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महंगी दवाओं से मुक्ति की दिशा में
उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 01 Oct 2012 01:44 PM IST
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शरद पवार की अध्यक्षता वाले एक मंत्री समूह ने 348 जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रण के दायरे में लाने को मंजूरी देकर एक अच्छा कदम उठाया है। इससे कुछ दवाओं को मनमानी कीमतों पर बेचने की मल्टीनेशनल कंपनियों को छूट नहीं मिल सकेगी। यह निश्चित तौर पर जनता के लिए राहत की बात होगी।
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जिन दवाओं की कीमतें नियंत्रण के दायरे में लाई जा रही हैं, उनका कुल सालाना कारोबार 29,000 करोड़ का है। जबकि देश का कुल दवा कारोबार ही करीब 60,000 करोड़ रुपये का बताया जाता है। अगर इसमें से सिर्फ 348 दवाओं का कारोबार ही 29,000 करोड़ रुपये का है, तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके तहत कितनी जीवन रक्षक दवाएं आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन दवाओं के कारोबार को नियंत्रण के दायरे में लाने की कोशिशें पहले क्यों नहीं की गईं।
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सबसे पहले तो इन दवाओं के बारे में मोटी-मोटी बातें जान लेनी चाहिए। देश में तकरीबन 600 दवाएं चलन में हैं, जिनके करीब 80,000 फॉरमूले चलन में हैं। इन्हें सामान्य लोगों या फार्मेसिस्ट के लिए समझ पाना आसान नहीं है। उदारीकरण के दौर में इसका फायदा देसी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में जमकर उठाया। एक ही फॉरमूले की दो कंपनियों की दवाओं के न सिर्फ नाम, बल्कि कीमतों में भी जमीन-आसमान का अंतर रहा है।
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मसलन, बुखार से लेकर कटे, जले के इलाज में अमौक्सीसिलिन, सिप्रोफ्लाक्सासिन, एजिथ्रोमाइसिन, ओ-फ्लॉक्सासिन, अमौक्सीसिलिन और लॉक्सासाइकिलिन जैसे सॉल्ट का अंगरेजी दवाओं में इस्तेमाल किया जाता हैं। इनसे तमाम कंपनियां तमाम नामों से दवाएं बनाती हैं, लेकिन इनके दाम में जबर्दस्त अंतर है। वैसे तो दवाओं की कीमत में इतने भारी अंतर पर सबसे पहले ध्यान कुछ साल पहले तब गया था, जब डिस्प्रिन की पच्चीस पैसे वाली गोली को उसकी निर्माता कंपनी ने बाजार से हटाकर सवा रुपये प्रति गोली में दूसरे नाम से उतार दी थी। तब मचे हो-हल्ले के बाद तत्कालीन रसायन मंत्री रामविलास पासवान ने दवा कंपनियों पर नियंत्रण लगाने का ऐलान तो किया था, लेकिन वह महज ऐलान ही रह गया।
एक ही तरह की दवाओं की कीमतों में इतने अंतर की तरफ आमिर खान के कार्यक्रम सत्यमेव जयते ने पहली बार ध्यान दिलाया था। जब उन्होंने अपने कार्यक्रम में जेनरिक यानी मूल नामों से दवाएं बेचने की वकालत की, तो दवा उद्योग और चिकित्सा तंत्र के कुछ तत्व इसके खिलाफ खड़े हो गए थे। उनका कहना था कि सिर्फ जेनरिक दवाएं बेचने की छूट देना देश के स्वास्थ्य से खिलवाड़ होगा। उनका कहना था कि एथनिक यानी ब्रांडेड दवाओं की गुणवत्ता बेहतर होती है, क्योंकि उनमें कुछ और सॉल्ट भी मिलाए गए होते हैं और उन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की भी निगाह रहती है। लेकिन एथनिक दवाओं के नाम पर जो नकली दवाएं बिक रही हैं, उसकी रोकथाम के लिए उनके पास कोई कारगर रणनीति नहीं है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के एक अनुमान के मुताबिक, देश में बिक रही 20 से 45 फीसदी दवाएं नकली हैं। सत्यमेव जयते के खुलासे के बाद स्वास्थ्य मामलों पर संसद की स्थायी समिति ने आमिर खान को बुलाया भी और बाद में उसने इस दिशा में माहौल बनाने में मदद जरूर की।
बहरहाल कैबिनेट ने जो फॉरमूला तय किया है, उसके तहत 74 की जगह 348 दवाओं को नियंत्रण में लाया जाएगा। इनकी कीमतों में बढ़ोतरी साल में 10 फीसदी से ज्यादा नहीं की जा सकेगी और बिना सरकारी अनुमति के ऐसा नहीं होगा। वैसे अभी तक कीमत निर्धारण का जो फॉरमूला है, उसमें कुल लागत और अधिकतम सौ फीसदी मुनाफा के आधार पर दवा की कीमत तय की जाती रही है। पर अब जरूरी दवाओं की कीमतें संबंधित दवा की बाजार में एक फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी के आधार पर तय की जाएंगी। सिर्फ फॉरमूला तय कर देने भर से जनता को फायदा नहीं मिलने वाला। इसके लिए मजबूत निगरानी तंत्र की भी जरूरत होगी। नहीं तो सरकारी अनदेखी और नौकरशाही की मिलीभगत के चलते दवा कंपनियां कमाई का नया रास्ता निकाल लें, तो अचरज नहीं।