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सियासत: विपक्षी गठबंधन में फूट के मायने, प्रतिबद्धता के अभाव में डामाडोल है स्थिति
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नीतीश कुमार और अखिलेश यादव (फाइल फोटो)
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अमर उजाला
विस्तार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा ‘इंडिया’ गठबंधन की वर्तमान स्थिति पर व्यक्त की गई निराशा पर आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। ‘इंडिया’ की मुंबई बैठक के बाद गतिविधियां पूरी तरह ठप्प हैं। यह प्रश्न चारों ओर से उठ रहा है कि आखिर इस गठबंधन का हुआ क्या? बिहार में विपक्ष से लेकर सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार, ‘इंडिया’ को लेकर हास्य-व्यंग्य के भी शिकार हो रहे हैं। राजनीति में खासकर ऐसे मामलों में नेता जितना कुछ कहते हैं, उससे ज्यादा जो वह नहीं बोलते हैं, महत्वपूर्ण होता है। यह तो संभव नहीं कि नीतीश कुमार ने कांग्रेस के नेताओं से इस बीच बातचीत करने की कोशिश नहीं की होगी।
आखिर बिहार में भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद उनके लिए भविष्य की राजनीति का कोई एक सबसे बड़ा आधार हो सकता है, तो वह विपक्षी गठबंधन। पटना में पहली बैठक आयोजित कर उन्होंने विपक्षी मोर्चाबंदी की नींव डालने का श्रेय भी प्राप्त किया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस से उनको सकारात्मक या उत्साहजनक जवाब नहीं मिला है। वहीं, मध्य प्रदेश में सपा व कांग्रेस के बीच तनाव और एक-दूसरे के विरुद्ध अशोभनीय वक्तव्यों के बाद ‘इंडिया’ के घटक दलों के आपसी संबंधों को लेकर अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मानें, तो कांग्रेस ने उन्हें छह सीट का वचन दिया था और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह से उनकी बात भी हुई थी। कई बार गठबंधन के दल भी एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते हैं, पर 2024 यदि ‘इंडिया’ के लिए ‘करो या मरो’ का प्रश्न है, तो विधानसभा चुनाव में कम से कम वचन और व्यवहार में उसकी झलक मिलनी चाहिए थी। कांग्रेस यदि सपा का कहा मान लेती, तो उससे चुनाव परिणाम पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं आता, बल्कि ‘इंडिया’ के ज्यादा सशक्त होने का संदेश जाता। आम आदमी पार्टी तो मैदान में उतरकर भाजपा के साथ कांग्रेस को भी निशाना बना रही है। नीतीश कुमार भले अखिलेश यादव की तरह कांग्रेस के विरुद्ध गुस्सा व्यक्त न करें, पर अंदर से उनकी स्थिति भी वैसी ही होगी। कांग्रेस का मानना है कि इन तीन राज्यों में यदि पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो ही ‘इंडिया’ में उसकी हैसियत अपनी शर्तों पर गठबंधन करने की होगी।
वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व के रणनीतिकारों का मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा तथा प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा एवं संघ के विरुद्ध सीधा आक्रामक रवैया अपनाने के कारण राहुल गांधी की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में विजय के बाद सोनिया गांधी परिवार के तीनों सदस्य मान रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार तथा भाजपा के विरुद्ध जनता में व्यापक असंतोष है और कांग्रेस को उनका समर्थन मिल सकता है। विपक्ष की पटना बैठक के साथ कांग्रेस के बड़े दल की भूमिका दिखने लगी थी। बंगलूरू में वह हावी होने के स्तर पर थी और मुंबई में ऐसा वातावरण बना, मानो कांग्रेस ही इसकी मुख्य कर्ताधर्ता और नेतृत्वकर्ता हो। ज्यादातर दलों को लगता था कि दो बार लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस के अंदर स्वयं को समायोजित करने का भाव ज्यादा गहरा होगा। पर, व्यवहार से ऐसा दिख नहीं रहा। अखिलेश यादव का गुस्सा या नीतीश कुमार की पीड़ा इसी की अभिव्यक्ति है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि ‘इंडिया’ लोकसभा के लिए बना है, विधानसभा के लिए नहीं। यह बात गठबंधन की बैठक में तय हो जानी चाहिए थी। वाम मोर्चा ने साफ कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन संभव नहीं है। यानी, यदि कांग्रेस और वाम मोर्चा का गठबंधन होगा, तो यह निश्चित रूप से तृणमूल के विरुद्ध होगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पूछताछ के लिए ईडी की ओर से दिए गए सम्मन पर ‘इंडिया’ की कोई सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं थी। वर्तमान राजनीतिक माहौल से साफ है कि सारे भाजपा विरोधी दल उसे हराकर सत्ता में आना चाहते हैं, किंतु उनकी दृष्टि में व्यापकता और दूरगामी सोच का अभाव है। यदि विपक्ष की राजनीति में भाजपा के विरुद्ध समानांतर गहरी वैचारिकता और उसके प्रति प्रतिबद्धता होती, तो सभी दलों का व्यवहार अलग होता। विचारधारा की लड़ाई में छोटे राजनीतिक स्वार्थ कभी आड़े नहीं आ सकते। इसलिए ‘इंडिया’ की वर्तमान स्थिति से यह बात फिर प्रमाणित हुई है कि विचारधारा से ज्यादा निजी व दलीय हित ही ‘इंडिया’ के पीछे मुख्य कारक थे और आगे भी होंगे।