भारत में समाजवाद
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जब मैंने महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण को समाजवाद का हिंदुस्तान में आरंभ कहा है, तो मैं यह बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि इधर दस-बारह वर्ष में उनके विचारों को बहुत विकृत किया गया है। शब्द बहुत बढ़िया है, सर्वोदय, सर्व का उदय। हमारे जैसे लोग तो कुछ लोगों का उदय करते हैं, तो पहले से ही बदनाम हो जाते हैं। लेकिन यह विकृति जिस तरह की हुई है, उससे समाजवाद का, मेरी निगाह में, बहुत कम संबंध रह जाता है। फिर भी, यह बड़ी भारी गलती होगी, अगर इस विकृति के कारण हम आध्यात्मिकता और भौतिकता, धर्म और राजनीति के जिस प्रसंग को गांधी जी ने छेड़ा था, उसको छोड़ दें। हो सकता है कि मेरे जैसे आदमी के लिए या किसी एक के लिए यह काम बड़ा भारी हो, क्योंकि दुनिया में, कम से कम देखने में, दो नदियां अलग-अलग बही हैं।
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दरअसल देखा जाए, तो धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म है। यह बढ़िया धर्म और बढ़िया राजनीति की परिभाषा है, घटिया धर्म और घटिया राजनीति की नहीं। विकृत हो जाने पर तो न जाने क्या-क्या हो जाया करता है। एक तो जो खेत और कारखानों में कोशिश होगी और दूसरे जो दिमाग की कोशिश होगी और न जाने कितनी कोशिशों के बाद इस परिभाषा के अंग-प्रत्यंग की जितनी तफसीलें हैं, उनको निकालना पड़ेगा। लेकिन इतना साफ है कि इस परिभाषा के बाद धर्म का खास काम हो जाता है, हो क्या जाता है, है ही, कि धर्म है अच्छाई को करना और अच्छाई की तारीफ करना और राजनीति है बुराई से लड़ना और बुराई की निंदा करना। एक ही चीज के दो पहलू हैं। बहुत आलस में और जल्दी में देखने लगेंगे, तो झट से मुंह से निकल जाएगा कि दोनों में फर्क क्या है। लेकिन फर्क तो बहुत ज्यादा है। बुराई से लड़ना और अच्छाई को करना, इसमें इतना फर्क है कि फिर दोनों ने एक-दूसरे का पल्ला छोड़ दिया और इसलिए धर्म निष्प्राण हो जाता है और राजनीति झगड़ालू और कलही हो जाती है। आज सारे संसार में, सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं, राजनीति कलही हो रही है और धर्म निष्प्राण हो गया है।
यह मनुष्य की सहज वृत्ति है और सारे संसार में है कि आदमी गिरता बड़ी जल्दी है और उठता बड़ी मुश्किल से है। मैं समाजवादी हूं और जिंदगी में अब समाजवाद तो नहीं छोड़ने वाला, लेकिन इतना मैं बता दूं कि समाजवाद पर उठना बड़ा मुश्किल है, गिरना बड़ा आसान है। इसमें बिल्कुल देर नहीं लगती है और अगर कोई आदमी या दल गिरना चाहे, तो बड़ी आसानी से फिसल सकता है। उसके साथ-साथ जब अपने देश में सोचने का यह विकार पैदा हो जाता है कि कारखाने बना दो, सब चीजें अपने आप हो जाएंगी, तो एक ओर जैसे घाना और मैक्सिको में हुआ है और जहां रंगीन लोग रहते हैं, वहां हुआ है, तो एक दर्शन पैदा होता, जिसको फ्रांसीसी लोग 'कास्मोपोलिट' कहते हैं। एक बार रूस ने