आपका शहर Close

सुस्त पड़ती चीन की रफ्तार

नील गॉफ

Updated Wed, 19 Oct 2016 07:43 PM IST
Slow growth of china

नील गॉफ

बीते बुधवार को चीन ने सूचित किया कि उसकी अर्थव्यवस्था में पिछले वर्ष की तुलना में तीसरी तिमाही में 6.7 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह अर्थशास्त्रियों के आकलन से बिल्कुल मेल खाता है और यह इस वर्ष पहली और दूसरी तिमाही की चीन की विकास दर के समान थी। अर्थव्यवस्था में इस तरह की स्थिरता उल्लेखनीय तो होती है, लेकिन आम तौर पर इस पर यकीन नहीं किया जाता।
अर्थशास्त्री अक्सर चीन की अर्थव्यवस्था को मापने के लिए आधिकारिक आंकड़े से परे वैकल्पिक तरीके ढूंढते रहते हैं। अन्य उपलब्ध आंकड़े और तथ्य सुझाते हैं कि हाल के महीनों में चीन द्वारा शुरू की गई कर्ज देने की बढ़ती प्रवृत्ति विकास को बनाए रखने को प्रेरित कर रही है।

लेकिन ऐतिहासिक मानकों द्वारा चीन की विकास दर घट रही है। इस वर्ष की विकास दर की गति पिछले वर्ष से धीमी है, जो पहले ही पिछले 25 वर्षों में सबसे कमजोर थी। इनोडो इकोनॉमिक्स (मेक्रोइकोनॉमिक्स का आकलन करने वाली स्वतंत्र कंपनी)  की मुख्य अर्थशास्त्री डायना च्युएलइवा कहती हैं कि चीन की विकास दर पहले से ही वित्तीय संकट से पहले की दरों से धीमी है। वहां की अर्थव्यवस्था उस अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है, जहां से निर्यात और निवेश आधारित विकास मॉडल शुरू होता है।

यह पूरी दुनिया के केंद्रीय बैंकों, अर्थशास्त्रियों, निवेशकों और कॉरपोरेट अधिकारियों के लिए चिंता का प्रमुख विषय है, क्योंकि चीन दशकों से विकास का सबसे बड़ा वाहक रहा है। उनकी मुख्य चिंता है कि अब आगे क्या होगा? आगे हम चीन की दुर्दशा के सर्वाधिक संभावित परिणामों के रूप में जिन तीन स्थितियों की अक्सर चर्चा होती है, उन्हें देखेंगे और यह भी कि इनका बाकी दुनिया के लिए क्या मतलब है-

वित्तीय मंदी-जब 2008 का सबसे बुरा वैश्विक वित्तीय संकट आया, तो चीन ने राज्य-निर्देशित खर्च का अभियान शुरू करके खुद को उससे बचा लिया था, जिससे कर्ज का पहाड़ खड़ा हो गया। इसने दुनिया भर में मंदी के झटकों को सहने में मदद की। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इससे सिर्फ चीन के आकलन करने में देरी हुई।  चीन अब भी भारी कर्ज दे रहा है और विशेषज्ञों ने खतरे की घंटी बजानी शुरू कर दी है। इस स्थिति में चीन 2008 जैसे संकट का जोखिम मोल ले रहा है, जिसने वाल स्ट्रीट को हिला दिया था और अमेरिका को मंदी और वर्षों के सुस्त विकास के दुश्चक्र में डाल दिया था। बाकी दुनिया, जो अब भी यूरोप के संकट से जूझ रही है, इसमें फंस सकती है। पिछले महीने बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट द्वारा प्रकाशित आंकड़ों में अनुमान लगाया गया है कि चीन के बकाया ऋण और उसकी दीर्घकालीन आर्थिक विकास दर के बीच की खाई रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गई है और यह उस ऐतिहासिक स्तर से ऊपर है, जिससे संकेत मिलते हैं कि वित्तीय संकट आसन्न है।

समस्या कुछ हद तक तेजी से बढ़ती 'शैडो फाइनेंसिंग'(अनियंत्रित समानांतर वित्त व्यवस्था) में निहित है, इसमें धन प्रबंधन उत्पाद, या गैर पारंपरिक कर्ज के दूसरे रूप शामिल हैं, जोकि कुछ बड़ी धोखाधड़ी का आधार रहे हैं। इस महीने एक रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चेताया है कि चीन के छोटे बैंकों में कैपिटल बफर्स (अनिवार्य पूंजी) से करीब तीन सौ फीसदी ज्यादा तो 'छाया ऋण' हैं । कर्ज में तेजी से वृद्धि ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक अधिकारी को इस महीने चीन से निर्गत होने वाले 'वित्तीय आपदा' के जोखिम के बारे में चेताने के लिए प्रेरित किया।

