समाज : आजादी की बात ही कुछ और है, इसके मायने समझना भी जरूरी
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विस्तार
किसी गली या बाजार में, राह पर जब दो आदमी आपस में उलझते हैं, तो उन्हें अधिकांश लोग देखते हैं और अपनी राह पर चलते रहते हैं, कहते हैं: लड़ने-मरने दो, हमें क्या करना है! लेकिन, कुछ बीच-बचाव करते हैं, और कभी-कभी स्वयं भी पिट जाते हैं, कोई लाभ नहीं होता। यह सामान्य बात है। ऐसा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी होता है। ट्रंप ने तो भारत व पकिस्तान को, विशेषकर भारत को न तो समझाया और न युद्ध से रोका। भारत से केवल ट्रेड डील की बात की और टैरिफ की धमकी दी। पाकिस्तान के साथ पर्सनल व्यापार किया-विशेषकर सेनापति मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच दिया और नोबेल पुरस्कार की सिफारिश खरीदी। उसका उद्देश्य केवल नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करना और अपने व्यवसाय को बढ़ाना है। एपल कंपनी के मालिक से करोड़ों का गिफ्ट (रिश्वत) लेते हुए उसे कोई शर्म नहीं आई और न ही उसकी कुर्सी गई। भारत का कोई भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर सकता, करेगा तो उसी दिन उसकी कुर्सी गई। भारत और अमेरिका के लोकतंत्र और जीवन मूल्यों में यह अंतर है। भारत अपने आदर्शों और जीवन मूल्यों पर अड़े रहने की भारी कीमत चुकाता है।
अमेरिका का एक विचारक हेनरी थारो हुआ। महात्मा गांधी उससे बहुत प्रभावित थे। अमेरिकी विधान में लिखा हुआ है कि व्यक्ति को आवागमन की स्वतंत्रता है। इसका उसने क्या अर्थ किया, मालूम है? रेलगाड़ी में बिना टिकट चलना! आवागमन की स्वतंत्रता! कोई रोक नहीं सकता। जब आवागमन की स्वतंत्रता है, तो रेलगाड़ी में बैठेंगे, हवाई जहाज में चढ़ेंगे! वह कई दफा पकड़ा गया, सजाएं भी काटीं, मगर वह यह कहता था कि यह व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता है; और फिर चलता था बिना टिकट।
प्रति वर्ष हम 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। यह दिवस एक राष्ट्रीय उत्सव की गरिमा वाला दिवस है, लेकिन इस उत्सव के पहले और बाद में ज्यादातर लोग राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता का व्यवहार करते दिखाई देते हैं। यहां तक कि देश की संसद भी अपवाद नहीं है। स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में गुणात्मक अंतर है। ओशो ने अपने एक प्रवचन में समझाया है : आज तक जमीन पर यह घटना घटी ही नहीं है कि स्वतंत्र चित्त व्यक्ति कभी स्वच्छंद हुआ हो। स्वच्छंद होता है, परतंत्र चित्त ही। परतंत्र चित्त जब क्रोध से भर जाता है, तो स्वच्छंद हो जाता है। हमारे, सभी नई पीढ़ियों के युवक आज क्रोध से भरे हैं। इसलिए स्वच्छंद होते जा रहे हैं। इसमें हजारों वर्ष से मनुष्य के मन पर लादी गई दासता का हाथ है। जब तक हम इस सत्य को न जानेंगे, तब तक न तो हम मनुष्य को परतंत्रता से बचा सकते हैं और न स्वच्छंदता से। एक विशियस सर्कल (दुश्चक्र) शुरू होता है।
परतंत्र चित्त स्वच्छंद होना चाहता है। स्वच्छंद चित्त को देखकर हम घबराते हैं और परतंत्रता को थोपने की कोशिश करते हैं। जितनी हम परतंत्रता थोपते हैं, उतनी स्वच्छंदता प्रतिक्रिया में पैदा होती है। जितनी स्वच्छंदता पैदा होती है, उतने हम भयभीत हो जाते हैं और परतंत्रता के नए आयोजन करते हैं। ऐसा एक दुश्चक्र हजारों वर्ष से मनुष्य के ऊपर चल रहा है। अब यह शायद अंतिम घड़ी में पहुंच गया है। शायद परतंत्रता इतनी गहरी हो गई है कि उसके परिणाम में आदमी अब सब भांति स्वच्छंद हो जाना चाहता है। चित्त को हम जितना दबाते हैं, उसकी उतनी प्रतिक्रियाएं शुरू हो जाती हैं। स्वच्छंदता और परतंत्रता, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर यह समझ में आ जाए, तो ख्याल में आ सकता है कि स्वतंत्रता की बात ही कुछ और है।