{"_id":"67ca2ce3b8443c96d80f79d5","slug":"social-media-and-digital-colonialism-indigenous-tech-ecosystem-of-india-will-be-step-towards-competition-2025-03-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"तकनीक: सोशल मीडिया और डिजिटल उपनिवेशवाद... भारत का स्वदेशी तकनीकी इकोसिस्टम मुकाबले की दिशा में बड़ा कदम होगा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
तकनीक: सोशल मीडिया और डिजिटल उपनिवेशवाद... भारत का स्वदेशी तकनीकी इकोसिस्टम मुकाबले की दिशा में बड़ा कदम होगा
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस
- फोटो :
Freepik
विस्तार
स्टैस्टिका के मुताबिक, भारत में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या हर दिन बढ़ रही है। देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताना-बाना तेजी से डिजिटल हो रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि डिजिटलीकरण हमारे लिए सुविधा, संपर्क और समृद्धि के नए रास्ते खोल रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या हम सचमुच इस डिजिटल क्रांति के सूत्रधार हैं, या बस किसी और के बनाए डिजिटल तंत्र के उपभोक्ता बनकर रह गए हैं? यह दौर डिजिटल उपनिवेशवाद का है, जहां किसी देश की शक्ति डाटा पर नियंत्रण से तय होती है।
दुनिया के शीर्ष 10 टेक प्लेटफॉर्म- गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम, अमेजन, एक्स आदि पर भारतीय उपभोक्ताओं की भारी संख्या है। लेकिन इनमें से एक भी कंपनी भारतीय नहीं है। हमारे लोगों का डाटा विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में है, जो एक तरह के डिजिटल उपनिवेशवाद को जन्म दे रहा है। इन कंपनियों का नियंत्रण मुख्य रूप से अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के हाथों में है, जिससे भारत का डिजिटल भविष्य बाहरी शक्तियों की नीतियों और व्यावसायिक हितों पर निर्भर होता जा रहा है। ये कंपनियां न केवल हमारे डाटा का आर्थिक शोषण कर रही हैं, बल्कि हमारी चुनाव प्रणाली, न्यायिक फैसलों और समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण को भी प्रभावित कर रही हैं। हैरानी है कि 140 करोड़ लोगों के इस देश में कोई भी ऐसा देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं है, जो इन विदेशी एप के सामने खड़ा हो सके।
पिछले कुछ वर्षों में इन विदेशी प्लेटफॉर्म्स ने देश के सामने कई तरह की चुनौतियां पेश की हैं, जिनमें डाटा सुरक्षा, फेक न्यूज और पक्षपातपूर्ण प्रचार जैसे मुद्दे शामिल हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और यहां की चुनावी प्रक्रिया में भी इन कंपनियों का हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है। ईको की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मेटा प्लेटफॉर्म्स पर चुनावी पेड प्रचार और शैडो विज्ञापनों के जरिये राजनीतिक पार्टियों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे हैं। साल 2023 में यूनेस्को इपसोस द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, देश में शहरी क्षेत्रों के 64 प्रतिशत लोगों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गलत सूचनाओं और फेक न्यूज का प्राथमिक स्रोत माना। फेक न्यूज के प्रसार में खासकर फेसबुक, व्हाट्सएप और एक्स प्रमुख भूमिका निभाते नजर आए। फेसबुक की इंटरनल रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में हुए दिल्ली दंगों में फेसबुक और व्हाट्सएप पर 22 हजार से अधिक ऐसे पोस्ट्स और ग्रुप्स पाए गए, जिनमें सांप्रदायिक नफरत फैलाई जा रही थी।
मुश्किल यह है कि ये विदेशी कंपनियां भारत में काम करने के बावजूद पूरी तरह से भारतीय कानून के अधीन नहीं हैं और अक्सर अपनी वैश्विक नीतियों का हवाला देकर बच निकलती हैं। दुखद है कि आर्थिक दृष्टि से भी ये देश को बड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं। उदाहरण के लिए, मेटा और एक्स जैसे प्लेटफाॅर्म भारत में विज्ञापन से अरबों डॉलर की कमाई करते हैं, लेकिन उनका एक बड़ा हिस्सा विदेशों में चला जाता है। एक बड़ी चुनौती इन कंपनियों के क्लाउड स्टोरेज और डाटा सेंटर्स को लेकर भी है। भारत सरकार और कंपनियां बड़े पैमाने पर गूगल ड्राइव, अमेजन एडब्ल्यूएस, एजोर जैसे क्लाउड स्टोरेज पर निर्भर हैं, यानी भारत का संवेदनशील डाटा विदेशों में संग्रहित होता है, जो देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा है।
जुलाई, 2024 में माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड स्टोरेज में गड़बड़ी होने से पूरे देश का आईटी सिस्टम बारह घंटे के लिए ठप पड़ गया। अचानक आई एक तकनीकी खामी के कारण देश में डिजिटल बैंकिंग, रेलवे, मेट्रो, एयरपोर्ट्स, ऑनलाइन सेवाएं और कई अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियां ठप पड़ गईं, जिससे न केवल रोजमर्रा की जिंदगी घंटों प्रभावित रही, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी गहरा आघात पहुंचा। अब जरूरी है कि भारत भी अपना स्वदेशी सोशल मीडिया और डिजिटल इकोसिस्टम बनाए। हालांकि शेयरचैट और कू जैसे प्लेटफॉर्म्स ने एक समय भारतीय बाजार में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की, मगर लोगों और सरकार के अपेक्षाकृत कम समर्थन के कारण इनका वैश्विक दिग्गजों से मुकाबला करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया।
तकनीकी नवाचारों के मामले में भारत की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधरी है। हाल ही में आई ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, 2024 रैंकिंग में 133 देशों में भारत ने 39वां स्थान हासिल किया, जो देश की बढ़ती तकनीकी और डिजिटल क्षमता का प्रमाण है, हालांकि इसमें अभी और सुधार की आवश्यकता है। आधार, यूपीआई और कोविन जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स ने यह साबित किया है कि हम तकनीकी चुनौतियों को कैसे संभाल सकते हैं। यदि भारत अपना तकनीकी इकोसिस्टम विकसित करता है, तो यह डिजिटल उपनिवेशवाद का मुकाबला करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।