अच्छे दिनों की वापसी-तो फिर चीन क्यों नहीं अपने खर्च को नियंत्रित कर मंदी से उबर सकता? आशावादी आर्थिक चुनौतियों से निपटने के चीन के इतिहास की तरफ इशारा करते हैं- 2008 में तेजी से बढ़ते कर्ज के साथ ही बैंकिंग व्यवस्था को राहत पैकेज दिए गए और सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों को कष्टकारी तरीके से पुनर्गठित किया गया। इस बार चीन कर्ज के पुनर्गठन की योजना के साथ आगे बढ़ सकता है, जबकि उन क्षेत्रों में खर्च बढ़ा सकता है, जो इसके बढ़ते उपभोक्ता वर्ग को फायदा पहुंचा सकते हैं, मसलन, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र। यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है, जिसे एक चिंगारी की तलाश है। लेकिन समस्या यह है कि चीन के कर्ज का बोझ इतना ज्यादा है, जितना पहले कभी नहीं रहा। इसके साथ ही हाल में विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने से दूसरी चुनौतियां पैदा हो गई हैं-सरकार को लागत के अनुपात में लाभ नहीं मिल रहा है। सबसे बड़ी बात है कि आर्थिक सुस्ती को देखते हुए निजी कंपनियों ने निवेश से हाथ खींच लिए हैं। इस साल अब तक विकास दर को लक्ष्य तक बनाए रखने में सरकारी खर्च से मदद मिली है और रियल इस्टेट निवेश में पलटाव से भी मदद मिली है, हालांकि हाउसिंग बुलबुले के फूटने का जोखिम है।

 जापान से तुलना-चीन के उच्च कर्ज, खर्च करने की असमर्थता और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते अर्थशास्त्री दूसरी एशियाई ताकत जापान से इसकी तुलना करने लगे हैं। चीन की तरह जापान को भी 1990 के दशक में भारी बैंक कर्ज, शेयर बाजार के बुलबुले के फूटने और कई उद्योगों में क्षमता से अधिक दबाव का सामना करना पड़ा था। कई कारखानों और कंपनियों को बंद करने जैसे मुश्किल विकल्प अपनाने के प्रति अनिच्छा के कारण जापानी नेताओं ने वर्षों तक आर्थिक ठहराव का सामना किया। नतीजतन उस दशक को खोया हुआ बताया गया, हालांकि जापान की कई समस्याएं आज भी बरकरार हैं।

ऑटोनॉमस रिसर्च के एक सहभागी और फिच रेटिंग्स में चीनी बैंकिंग विश्लेषक रह चुके चार्लेन चू कहते हैं, परिणाम और समय सीमा दोनों के संदर्भ में कर्ज का इतना विस्तार जापान में जो देखा गया उससे अधिक है। मुझे लगता है कि कई मायनों में जापान का परिणाम चीन के लिए एक बेहतर परिदृश्य हो सकता है।
Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

सर्दियों में ट्रेडिंग है ओवरकोट, हर ड्रेस के साथ इन सेलिब्रिटीज की तरह कर सकते हैं मैच

  • सोमवार, 11 दिसंबर 2017
  • +

ग्रेजुएट उम्मीदवारों के लिए सिस्टम ऑफिसर बनने का मौका, ऐसे करें अप्लाई

  • सोमवार, 11 दिसंबर 2017
  • +

रोज रात में लकड़बग्घे को दावत पर बुलाता है ये शख्स, फिर करता है ऐसा काम

  • सोमवार, 11 दिसंबर 2017
  • +

B'Day Spl: दिलीप कुमार की हरकत से परेशान होकर सेट से भागी थी ये हीरोइन, उम्र भर रहा पछतावा

  • सोमवार, 11 दिसंबर 2017
  • +

प्रोड्यूसर ने नहीं मानी बात तो आमिर खान ने छोड़ दी फिल्म, अब ये एक्टर करेगा 'सैल्यूट'

  • रविवार, 10 दिसंबर 2017
  • +

Most Read

राहुल के लिए पहाड़ जैसी चुनौतियां

Challenges like mountain for Rahul
  • रविवार, 10 दिसंबर 2017
  • +

कट्टरता के आगे समर्पण

 bowed down to radicalism
  • शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017
  • +

आसान नहीं राहुल की राह

Not easy way for Rahul
  • रविवार, 10 दिसंबर 2017
  • +

अंतहीन कृषि संकट से कैसे उबरें

How to recover from endless agricultural crisis
  • मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
  • +

शिलान्यास, ध्वंस और सियासत

Foundation, Destruction and Politics
  • बुधवार, 6 दिसंबर 2017
  • +

नेट की आजादी का सवाल

Net Freedom Question
  • गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!