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कुछ सीमाएं जमीन और लालच की
Wed, 21 Aug 2019 05:59 PM IST
Raman Singh
मनु पंवार
मनु पंवार
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 21 Aug 2019 05:59 PM IST
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मनु पंवार
- फोटो : a
जब अनुच्छेद 370 पर लोकसभा में चर्चा के दौरान सरकार के फैसले पर तंज करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा कि वह हिमाचल में जमीन कब खरीद सकते हैं, तो फिरोजपुर के सांसद और पंजाब के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने कहा, 'कुछ अन्य राज्यों में भी लोग जमीन नहीं खरीद सकते, इसे भी बदलना चाहिए।' जम्मू- कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने का फैसला व्यापक राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ वाला है, पर कुछ उत्साही लोगों ने सिर्फ जमीन खरीदने की बात चला दी है। इससे अब वे राज्य भी चर्चा में आ गए हैं, जहां जमीन की खरीद को लेकर कुछ पाबंदियां हैं, हिमाचल, उत्तराखंड से पूर्वोत्तर तक। पर सुखबीर सिंह बादल का इशारा हिमाचल प्रदेश की ओर जाता दिखता है।
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वहां लागू काश्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1972 की धारा-118 में व्यवस्था है कि कोई भी गैर-कृषक हिमाचल में कृषि भूमि नहीं खरीद सकता। यदि वहां घर बनाने के वास्ते जमीन खरीदना चाहते है, तो राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य है। कुछ चर्चित प्रकरण हैं, जहां विशेष अनुमति का प्रावधान काम में लिया गया।
बाहर का व्यक्ति अगर हिमाचल में घर बनाना चाहता है, तो उसे सिर्फ नगरीय क्षेत्र में जमीन मिल सकती है। ऐसे में भी 500 वर्ग मीटर से ज्यादा भूमि नहीं खरीदी जा सकती। डॉ यशवंत सिंह परमार ने यह कानून हिमाचल में छोटे किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए बनवाया था, ताकि बाहर के प्रभावशाली लोग स्थानीय लोगों की जमीन न हड़प लें। इस कानून का असली मकसद उन गैर-कृषकों को राज्य में कृषि भूमि खरीदने से रोकना था, जो खुद खेती नहीं करते। हालांकि 2012 में भाजपा की सरकार ने एक संशोधन किया कि कोई भी गैर-कृषक व्यक्ति, जो 1972 से पहले से हिमाचल में रह रहा है या 30 साल से ज्यादा समय से वहां नौकरी कर रहा है, खेती और बागवानी के लिए अधिकतम चार एकड़ जमीन ले सकता है। पर इसमें भी बाहरी लोगों के लिए गुंजाइश नहीं है। हिमाचल प्रदेश की धारा 118 हो, उत्तराखंड का भूमि कानून हो या पूर्वोत्तर में अनुच्छेद 371, ये सभी राज्यों को मिले सांविधानिक अधिकारों की कोख से निकले हैं। हालांकि उत्तराखंड की सरकार ने कानून की धारा 154 में उप धारा-2 जोड़कर पहाड़ों में जमीन खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर डाली। पर हिमाचल में धारा 118 अब भी हिमाचलियों के हितों की रक्षक बनी हुई है।
वैसे जमीन खरीद के मामले में हिमाचल के भीतर भी एक हिमाचल है। वहां के जनजातीय इलाके किन्नौर और लाहौल-स्पीति में कोई गैर-जनजातीय हिमाचली भी जमीन नहीं खरीद सकता। यह कानून पहाड़ के स्थानीय निवासियों के हितों का रक्षा कवच रहा है। वैसे भी राष्ट्र विभिन्न उप-राष्ट्रीयताओं से मिलकर ही बना होता है। इन उपराष्ट्रीयताओं में वे क्षेत्रीय समाज भी हैं, जिनके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक हितों की सुरक्षा के लिए इसी देश ने भूमि कानून जैसी व्यवस्थाएं दी हैं।
पहाड़ों में चूंकि खेती की जमीन पहले से ही काफी कम है, इसीलिए वहां लागू भूमि कानून राज्यों को ताकत देते हैं कि वे राज्य के आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर पहाड़ी समाज की जमीन और अवसरों को बाहर के ताकतवर लोगों के हाथों में जाने से बचा सकें। अगर ये कानून न होते, तो अब तक धनाढ्य और ताकतवर लोग पहाड़ों में जमीन की लूट-खसोट कर इसे अपनी चरागाह बना डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते।