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मी टू अभियान से बदलता समाज

Thu, 18 Oct 2018 05:34 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 18 Oct 2018 05:34 PM IST
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Society changing from 'Me too' campaign
सुभाषिनी सहगल अली

न्याय की लड़ाई महिलाओं के लिए कितनी कठिन है, इसके कई उदाहरण पिछले दिनों सामने आए हैं। लेकिन यह लड़ाई जब बहादुरी और निष्ठा के साथ लड़ी जाती है, तो उससे छोटी-बड़ी जीतें भी हासिल होती हैं, यह भी हमने पिछले दिनों में देखा है। शक्तिशाली पुरुषों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाना बहुत मुश्किल होता है। वह चाहे फिल्मों में हों, राजनीति में हों, मीडिया में हों, उनसे ‘पंगा’ लेने पर अक्सर पीड़ित महिलाओं को नौकरी से हाथ धोने, या फिर खुद बेहूदे प्रचार का शिकार बनने या तबादले या पेशे से बाहर किए जाने के खतरे मोल लेने पड़ते हैं। यही कारण है कि बहुत सारी महिलाएं अपने बचाव के रास्ते खुद तय करती हुईं, विपरीत परिस्थितियों में काम करती रहती हैं।


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लेकिन पिछले दो हफ्तों में बहुत कुछ बदल गया। मिस इंडिया रहीं तनुश्री दत्ता ने प्रख्यात कलाकार नाना पाटेकर के खिलाफ यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायत का खुलासा किया। तनुश्री पर जहां आक्षेपों की बौछार शुरू हो गई,  वहीं उनके समर्थन में भी तमाम आवाजें उठीं। इस बात की याद दिलाई गई कि उन्होंने घटना घटने के समय भी शिकायत की थी, लेकिन उनको धमकियों और हिंसात्मक हमलों के जरिये चुप करा दिया गया था। घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शियों ने भी उनकी बातों की पुष्टि की।

उसके बाद तो जैसे बांध के बंद दरवाजे खुल गए। फिल्मों में ही नहीं, मीडिया और राजनीति में बड़े नामों पर आरोप लगे और लोग सुनने लगे। और उनके पीछे समर्थकों की फौज और उनके जैसे अनुभव से गुजरने वालों की फौज जुटने लगी। नतीजे भी सामने आने लगे। किसी निर्देशक से फिल्म वापस ले ली गई; किसी अभिनेता के साथ काम करने से इन्कार कर दिया गया;  किसी बड़े घराने के ऊंचे पद पर बैठ अधिकारी को हटा दिया गया;  किसी अखबार के बड़े पत्रकारों को पद से अलग कर दिया गया। और फिर, एक मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस मुहिम ने कुछ बड़ी जीत भी दर्ज की है। बड़े कॉरपोरेट घरानों और बैंकों ने अपने-अपने दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की शिकायतों की बंद फाइलों को खोलने और उनका गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने का आदेश दिया है। इससे भी बड़ी खबर यह है कि ‘साइन ऐंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन’ (सिंटा) ने बयान दिया है कि उन्होंने भी फिल्म उद्योग में यौन उत्पीड़न का अध्ययन के बाद कार्यवाही करने के लिए समिति गठित करने का फैसला ले लिया है।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कानून बनने के बाद भी इस कानून की धाराओं को कंपनियों, दफ्तरों और कारखानों में लागू नहीं किया गया है। सरकारी उपक्रमों और कार्यालयों में भी इनका पालन संतोषजनक तरीके से नहीं हुआ है। अगर मी टू के चलते अब कॉरपोरेट घराने, बैंक और फिल्म उद्योग यौन शोषण के खिलाफ कमेटियों का गठन करते हैं, सदस्यों के रूप में जानकार और मजबूत लोगों को नियुक्त करते हैं और उनके सिफारिशों को लागू करते हैं, तो यह एक बड़ी जीत मानी जा सकती है। आज की सच्चाई तो यह है कि विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति, प्राध्यापक और पुलिस विभाग के बड़े अधिकारियों पर यौन शोषण के आरोप लग चुके हैं, लेकिन न्याय के नाम पर कुछ नहीं हुआ है। अब इसका बदला जाना, संस्थागत न्यायिक मशीनरी को मजबूत और कारगर बनाना आवश्यक है।

छोटी जीतों को लेकर महिलाओं में बड़ी खुशी और बड़ा उत्साह है।  इसका इस्तेमाल बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए करना जरूरी है। हिम्मत मिलेगी केवल एकजुटता से। हिम्मत मिलेगी छोटी जीतों से शक्ति अर्जित करके, बड़ी जीतों की ओर एक साथ बढ़ने से। एक साथ चिल्लाएंगे, तो बहरे सुनेंगे। एक साथ चलेंगे, तो हम ही नहीं, पूरा समाज आगे बढ़ेगा।

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