फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Story of Kalpana Saroj female Indian entrepreneur

मंजिलें और भी हैं: बाल-विवाह से खुद को निकालकर बनी उद्यमी

Wed, 04 Sep 2019 12:30 AM IST
देव कश्यप कल्पना सरोज
कल्पना सरोज Published by: देव कश्यप Updated Wed, 04 Sep 2019 12:30 AM IST
विज्ञापन
Story of Kalpana Saroj female Indian entrepreneur
Kalpana Saroj - फोटो : अमर उजाला

मैं ऐसे समाज से आती हूं, जहां आज भी लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने-लिखाने के बारे में नहीं सोचा जाता है। मेरा जन्म महाराष्ट्र के अकोला के एक छोटे से गांव रोपरखेड़ा में एक दलित परिवार में हुआ। बचपन से ही मैं खूब पढ़ना चाहती थी। मेरे पिताजी, जो पुलिस कांस्टेबल थे, मुझे पढ़ाना चाहते तो थे, पर जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तब मामा के दबाव में आकर उन्होंने मेरी शादी करा दी। उस समय मेरी उम्र बारह साल थी, जबकि मेरे पति की उम्र बाईस साल थी। 


loader

मैं ऐसे समाज से आती हूं, जहां आज भी लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने-लिखाने के बारे में नहीं सोचा जाता है। मेरा जन्म महाराष्ट्र के अकोला के एक छोटे से गांव रोपरखेड़ा में एक दलित परिवार में हुआ। बचपन से ही मैं खूब पढ़ना चाहती थी। मेरे पिताजी, जो पुलिस कांस्टेबल थे, मुझे पढ़ाना चाहते तो थे, पर जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तब मामा के दबाव में आकर उन्होंने मेरी शादी करा दी। उस समय मेरी उम्र बारह साल थी, जबकि मेरे पति की उम्र बाईस साल थी। 

मेरे ससुरालवाले मुंबई के पास कल्याण में रहते थे। इस तरह मैं महाराष्ट्र के अकोला जिले से कल्याण आ गई। शादी के बाद मेरी जिंदगी ही बदल गई। मेरे साथ घरेलू उत्पीड़न होने लगा। यहां बात-बात पर मेरे साथ बदसलूकी की जाती। छोटी-मोटी गलतियों पर मारपीट की जाती थी। मैं अपने जीवन के सबसे खराब दौर से गुजर रही थी। शादी के करीब छह माह बाद मेरे पिताजी किसी काम से मुंबई आए थे। उन्हें सामने देखकर मेरे धैर्य की सीमा टूट गई, मैं रोने लगी। पापा मुझे वापस अकोला ले आए, लेकिन यहां आकर परेशानी कम होने के बजाय बढ़ गई। मेरे ही समाज के लोगों ने मेरा बहिष्कार करना शुरू कर दिया। उनके अनुसार मैं एक अमर्यादित पत्नी थी।

इस सबके चलते मैं अवसाद में चली गई। और एक दिन मैंने चूहे मारने की दवा खाकर आत्महत्या की कोशिश भी की, पर नियति ने मुझे बचा लिया। मैं जब पूरी तरह ठीक हो गई, तो मां से कहा कि मैं मुंबई जाना चाहती हूं। पापा ने पहले तो मना कर दिया, लेकिन बाद में मान गए। मैं मुंबई में अपने चाचा के यहां आ गई। यहां आकर मुझे एक होजरी कंपनी में काम मिल गया। हालांकि मैं टेलरिंग का काम करने गई थी, पर मेरा आत्मविश्वास इतना डिगा हुआ था कि मशीन ही नहीं चला पाई। उन्होंने मुझे प्रति दिन के हिसाब से, सिलाई के बाद लटकने वाला एक्स्ट्रा धागा काटने का काम दे दिया। जब सब लंच करने के लिए चले जाते तो मैं चुपके से मशीन पर बैठ जाती।

जब लोगों ने देखा कि मुझे मशीन चलानी आती है, तो सिलाई का काम दे दिया गया। परिवार के साथ संघर्ष करते हुए मैंने लोन लेकर सिलाई मशीन खरीदी। धीरे-धीरे मैं व्यवसायिक गतिविधियों में सक्रिय होने लगी। मैंने दोबारा शादी की, दूसरे पति व्यवसायी थे। मुझे हमेशा से समाज के लिए, खासतौर से महिलाओं और बेरोजगारों के लिए कुछ करने की इच्छा होती थी। मैंने सुशिक्षित बेरोजगार संगठन की स्थापना की।

यहां मैंने बेरोजगारों को एक प्लेटफॉर्म दिया और व्यवसाय शुरू कराने के लिए उन्हें लोन दिलवाया। तब मैं घाटे में चल रही कमानी ट्यूब्स लिमिटेड के बोर्ड में शामिल थी। कंपनी बंद होने के कगार पर थी, जब कुछ मजदूर मेरे पास आए और कंपनी को चलाने का आग्रह करने लगे। उनकी व्यथा देखकर मैंने हामी तो भर दी, पर समझ में नहीं आ रहा था कि उतने पैसे कहां से ले आऊं। मैंने दस लोगों की एक टीम बनाकर एक प्रस्ताव तैयार किया और बैंक को दिखाया।

बाद में हमारा प्रस्ताव पास हो गया और मुझे कानूनी रूप से कंपनी का चेयरपर्सन घोषित कर दिया गया। कई तरह की चुनौतियों को पार करते हुए 2009 में मैंने दोबारा प्लांट लगवाकर प्रोडक्शन शुरू करवाया। किस्मत ने मेरा साथ दिया, आज कमानी ट्यूब्स लिमिटेड मुनाफा कमाने वाली कंपनी बन गई है। मैंने विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय खुलवाया है, साथ ही उनकी आर्थिक मदद भी करती हूं। मेरा मानना है कि यदि आप मेहनत, लगन, जिद, सकारात्मक सोच और विश्वास से काम करते हैं, तो आपको सफलता जरूर मिलती है।

(पद्मश्री से सम्मानित महिला उद्यमी के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed