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स्वास्थ्य सेवा का हाल
तवलीन सिंह
Updated Sun, 05 Aug 2018 06:46 PM IST
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तवलीन सिंह
धीरज अच्छी बात है, पर कुछ चीजों में हम भारतीयों ने इतना धीरज दिखाया कि देश का नुकसान हुआ है। आम आदमी के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बेकार हैं कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग भी निजी अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए मजबूर हैं। फिर भी हम दशकों से इस पर धीरज रखे हुए हैं।
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उधर हमारे मंत्री हैं, जो बीमार पड़ते ही अमेरिका या यूरोप के बेहतरीन अस्पतालों में इलाज करवाने चले जाते हैं। हमारे मार्क्सवादी और समाजवादी राजेनताओं को भी बिल्कुल संकोच नहीं होता, जब हमारे पैसों से वे विदेशों में अपना इलाज करवाने जाते हैं। हम हैं कि उनसे पूछते तक नहीं कि वे लोग कहां जाते हैं, और उनके इलाज पर कितना खर्च होता है। क्या यह धीरज की हद नहीं है?
हमारे अपार धीरज का परिणाम यह है कि आज देश में इतने बेहतरीन निजी अस्पताल बन चुके हैं कि विदेशों से यहां मरीज आते हैं। लेकिन सरकारी अस्पताल वैसे के वैसे ही हैं, जैसे बीस साल पहले हुआ करते थे। वही गंदगी, वही डॉक्टरों की लापरवाही, दवाओं का वही अभाव और बुनियादी सुविधाओं का इतना गंभीर अभाव कि बड़े से बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों के रिश्तेदार अक्सर बाहर सड़कों पर सोते हुए दिखते हैं।
पिछले सप्ताह बिहार के उस अस्पताल की तस्वीर आपने भी देखी होगी, जिसके कमरों में बरसात का इतना पानी भर गया था कि मरीजों के पलंग आधे डूब गए थे। ऐसी स्थिति में धीरज रखना अच्छी बात है क्या?
मेरी राय में अच्छी बात बिल्कुल नहीं है। मेरी राय में कम से कम भाजपा शासित राज्यों में अभी तक परिवर्तन दिखना चाहिए था। नरेंद्र मोदी के दौर में हमने देखा है कि जब प्रधानमंत्री किसी क्षेत्र में दिल से परिवर्तन लाने की ठान लेते हैं, तो परिवर्तन आ ही जाता है। जब उन्होंने ठान लिया कि खुले में शौच करने की आदत रोकनी जरूरी है, तो पिछले चार साल में इतनी तेजी से परिवर्तन आया है कि 2014 में जहां 70 फीसदी से अधिक ग्रामीण खुले में शौच किया करते थे, आज यह आंकड़ा तकरीबन उल्टा हो गया है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में केवल 38.7 प्रतिशत भारतीय घरों में शौचालय थे। आज 69.4 फीसदी घरों में शौचालय हैं और सर्वेक्षण बताते हैं कि अब नब्बे फीसदी से अधिक परिवार इन शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं।
अगर प्रधानमंत्री अपने मुख्यमंत्रियों के जरिये परिवर्तन का लक्ष्य ठान लें, तो स्वास्थ्य क्षेत्रों में भी इतनी तेजी से परिवर्तन लाया जा सकता है।
ऐसा नहीं कि नरेंद्र मोदी जानते नहीं कि देश भर में स्वास्थ्य सेवाएं बेहाल हैं। इनको सुधारने के मकसद से पिछले बजट में प्रधानमंत्री बीमा योजना की उन्होंने घोषणा की थी। काश, साथ में उन्होंने कम से कम उन राज्यों में सरकारी अस्पतालों को भी सुधारने का काम किया होता, जहां उनके अपने मुख्यमंत्री हैं। अगर सरकारी अस्पतालों की स्थिति में कोई सुधार नहीं लाया जाता, तो बीमा योजना किस काम की होगी?
जब तक देशवासी इन चीजों को लेकर धीरज दिखाते रहेंगे, तब तक सुधार नहीं आने वाला। सो हम कम से कम इतना तो कह सकते हैं कि मंत्रियों के लिए विदेशों में इलाज करवाने की सुविधाएं बंद की जाएं। कहने को यह छोटा-सा कदम लगता है, लेकिन जब हमारे राजनेताओं को यह लगने लगता है कि जनता समझदार हो गई है, तो वे खुद सावधान होने लग जाते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लोगों ने जरूरत से ज्यादा धीरज इसलिए दिखाया है, क्योंकि उनमें न आधुनिकता आई है, न सुधार।