मानसून सत्र का तूफान
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ऐसा लगता है कि आज से शुरू हो रहा संसद का मानसून सत्र उस राजनीतिक तूफान में बह जाएगा, जिसमें गरज के साथ मूसलाधार बारिश होने की भी आशंका है। एक तरफ मोदी सरकार, तो दूसरी ओर तमाम विपक्षी पार्टियों के साथ खड़ी कांग्रेस इस तरह तकरार के मूड में हैं कि दोनों में समझौते की कम ही गुंजाइश है, सर्वानुमति की तो बात ही छोड़ दें। ज्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी यही मानना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के हठकारी रवैये से इस सत्र में रचनात्मक बहस की भी अपेक्षा नहीं है, विधायी कामकाज होने का तो सवाल ही नहीं है।
एक महीना पहले भी सत्ताधारी राजग आश्वस्त था कि कांग्रेस तथा दूसरी पार्टियों के सहयोग से कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करा लिया जाएगा। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में उसने खुद ही यह उम्मीद छोड़ दी है। सरकार ने इस सत्र की अवधि एक सप्ताह कम कर दी है। यानी उसे भी इस दौरान कामकाज होने की बहुत उम्मीद नहीं है। बल्कि मानसून सत्र से पहले भाजपा सांसदों और नेताओं की जो बैठकें हुईं, जिनमें से पहली बैठक नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई और दूसरी अमित शाह की अध्यक्षता में, उनमें हाल के सप्ताहों में जो विविध घोटाले और विवाद सामने आए हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में विपक्ष के आरोपों को भोथरा कर देने की तैयारियां की गईं।
प्रधानमंत्री को और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को भी इसका एहसास है कि महीने भर से भी ज्यादा समय तक मीडिया में छाए ललित गेट, व्यापम और सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े दूसरे विवादास्पद मुद्दों को देखकर, और उनसे भारी राजनीतिक लाभ हासिल करने की संभावना भांपकर कांग्रेस ने तकरार का रास्ता चुना है। ऐसे ही घोटालों और विवादों के कारण करीब चौदह महीने पहले केंद्र की सत्ता गंवा चुकी कांग्रेस अब बदला देने के लिए तैयार है। यह कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की उस आक्रामक प्रतिक्रिया से भी स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने कहा है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफों के बगैर संसद में विधायी कामकाज चलने देने का सवाल ही नहीं है।
कांग्रेस द्वारा सरकार को दी गई इस खुली चुनौती से लगता है कि उसे एकाधिक विपक्षी पार्टियों का समर्थन हासिल है; हालांकि यह अभी देखना है कि इस मुद्दे पर पूरे विपक्ष को एकजुट किया जा सकता है या नहीं। पहले भाजपा यह मानकर चल रही थी कि वह मानसून सत्र के दौरान विपक्ष को बहुत आसानी से विभाजित कर देगी। हालांकि तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल ने उस जोर-शोर से विवादित भाजपा नेताओं का इस्तीफा नहीं मांगा, लेकिन इस मुद्दे पर वे सरकार का साथ देंगे, इसकी भी उम्मीद नहीं है। उदाहरण के लिए, तृणमूल कांग्रेस ने भले ही ललित गेट पर कुछ न कहा हो, लेकिन उसने व्यापम घोटाले की, और उसमें भी इतने सारे लोग जिस संदिग्ध तरीके से मारे गए हैं, उसकी निंदा की है।
सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक के जरिये विपक्ष तक पहुंचने और हर सांसद को संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का समर्थन करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का भी, लगता है, कोई असर नहीं पड़ा है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के समर्थन की संभावना इसलिए भी धूमिल पड़ी है, क्योंकि बीजू जनता दल और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों ने भी अपना पुराना रवैया छोड़कर अब इसके कई संशोधनों का विरोध करने का फैसला किया है। भाजपा इस अध्यादेश पर अब अकाली दल और शिवसेना जैसे अपने गठबंधन सहयोगियों के बिना शर्त समर्थन के प्रति भी आश्वस्त नहीं है। इन दोनों ही पार्टियों ने पिछले दिनों इस अध्यादेश के कई पहलुओं से जुड़े कुछ असुविधानजक सवाल उठाए हैं।
सरकार अब यह भी तय नहीं कर पा रही कि वह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को पारित कराने के अंतिम विकल्प के तौर पर संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र बुलाने का खतरा उठाए या नहीं। चूंकि राज्यसभा में सरकार के पास संख्याबल नहीं है, ऐसे में लगातार चौथी बार राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी करने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं है। अलबत्ता संघ परिवार के भीतर से भी इस अध्यादेश के विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी के इस सबसे महत्वाकांक्षी विधेयक के पारित होने की संभावना क्षीण नजर आती है। संसद में राजनीतिक महाभारत का नुकसान उस वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक को भी होना है, जिसके बारे में कुछ दिनों पहले तक भी ऐसी अनिश्चयता नहीं थी। चूंकि सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने इस विधेयक को प्रस्तावित किया था, इसलिए उम्मीद थी कि कांग्रेस के समर्थन से यह विधेयक पारित हो जाएगा। लेकिन कांग्रेस अब इस सरकार के कामकाज को बाधित करने के मूड में है। हाल के दिनों में सामने आए घोटालों पर विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी से चुप्पी तोड़ने की जो मांग की है, उसे मानते हुए प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं या नहीं, इस सत्र में यह भी देखने वाली बात होगी। हालांकि चुप्पी तोड़ने से ही विपक्ष शांत हो जाएगा, इसकी उम्मीद कम है, क्योंकि यदि मोदी बोलते हैं, तो अपने मंत्री और मुख्यमंत्रियों को बचाने का ही जतन करेंगे।
दूसरी ओर, यह सत्र कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अपनी वक्तृत्व क्षमता को विस्तार देने का एक और सुनहरा मौका प्रदान करेगा। सरकार की मौजूदा मुश्किलें संभवतः राहुल गांधी को और आक्रामक होने की वजह बने। लेकिन यह भी तय है कि वैसे में राहुल को सत्ता पक्ष की ओर से खासकर रॉबर्ट वाड्रा से संबंधित जवाबी हमला झेलने के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा।
-वरिष्ठ पत्रकार और बहनजी-ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक