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स्थायी सरकार, लेकिन चुनौतियां अपार
रविभूषण
Updated Sat, 27 Dec 2014 02:32 AM IST
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करीब सात महीने पहले जब झारखंड में संसदीय चुनाव हुए थे, तो भारतीय जनता पार्टी के खाते में 12 सीटें आई थीं, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा को दो सीटों पर सफलता मिली थी।
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यानी तब भाजपा को झामुमो से छह गुना ज्यादा सीटें मिली थीं। उस समय 56 विधानसभा सीटों में भाजपा को बढ़त थी। और अब राज्य विधानसभा चुनाव की कुल 81 सीटों में भाजपा को 37 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि झामुमो को 19। इसका अर्थ यह है कि भाजपा को झामुमो से महज दो गुना सीटें ज्यादा मिली हैं।
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इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड में जिस 'मोदी लहर' के होने की बात कही जा रही थी, वह नहीं है। अगर ऐसा कुछ होता, तो हरियाणा की तरह, यहां भी भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलता। मगर यह अच्छी बात है कि राज्य में पहली बार स्थायी सरकार बनती दिख रही है। ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के साथ भाजपा का गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर गया है।
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इस विधानसभा चुनाव को भले ही 'मोदी की जीत' जैसे जुमलों पर कसा जाए, पर वास्तव में इन नतीजों का संदेश दूसरा है। तीन बार मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो, राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की हार बता रही है कि लोग इन नेताओं की नीतियों को अब नकार चुके हैं।
चूंकि अर्जुन मुंडा के समय ही सबसे अधिक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसलिए इसका एक अर्थ यह भी है कि लोग इसे लेकर शंकाकुल हैं। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां 'पूर्ण बहुमत, संपूर्ण विकास' तथा 'बाप-बेटों की सरकार' जैसे नारों का भी खूब प्रयोग किया था।
मगर भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि उसकी 'संपूर्ण विकास' संबंधी अवधारणा पर भी जनता ने पूरा भरोसा नहीं जताया है।
साथ ही, बार-बार 'बाप-बेटों' पर चोट करने के बाद भी उत्तरी छोटानागपुर जैसे अपने गढ़ में उसे झामुमो के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा है। हालांकि इसके वाद भी भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी है, तो इसकी कई वजहे हैं। असल में, उसके खिलाफ कोई मजबूत गठबंधन नहीं था।
कांग्रेस की विवेकहीनता की वह चरम स्थिति थी, जब उसने चुनाव से ऐन पहले झामुमो से गठबंधन तोड़ लिया। अगर दोनों पार्टियां एक साथ होतीं, तो आज तस्वीर कुछ अलग होती। हेमंत सोरेन दुमका के अपने गढ़ में भाजपा की लुई मरांडी से मात नहीं खाते। इसके अलावा, भाजपा ने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। 'अच्छी सरकार' का उसका वायदा भी लोगों को पसंद आया, क्योंकि यह ऐसा राज्य है, जिसने करीब डेढ़ दशक की अपनी यात्रा में नौ बार मुख्यमंत्री बदलते देखा है और तीन बार यहां राष्ट्रपति शासन लगा है।
बहरहाल, भाजपा अब सत्ता की कुर्सी तक जरूर पहुंच गई है, मगर उसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। चूंकि उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, इसलिए वह आजसू पर निर्भर हो गई है, जिस कारण आजसू का दबाव उस पर बना रहेगा। इसके अतिरिक्त, झारखंड खनिज-संपदा के लिहाज से सर्वाधिक 'धनी राज्यों' में है, जिस कारण कॉरपोरेट की निगाह भी इस पर है। इसलिए देखना यह होगा कि भाजपा की विकास नीति किसके लाभ के लिए होगी।
भाजपा 'सबका साथ-सबका विकास' की बात कहती है। मगर सबके विकास नारे की वास्तविकता भी उसे स्पष्ट करनी होगी, क्योंकि 'सबके विकास' में दीकु (आदिवासियों के लिए शोषक वर्ग) भी शामिल होंगे, महाजन भी और जिन्हें लूटा जा रहा है, वे भी। चूंकि झारखंड एकमात्र ऐसा आदिवासी राज्य है, जहां जनांदोलन अब भी मौजूद है।
इसलिए लोगों से जुड़े मुद्दों पर राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी झामुमो चुप नहीं बैठेगी, और वह मुखर विपक्ष की भूमिका में दिखेगी। भाजपा ने प्रचार के क्रम में जिस 'अच्छी सरकार' का वायदा किया है, उसे भी अब कसौटी पर कसा जाएगा। यहां अच्छी सरकार का मतलब सिर्फ 'सुशासन' नहीं है।
उसे ईमानदार, पारदर्शी और जनसरोकार से जुड़ी सरकार भी दिखना होगा। सभी नागरिकों के सांविधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी है और यह राज्य आदिवासियों के साथ ही इसाई और मुसलमान बहुल भी है, इसलिए सबके हितों की रक्षा की जिम्मेदारी भी उसे निभानी होगी।