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तेजस की कहानी: रक्षा मंत्री की उड़ान से पूरे देश में गया सकारात्मक संदेश

प्रशांत दीक्षित Updated Sat, 21 Sep 2019 09:24 AM IST
Rajnath Singh Tejas
Rajnath Singh Tejas - फोटो : PTI
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इसमें कोई संदेह नहीं कि तेजस लड़ाकू विमान पर भारत के रक्षा मंत्री की उड़ान से न केवल भारतीय वायु सेना, बल्कि पूरे देश में बड़े पैमाने पर सकारात्मक संदेश गया है। लेकिन क्या इसका केवल प्रतीकात्मक महत्व है या इससे हमारी लड़ाकू क्षमता की कमियों को दूर करने में मदद मिलेगी? यह खबर केवल हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) की कहानी बताती है, जो वास्तव में 1969 में शुरू हुई थी, जब भारत सरकार ने सहमति व्यक्त की थी कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड(एचएएल) को लड़ाकू विमान का डिजाइन और विकास करना चाहिए। चुनौती केवल एक बेहतर इंजन खोजने की थी। हालांकि एचएएल ने 1975 में ही डिजाइन का अध्ययन पूरा कर लिया था, लेकिन विदेशी निर्माताओं से बेहतर इंजन का चयन नहीं किया जा सका, इसलिए भारतीय वायुसेना की जरूरत पूरी नहीं हो सकी।
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जैसे-जैसे समय बीतता गया, 1983 में भारतीय वायुसेना ने महसूस किया कि उसे पुराने हो चुके अपने मिग-21 लड़ाकू विमानों को बदलना है, जो 1970 के दशक से वायुसेना का मुख्य आधार था। हल्के लड़ाकू विमानों को घरेलू विमान उद्योग और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने के रूप में देखा गया। वर्ष 1984 में भारत सरकार ने एलसीए कार्यक्रम का प्रबंधन करने और एचएएल के साथ तेजस विकास की जिम्मेदारी संभालने के लिए एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) की स्थापना की। 'आत्मनिर्भरता' के लिए, फ्लाई-बाय-वायर, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, मल्टी-मोड पल्स-डॉप्लर रडार और आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन पर काम करना महत्वपूर्ण था। सभी स्तरों पर निर्णय लेने में संकोच के अलावा असली बाधा 1998 में आई, जब अमेरिकी विमान निर्माता लॉकहीड मार्टिन की भागीदारी को 1998 में भारत द्वारा दूसरे परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया में अमेरिकी प्रतिबंध के चलते समाप्त कर दिया गया। मेरा मानना है कि यह हमारी कठिनाइयों की शुरुआत थी, जिसने हमें एक ऐसे चरण में पहुंचा दिया, जहां से तेजस का विकास कष्टकर बन गया।

वर्ष 2002 के मध्य तक इस परियोजना को भारी देरी और लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा। मसलन, वांछित इंजन की जगह एक तैयार विदेशी इंजन का इस्तेमाल किया गया। इस चरण में आकर तेजस की कहानी रक्षा प्रतिष्ठान के भीतर ही अक्तूबर, 2015 में विवादों में फंस गई, वायुसेना के एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने पुष्टि की कि वायुसेना ने तेजस मार्क-1 के 123 विमानों (छह स्क्वाड्रन) का ऑर्डर देने की योजना बनाई है, यह पहले खरीदे जाने वाले 40 विमानों का तीन गुना था। बाद में घोषणा की गई कि 83 अतिरिक्त तेजस का ऑर्डर उन्नत मार्क1 ए संस्करण के लिए है।

सात नवंबर, 2016 को तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने वायुसेना के लिए 50,025 करोड़ रुपये में 83 तेजस की खरीद को मंजूरी दी। प्रति विमान की कीमत 250 से 275 करोड़ रुपये के बीच निर्धारित किए जाने के बाद इस वर्ष के अंत तक इन विमानों के मिलने की उम्मीद है। एचएएल को उम्मीद थी कि मार्च, 2020 तक वह प्रति वर्ष कम से कम एक स्क्वाड्र्न (सोलह से अधिक) विमानों के उत्पादन की क्षमता हासिल कर लेगा। इस प्रकार तीन साल बीत गए और अब तक कोई फैसला नहीं हुआ। वर्ष 2018 में वायुसेना ने सभी संस्करणों के कुल 324 तेजस को वायुसेना में शामिल करने की प्रतिबद्धता जताई थी, अगर एचएएल और एडीए समय पर गुणवत्तापूर्ण तेजस मार्क-2 उपलब्ध करा सके।

