जनसांख्यिकी से समाधान : जाहिर है कि यह एक धार्मिक-राजनीतिक समस्या है

आर विक्रम सिंह, पूर्व सैनिक, पूर्व प्रशासक Published by: आर विक्रम सिंह Updated Tue, 06 Aug 2019 12:25 AM IST
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Article 370 - फोटो : Amar Ujala
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हुआ वह अकल्पनीय था, एक नया इतिहास लिखा गया। अनुच्छेद 370 का समापन व साथ ही 35 ए का भी इतिहास हो जाना। लद्दाख का केंद्रशासित होना तो प्रतीक्षित था, लेकिन जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित बनाना, बहुत हिम्मत भरा फैसला है। समाधान की बात से पहले कश्मीर की जनसांख्यिकी की समझ जरूरी है। जम्मू एवं कश्मीर में 85 लाख मुस्लिम, जिनमें 61 लाख सुन्नी, 12 लाख शिया, 12 लाख गूजर बकरवाल हैं तथा 36 लाख हिंदू और शेष बौद्ध व सिख मिलाकर कुल आबादी लगभग 1.25 करोड़ है। घाटी की 69 लाख आबादी में से 53 लाख सुन्नी, 10 लाख शिया, व छह लाख गूजर बकरवाल हैं।
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जम्मू संभाग में 63 प्रतिशत आबादी हिंदू, 33 प्रतिशत मुस्लिम, शेष सिख है। पीर पंजाल पर्वतमाला कश्मीर घाटी से जम्मू को अलग करती है। जब वर्ष 1846 में जम्मू के डोगरा महाराजा गुलाब सिंह ने अंग्रेजों से कश्मीर को समझौते के तहत अपने नियंत्रण में लिया, कश्मीर घाटी में तब तक बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन हो चुका था। फिर भी वहां पंडितों की एक बड़ी तादाद थी। घाटी का संपर्क जम्मू या शेष भारत से बनिहाल दर्रे से ही रहा है। जबकि पश्चिम से मुजफ्फराबाद से होकर आने वाला मुख्य मार्ग घाटी की पंजाब सीमाप्रांत से सीधा जोड़ता है। 


इस भौगोलिक अलगाव के कारण कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में संस्कृतियों का विकास भिन्न रूप से हुआ। जम्मू मुख्यतः डोगरा राजपूतों का क्षेत्र रहा है। कश्मीर घाटी ब्राह्मणों की सांस्कृतिक धार्मिक परंपरा का केंद्र बनी। लद्दाख पूर्वी दिशा की ऊंची पहाड़ियों से घिरकर तिब्बती बौद्ध परंपरा का क्षेत्र बना। इस्लामी संपर्कों, दबावों फिर हमलों के प्रभाव से कश्मीर घाटी का क्रमशः इस्लामीकरण होता गया। लेकिन यह इस्लाम हिंदू परंपराओं से सह अस्तित्व का सूफी इस्लाम था, जो अब क्षीण होकर वहाबी इस्लाम को स्थान दे रहा है।

इस सीमित भूमिका के साथ आज जब आप कश्मीर में समस्या को खोजने चलते हैं, तो आपको इन तीनों क्षेत्रों में से न तो जम्मू में कोई जम्मू समस्या मिलती है न ही लद्दाख में कोई लद्दाख समस्या। न ही गूजर-बकरवालों की कोई अलगाववादी समस्या है। जो भी समस्या है, वह 50 लाख लोगों की कश्मीर घाटी की खुदमुख्तारी, आजादी और निजाम-ए-मुस्तफा की है। जाहिर है, यह धार्मिक-राजनीतिक समस्या है। जम्मू संभाग के दस जिलों में छह मुस्लिमबहुल हैं, लेकिन यहां कश्मीर घाटी जैसी अलगावादी समस्या नहीं है।  

जो लोग कश्मीर में धार्मिक अलगाववादी आंदोलन चला रहे हैं उनके पूर्वज कभी कश्मीरी पंडित रहे थे। कश्मीर घाटी और पाक अधिकृत कश्मीर के बीच कश्मीर का पर्वतीय क्षेत्र पड़ता है, जिसका विकास घाटी की राजनीति ने होने नहीं दिया है। उनमें और पश्चिमी कश्मीर के समाज में जातीय भिन्नता है। नेहरू जी ने 1947 में मुजफ्फराबाद की ओर तेजी से बढ़ रही भारतीय सैनिकों को यहीं उड़ी में रोक दिया था। 

यह पश्चिमी कश्मीर और इससे आगे का इलाका शेख अब्दुल्ला का समर्थक नहीं था। सोचा होगा कि अगर यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला जाए, तो उनके वर्चस्व को कोई चुनौती नहीं मिलेगी साथ ही कश्मीर का कुछ भाग पाकर पाकिस्तान के भी आंसू पुंछ जाएंगे। नेहरू जी की मंशा अय्यूब खान से सितंबर 1960 में हुई वार्ता में स्पष्ट होती है, जब उन्होंने कहा था कि इस युद्धविराम रेखा को ही अंतररराष्ट्रीय सीमा रेखा मान लिया जाए। यह समाधान नहीं था।

बहरहाल जनसांख्यिकी का यह प्रयोग कश्मीर की समस्या के स्थायी समाधान की राह हमवार करता है। कश्मीर अब सच्चे अर्थों में भारत का भाग है। फिर हमारा जो एकमात्र लक्ष्य बचेगा, वह होगा पाक अधिकृत कश्मीर की वापसी।
 
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