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आध्यात्म: प्रेमपथ पर चलें, जीवन मधुर हो जाएगा; ईश्वर से मांगना छोड़ने पर होती है धर्म की शुरुआत

Wed, 30 Oct 2024 05:06 AM IST
दीपक कुमार शर्मा स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 30 Oct 2024 05:06 AM IST
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सार
जब तक प्रेम नहीं होता, ज्ञान सूखी हड्डियों जैसा रहता है। यदि प्रेम होता है, तो ज्ञान काव्य, योग रहस्यवाद और कर्म सृष्टि में सबसे आनंददायक हो जाता है।
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Spirituality Travel on love path life will rejuvenate religion begins when you stop seeking from God
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : एएनआई

विस्तार

प्राचीन काल में एक भारतीय सम्राट था, जिसे शिकार के दौरान वन में एक महान साधु मिले। उसने साधु से आग्रह किया कि वह कुछ भेंट स्वीकार करने के लिए राजधानी पधारें। पहले तो साधु ने मना कर दिया, पर जब सम्राट ने बहुत आग्रह किया, तो अंत में साधु ने मान लिया। जब वह राजभवन पहुंचा, तो सम्राट को सूचना दी गई। सम्राट ने कहा, एक क्षण ठहरिए, मैं अपनी उपासना पूरी कर लूं। सम्राट ने प्रार्थना की, हे ईश्वर, मुझे अधिक धन, अधिक जमीन, अधिक स्वास्थ्य, अधिक संतान दो। साधु उठ खड़ा हुआ और कमरे से बाहर जाने लगा। सम्राट ने कहा, आपने मेरी भेंट तो ग्रहण ही नहीं की! साधु ने उत्तर दिया, मैं भिखारियों से दान नहीं लेता। इतनी देर से तुम अधिक जमीन, अधिक धन के लिए प्रार्थना कर रहे हो। तुम मुझे क्या दे सकते हो? पहले स्वयं अपनी जरूरतें पूरी करो।



प्रेम कभी मांगता नहीं, वह सदैव देता है। जब एक युवक अपनी प्रेमिका से मिलने जाता है, तो उनके बीच व्यावसायिक संबंध नहीं होता। उनका संबंध प्रेम का होता है, और प्रेम भिखारी नहीं है। सच्ची आध्यात्मिक उपासना के आरंभ का अर्थ भिक्षाटन नहीं होता। जब हम सब ईश्वर से मांगना छोड़ देते हैं, तभी धर्म का आरंभ होता है। प्रेम में भय नहीं होता। मान लो कि माताओं में से कोई एक माता सड़क पर एक शेर को अपनी संतान पर झपटते देखती है, तो वह शेर का सामना करेगी। लेकिन वहीं अगर गली में एक कुत्ता आ जाता है, तो वह उसकी उपेक्षा करती है। माता शेर के ऊपर कूद पड़ती है और अपने बच्चे को उसके मुंह से छीन लेती है, क्योंकि प्रेम डरना नहीं जानता। वह सब बुराइयों पर विजय पाता है। ईश्वर का भय धर्म का आरंभ है, पर ईश्वर का प्रेम धर्म का अंत है। संपूर्ण भय का विनाश हो जाता है। प्रेम स्वयं अपना साध्य है। वह कभी साधन नहीं बन सकता।


जो मनुष्य यह कहता है, मैं तुम्हें अमुक बात के लिए प्रेम करता हूं, वह प्रेम नहीं करता। प्रेम कभी साधन नहीं बन सकता। उसे पूर्ण साध्य होना चाहिए। मैं उसके बारे में बात नहीं कर रहा हूं, जिसे हम सभी प्रेम समझते हैं। छोटा, हल्का-फुल्का प्रेम सुहावना लगता है। नर नारी के प्रेम में पड़ता है और नारी नर के लिए मरने लगती है। हो सकता है कि पांच मिनट में दोनों लड़ाई करने लग जाएं। यह भौतिकता है, प्रेम बिल्कुल नहीं। सच्चा प्रेम अपने में पूर्ण है। मुझे विश्वास है कि यदि कोई स्त्री और पुरुष वास्तव में प्रेम कर सकते हैं, तो वे उन सब शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं, जिनका दावा योगी करते हैं, क्योंकि प्रेम स्वयं ईश्वर है। जब तक प्रेम नहीं होता, ज्ञान सूखी हड्डियों जैसा रहता है, योग एक प्रकार का सिद्धांत बन जाता है, और कर्म केवल श्रम मात्र रह जाता है। यदि प्रेम होता है, तो ज्ञान काव्य हो जाता है, योग रहस्यवाद बन जाता है और कर्म सृष्टि में सबसे आनंददायक हो जाता है। पुस्तकों को केवल पढ़ने से मनुष्य विद्वान नहीं हो जाता है। विद्वान कौन बनता है? वह, जो प्रेम की एक बूंद भी अनुभव कर पाता है। ईश्वर प्रेम है और प्रेम ईश्वर है।

सूत्र: प्रेम को महसूस करें
दुनिया की सबसे खूबसूरत चीजों को देखा या छुआ नहीं जा सकता। उन्हें महसूस किया जाना चाहिए। यदि आप इंद्रधनुष चाहते हैं, तो आपको बारिश को सहना होगा। याद रखें, खुशी का कोई रास्ता नहीं है, खुशी ही रास्ता है। प्रेम के रास्तों पर ही इंद्रधनुष, खुशी और दुनिया की सबसे अच्छी और सबसे खूबसूरत चीजें मिलेंगी और उन्हें आप अपने दिल में महसूस कर सकेंगे।

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