर फॉर बजट ऐंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए) और एक गैर सरकारी संगठन सेव द चिल्ड्रेन के एक संयुक्त अध्ययन, (भारत में प्रारंभिक बचपन शिक्षा के सार्वभौमिकरण की लागत) ने भारत में ईसीई सेवाओं के सार्वभौमिकरण किए जाने की जोरदार तरीके से पैरवी की है। भारत में, तीन से छह साल की उम्र के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन शिक्षा (ईसीई) पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.1 फीसदी है। 

भारत में जहां 9.9 करोड़ बच्चे ईसीई सेवाओं (जनगणना, 2011) के लिए पात्र हैं, वहीं आंगनवाड़ी सेवाओं के माध्यम से ईसीई सेवाओं और सरकारी स्कूलों में पूर्व-प्राथमिक वर्गों में केवल 3.14 करोड़ बच्चे शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, एनजीओ और अन्य संगठनों द्वारा संचालित विभिन्न प्रकार के प्री-स्कूलों से बच्चों के एक छोटे अनुपात को यह सेवाएं मिल पा रही हैं। करीब 3.7 करोड़ बच्चों को ईसीई सेवा नहीं मिलती। 

अध्ययन गुणवत्तायुक्त ईसीई सेवा तक पहुंच में भिन्नता को भी इंगित करता है, क्योंकि प्रति बच्चा वार्षिक औसत खर्च सरकारी संस्थानों में 1,030 से लेकर निजी संस्थानों में 12,834 रुपये तक है। यानी भारत में ईसीई कवरेज और गुणवत्ता दोनों के मामले में पीछे है। यहां तीन से छह वर्ष तक के बच्चों की ईसीई जरूरतें पूरी करने के लिए सरकार से पर्याप्त संसाधनों की जरूरत है। 

सीबीजीए और सेव द चिल्ड्रन के अध्ययन में कहा गया है कि गुणवत्ता ईसीई सेवाओं के लिए प्रति बच्चा सालाना औसत अनुमानित लागत ₹32,531 (व्यावहारिक लागत) से ₹56,327 (इष्टतम लागत) के बीच है। 2020-21 में, अरुणाचल प्रदेश के अलावा, अन्य सभी भारतीय राज्यों ने प्रारंभिक बचपन शिक्षा सेवाओं (ईसीई) पर प्रति बच्चे 32,531 रुपये से कम खर्च किया, जो गुणवत्तायुक्त ईसीई की न्यूनतम लागत है। सरकार के लिए आंगनवाड़ी सेवाओं पर अपने खर्च को बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

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