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इतनी जल्दी ऐसा बिखराव

Fri, 08 May 2015 07:50 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 08 May 2015 07:50 PM IST
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So soon its scatter

देश के उत्तर, मध्य और पश्चिमी इलाकों के किसान गुस्से में उबल रहे हैं, जहां लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 90 फीसदी से ज्यादा सीटें जीती थीं। कृषि अर्थव्यवस्था की उपेक्षा और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को आगे बढ़ाने के प्रति राजग सरकार के अतिरिक्त उत्साह ने देश के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों के लोगों को नाराज किया है। भाजपा स्वयं इससे अच्छी तरह अवगत है। खबरों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित गाजियाबाद के एक स्कूल में पिछले पखवाड़े एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें संघ एवं भाजपा के उत्तर प्रदेश के 40 शीर्ष अधिकारियों ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी की संभावनाओं पर चर्चा की। इस बैठक में पार्टी के शीर्ष केंद्रीय नेता भी शामिल थे, जो प्रदेश का प्रभार संभाल रहे हैं। बैठक में यही निष्कर्ष निकला कि प्रदेश में भाजपा की स्थिति बहुत खराब है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर किसानों में पार्टी की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा है। बंद कमरे में हुई इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष था कि ऊंची जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों का सामाजिक गठबंधन, जिसने एकजुट होकर लोकसभा चुनाव में मोदी के लिए वोट किया था, शीघ्र ही बिखर सकता है।

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मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा तैयार किए गए इस नए सामाजिक गठजोड़ का शीघ्र संभावित बिखराव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिघटना होगी, जो संभवतः इस वर्ष के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव और 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिखेगी। असल में मोदी के खेमे से अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों के छिटकने का पहला संकेत दिल्ली के विधानसभा चुनाव में मिला था, जहां करीब 40 फीसदी वोट बिहार और उत्तर प्रदेश के गैर सवर्ण जातियों के हैं। दिल्ली चुनाव से एक महीने पहले तक भाजपा पूरी तरह से आश्वस्त थी कि लोकसभा चुनाव की तरह अब भी यह वर्ग मोदी के प्रति निष्ठावान है।
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इस सामाजिक गठबंधन के बिखराव की कुछ अन्य झलक हाल ही में संपन्न महराजगंज के फरेंदा विधानसभा के उपचुनाव में दिखी, जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बाद भाजपा तीसरे नंबर पर आई। सामाजिक गठबंधन में बिखराव का असर इसी वर्ष अक्तूबर में उत्तर प्रदेश के पंचायत निकायों के चुनाव में भी दिख सकता है। उत्तर प्रदेश में पिछले नौ महीनों में हुए 12 विधानसभा सीटों के चुनावों में से अधिकांश पर भाजपा हार गई है। उत्तराखंड में भी एक उपचुनाव में वह कांग्रेस के मुकाबले में भारी अंतर से पराजित हुई। निचले तबके के इस गठबंधन का इतनी जल्दी मोहभंग क्यों हुआ, यदि भाजपा इसका आत्मनिरीक्षण करे, तो कुछ दिलचस्प जवाब मिल सकते हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि मोदी इन वर्गों के बीच अपनी चमक खोते हुए प्रतीत हो रहे हैं।
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वास्तव में इस नए सामाजिक गठबंधन के कारण ही भाजपा 282 सीटें जीतकर संसद में भारी बहुमत हासिल कर सकी। सबसे दिलचस्प यह है कि मात्र 31 फीसदी वोट के बल पर ही इतनी ज्यादा सीटें जीतने में वह सफल रही। इसी कारण विपक्ष लगातार तर्क दे रहा है कि 69 फीसदी मतदाताओं ने मोदी के खिलाफ मतदान किया। लेकिन उत्तर और मध्य भारत में बेहतर प्रदर्शन के चलते मोदी इतनी सीटें जीतने में कामयाब रहे। और यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में पिछड़ों, दलितों और सवर्णों के इस नए सामाजिक गठजोड़ ने मोदी का साथ दिया।
हालांकि 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 40.8 फीसदी वोट के साथ 283 सीटें जीती थीं। यानी हर एक फीसदी वोट पर पार्टी को सात सीटें मिलीं। वर्ष 1977 की बड़ी लहर में जनता पार्टी ने 41.3 फीसदी वोटों के साथ 295 सीटें जीती थीं। यानी जनता पार्टी को हर एक फीसदी वोट पर 7.2 सीटें मिलीं। भारत के चुनावी इतिहास में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सबसे बड़ी लहर वाला चुनाव नवंबर, 1984 में हुआ था, जिसमें 48 फीसदी वोटों के साथ कांग्रेस ने 414 सीटें जीती थीं। उस एकतरफा चुनाव में कांग्रेस ने हर एक फीसदी वोट पर 8.7 सीटें जीतीं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के 1984 के रिकॉर्ड के मुकाबले 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है, क्योंकि इसे हर एक फीसदी वोट पर 9.1 सीटें मिली हैं।

इससे स्पष्ट है कि भाजपा नए सामाजिक गठजोड़ के गणितीय जादू के कारण ही अपने वोट को सीटों की अधिकतम संख्या में बदलने में कामयाब रही। लेकिन समस्या यह है कि अगर इस सामाजिक गठबंधन में जरा भी बिखराब आया, तो यह प्रवृत्ति नाटकीय ढंग से उलट सकती है। अगर भाजपा के वोटों की हिस्सेदारी में एकाध फीसदी की भी कमी हुई, तो उसे बड़ी संख्या में सीटों का नुकसान हो सकता है। इस तथ्य की परीक्षा इस वर्ष के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव और 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में होगी। अगर भाजपा के खेमे से पिछड़े वर्ग और दलित वर्ग के मतदाता छिटकते हैं, जैसा कि होता हुआ लग रहा है, तो भाजपा लोकसभा में मिली सीटों के सापेक्ष बड़ी संख्या में विधानसभा की सीटें खो सकती है।


अगर विधानसभा चुनावों में भी लोकसभा चुनाव की तरह वोटिंग पैटर्न रहता है, तो भाजपा को बिहार और उत्तर प्रदेश में 85 फीसदी विधानसभा सीटें जीतनी चाहिए। लेकिन स्पष्ट है कि संघ के अपने निष्कर्ष के अनुसार ऐसा नहीं होने जा रहा है, क्योंकि पिछड़ों और दलितों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से कट गया है। इन वर्गों को अपने खेमे में वापस लाने के लिए मोदी को सोशल इंजीनियरिंग का एक दूसरा जादू करना होगा। मोदी स्वयं मानते हैं कि गरीबों से उन्होंने जो बड़े-बड़े वायदे किए हैं, उन्हें इतनी जल्दी पूरा करना संभव नहीं है। जैसा कि हाल ही में भाजपा के पूर्व मंत्री अरुण शौरी ने कहा, जनता सरकार द्वारा की गईं पांच अच्छी बातें नहीं देखेगी, बल्कि उसका ध्यान किए गए वायदों और उसकी पूर्ति के अंतर पर केंद्रित रहेगा। मोदी हमेशा इस बोझ को ढोते रहेंगे।

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