भारतीय नौसेना को 50 तेजस विमानों की जरूरत है। नौसेना के हल्के लड़ाकू विमान के पहले प्रतिरूप ने अपनी पहली उड़ान लगभग दो वर्ष बाद 27 अप्रैल, 2012 को भरी थी। हैरानी की बात है कि उसका एरेस्टर बैरियर टेस्ट सात वर्ष बाद कुछ दिनों पहले यानी 13 सितंबर, 2019 को हुआ है। संतोष की बात यह है कि कुल 35 प्रमुख घटकों में से मात्र तीन में विदेशी प्रणालियां शामिल हैं। परमाणु परीक्षण के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के चलते आयात की जाने वाली कई चीजों को स्थानीय स्तर पर विकसित किया गया। जाहिर है, इन प्रतिबंधों के चलते हल्के लड़ाकू विमानों के विकास में काफी देरी हुई। वायुसेना ने 2011 में बंगलूरू में पहला स्क्वाड्रन खड़ा किया और 20 दिसंबर, 2013 को विमान को वायुसेना के नियमित पायलटों द्वारा उड़ाए जाने को मंजूरी दी गई और स्क्वाड्रन सेवा में शामिल किया जाने लगा। बीवीआर मिसाइलों और बंदूकों आदि से संबंधित छह और मानदंडों के लिए लड़ाकू विमान को प्रमाणित किया गया। 20 फरवरी, 2019 को एयरो इंडिया 2019 के दौरान तेजस को बिना बंदूकों के औपचरिक तौर पर अंतिम परिचालन मंजूरी मिल गई। लेकिन तेजस की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि तेजस को लेकर कुछ नए घटनाक्रम होने वाले हैं। क्योंकि वायुसेना की वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के लिए तेजस मार्क1 को और उपयुक्त बनाने वाला तेजस मार्क 1 ए उसका उन्नत संस्करण है। उपलब्ध जानकारियों से संकेत मिलता है कि तेजस मार्क 1ए के उन्नत संस्करण को अब इलेक्ट्रॉनिक एर्रे रडार (एईएसए) से जोड़ा जाएगा, जिसे इस्राइल के सहयोग से विकसित किया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि स्वदेशी कावेरी इंजन के प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए एक परियोजना शुरू की जाएगी, जिसे बाद में मार्क 1 ए प्रकार के विमानों में लगाया जाएगा। कावेरी इंजन का प्रदर्शन मौजूदा जीई 414 इंजन की तरह ही होने की संभावना है। लेकिन इसमें अभी और दो वर्ष लगेंगे। भारतीय वायुसेना द्वारा मार्क 1 ए की स्वीकृति का मतलब होगा कि विमान की परिचालन जरूरतें स्वीकार्य मानदंडों तक पहुंच गई हैं। ऐसा माना जाता है कि स्टेल्थ टेक्नोलॉजी (जिसके जरिये विमानों को पकड़ में आने से बचाने के लिए अदृश्य बनाया जाता है) के लिए काम चल रहा है। बीवीआर मिसाइलों और शक्तिशाली कावेरी इंजन के एकीकरण के साथ तेजस बहुत शक्तिशाली हवाई हथियार साबित होगा।

लेकिन वास्तव में समय सीमाओं का कोई स्पष्ट संकेत नहीं है और न ही वित्तीय परिव्यय का आकलन है। कई नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। निजी क्षेत्र के उद्योंगों द्वारा विभिन्न खंडों में घटकों के निर्माण की योजना है और एचएएल प्रमुख ठेकेदार तथा अंतिम उत्पाद के इंटीग्रेटर के रूप में काम करेगा।
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