कुछ तो बात है हिंदुस्तान की फिजा में
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‘अगर मोहम्मद रफी और दिलीप कुमार ने भारत के बजाय पाकिस्तान में जिंदगी गुजारी होती, तो क्या वे इतने महान कलाकार बन पाते? जी नहीं, मोहम्मद रफी लाहौर के बिलाल गंज की झुग्गी कालोनी में नाई की दुकान चला रहे होते और दिलीप कुमार पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में फल बेच रहे होते।’ यह एक चुटकुला है, जिसे पाकिस्तान के बंदिशों से भरे माहौल से त्रस्त कलाकार अक्सर एक-दूसरे को सुनाते हैं। बंटवारे का दर्द उस दौर के हर रचनाकार की अभिव्यक्ति में उजागर हुआ है, लेकिन इस त्रासदी पर उन कलमकारों-कलाकारों ने ज्यादा आंसू बहाए, जिन्हें पाकिस्तान में रहने का मौका मिला। बहुत से कलाकार और साहित्यकार न चाहते हुए भी बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे, मगर जल्द ही उन्हें भारत लौटना पड़ा। जो लोग वहां रह गए, उन्हें या तो मन मारकर वहां रहना पड़ा या मुसीबतें झेलनी पड़ीं या गुमनामी में जिंदगी गुजारनी पड़ी।
उर्दू के प्रगतिशील शायर साहिर लुधियानवी 1943 में लाहौर गए और वहीं बस गए। वहां वे कई साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े रहे। 1947 तक तो सब ठीक-ठाक रहा मगर बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान सरकार की आंख की किरकिरी बन गए। उनके साम्यवादी विचारों और सवेरा में प्रकाशित उनके लेखों को राष्ट्रद्रोह के दायर में माना गया। उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी हो गए। मजबूर होकर साहिर लुधियानवी 1949 में भारत आ गए और यहां उन्होंने रूमानी शायर और लोकप्रिय फिल्म गीतकार की हैसियत से शोहरत हासिल की।
उर्दू के बेहतरीन उपन्यास आग का दरिया की लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर 1949 में पाकिस्तान चली गईं। वहां प्रेस सूचना विभाग में उनको नौकरी मिल गई। 1959 में उनका उपन्यास आग का दरिया प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने विभाजन पर कई सवाल उठाए और दो राष्ट्र के सिद्धांत को गलत साबित करने की कोशिश की। आग का दरिया खुद कुर्रतुल ऐन हैदर के लिए आग का दरिया साबित हुआ, जिसे बमुश्किल पार करके वह भारत आ गईं और फिर कभी पाकिस्तान नहीं लौटीं।
जाने-माने प्रगतिशील लेखक, मार्क्सवादी विचारक सज्जाद जहीर पाकिस्तान चले तो गए पर अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण वहां स्वीकार नहीं किए जा सके। उन्हें रावलपिंडी षड्यंत्र मामले में दोषी ठहराया गया और फैज अहमद फैज के साथ उन्हें भी जेल जाना पड़ा। 1954 में उन्हें प्रत्यर्पण के तहत भारत भेज दिया गया। यहां उन्होंने प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और इंडिया पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के माध्यम से अपनी गतिविधियां जारी रखीं।
भारतीय उपमहाद्वीप के महानतम क्लासिकल गायक-संगीतकार उस्ताद बड़े गुलामी अली खां पाकिस्तानी नागरिक थे। उनकी कला को वहां वांछित प्रोत्साहन नहीं मिला। 1957 में वह स्थायी वीजा लेकर भारत आ गए और बाकी जिंदगी उन्होंने यहां सुखपूर्वक गुजारी। सुविख्यात कथाकार सआदत हसन मंटो ने भी 1947 में पाकिस्तान का रुख किया। वहां अश्लील लेखन के आरोप में उन पर मुकदमे चलाए गए, उनकी कलम को बेड़ियां पहनाने की कोशिश की गई। भारतीय उपमहाद्वीप के इस महान सहित्यकार ने अपनी जिंदगी बहुत आर्थिक तंगी में गुजारी। 18 जनवरी 1955 को 42 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। उनकी मौत के 57 साल बाद पाकिस्तान सरकार को उनकी अहमियत समझ में आई और 14 अगस्त 2012 को उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान ‘निशान-ए- पाकिस्तान’ से नवाजा गया। यह फेहरिस्त काफी लंबी है, जिसमें मार्क्सवादी एक्टिविस्ट और फुटपाथ तथा हम लोग जैसी सफल फिल्मों के निर्देशक जिया सरहदी, नोबल पुरस्कार से सम्मानित भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर, अब्दुस सलाम, पचास के दशक की चर्चित फिल्मों टैक्सी ड्राइवर और फंटूश में देव आनंद की नायिका रहीं शीला रमानी से लेकर पुनर्मिलन, सिकंदर और लैला मजनूं जैसी सफल फिल्मों में संगीत देने वाले रफीक गजनवी के नाम लिए जा सकते हैं, जिन्हें पाकिस्तान में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। वे या तो हाशिये पर रहे या फिर हिंदुस्तान लौट आए। नुसरत फतेह अली खां, सलमा आगा और जेबा बख्तियार इस कड़ी में नए नाम थे, जिन्हें भारत ने शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाया। अदनाम सामी को हिंदुस्तान इतना रास आया है कि वह यहीं बस गए हैं। इसी तरह शोएब अख्तर, शोएब मलिक, वसीम अकरम और रमीज राजा जैसे पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट स्टारों के लिए भारतीय चैनलों ने जितना मौका और महत्व दिया, उतना उन्हें अपने मुल्क में नहीं मिला। पाकिस्तानी टीवी सीरियलों में काम करने वाले कलाकार भारतीय फिल्मों में काम करने का सपना देखते हैं। बंटवारे ने सरहद जरूर खींच दी, लेकिन लेखकों, कलाकारों ने दिलों को जोड़ने का काम किया है।