इसके खिलाफ बड़ी जबर्दस्त जिहाद बोली थी। वे लोग उसका पूरा अर्थ नहीं लगाते। कुछ कला, कुछ चित्रकला, कुछ नाटक कला वगैरह से उसका संबंध जोड़ते हैं। वे भी चीजें आ जाती हैं। यह नकल करने की बात है। यह विश्वयारवाद रंगीन दुनिया में चल पड़ा है कि जैसे आगे चलने वाली दुनिया है, जिसके पग बढ़ते जा रहे हैं, उस जैसे बनो। उसके ऊपरी और नकली नतीजे निकलते हैं कि भूषा यूरोपी बनाओ, इसका ख्याल न करते हुए कि यूरोप में ठंड पड़ती है, हिंदुस्तान में गर्मी पड़ती है।
उसी तरह से यूरोप की किसी एक भाषा को अपनाओ, इसका ख्याल न करते हुए कि उससे हिंदुस्तान के नवीनीकरण, ज्ञान-विज्ञान या उद्योगीकरण पर क्या असर पड़ता है, लेकिन इसलिए कि हिंदी तो चोटी-जनेऊ के साथ जुड़ी हुई है। मैं इस बात को मानता हूं कि हिंदी के लिए ये सब कुछ बहुत जबर्दस्त खतरा है और उसका एक जबर्दस्त शाप उस पर है कि चोटी और जनेऊ के साथ वह जुड़ी हुई है। मैं अजहद कोशिश कर रहा हूं कि किसी तरह से हिंदी का यह चोटी-जनेऊ से संबंध-विच्छेद हो जाए और हिंदी भी आधुनिक दुनिया का औजार बन जाए और खुलकर अच्छी तरह से औजार बने। मैं इस बात को भी मानता हूं कि शायद दुनिया की जबानों में शक्ति के हिसाब से, लोच और लचक के हिसाब से सबसे अच्छी जबान हिंदुस्तानी है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
समाजवाद का अगर सिर्फ एक अंग ले लिया जाता है, जैसे वामपंथी राष्ट्रीयता या जैसे वामपंथी आर्थिकता, तो समाजवाद खंडित रह जाता है, अधूरा रह जाता है। समाजवाद के अंग या मतलब कई हैं। मोटी तरह से मैं कुछ गिनाए देता हूं-वामपंथी राष्ट्रीयता, दूसरे वामपंथी आर्थिकता, तीसरे उग्रपंथी धार्मिकता, चौथे उग्रपंथी सामाजिकता, पांचवें उग्रपंथी राजनीतिकता। उग्रपंथी सामाजिकता के मतलब में जो कुछ भी नर-नारी के या दलित-द्विज के अपने देश में जुल्म हैं और बाकी दुनिया में भी एक-दूसरे प्रति, और नर-नारी के तो वहां भी हैं, उन जुल्मों को खत्म किए बगैर कैसे कोई समाजवादी हो सकता है या समाजवाद कायम हो सकता है।
हमारे देश में तो बहुत से समाजवादी हैं, जिनके घर के अंदर नर-नारी संबंध करीब-करीब वैसा ही चला आ रहा है, जैसे पहले रहा था। खैर, जो उद्योगीकरण अभी हिंदुस्तान में हो रहा है, उसका नतीजा तो हम देख ही रहे हैं कि दिन भर दफ्तर या कारखाने या स्कूलों या अपने कमरे या प्रयोगशाला में यूरोप जैसे प्रगतिशील और आधुनिक बनो और सुबह-शाम वही अपना पुराना ढर्रा, चोटी-जनेऊ वाला चलाते रहो, माला जपो। कुछ लोग कहेंगे, कहां तुम्हें द्वंद्व दिखाई पड़ रहा ह, तो द्वंद्व मैंने बता दिया हैै। मुझे माला फेरने में कोई आपत्ति नहीं है, यदि कोई माला फेरना चाहता है, जरूर फेरे। यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन गर उसके साथ नर-नारी, धर्म, ईश्वर, सनातन वगैरह के मामले में विचार दो हो जाते हैं, जिससे करोड़ों लोगों, दीनों और दलितों के उठने और संगठित होने में झंझट पैदा हो जाती है, तो मैं कहूंगा कि यह तो उसके बिल्कुल विपरीत है।