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एक साथ चुनाव वक्त की जरूरत
शांता कुमार
Updated Wed, 29 Jun 2016 03:07 PM IST
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शांता कुमार
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देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ करवाने का सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक है। इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। यह केवल सुविधा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि बेहतर सुशासन के जरिये करोड़ों लोगों को बुनियादी सुविधाएं देने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
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चुनाव एक प्रदेश में हो या कुछ अधिक प्रदेशों में, पूरे देश की राजनीति उसी में उलझ जाती है। हर वर्ष कहीं न कहीं चुनाव होते हैं। अभी पांच राज्यों के चुनाव से निवृत्त हुए और उसके तुंरत बाद अगले पांच राज्यों के चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है। धीरे-धीरे लोकतंत्र चुनाव तंत्र बनता जा रहा है। देश हर समय चुनावी मूड में रहता है और विकास करने का मूड बहुत कम बन पाता है। चुनाव का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत के प्रथम चुनाव पर एक रुपया प्रति व्यक्ति खर्च आया था, अब बाईस रुपये प्रति व्यक्ति खर्च होता है। चुनावी खर्च 22 गुना बढ़ा और आबादी 35 करोड़ से 125 करोड़ हो गई। चुनाव पर सरकार के खर्च के मुकाबले बाकी खर्च कई गुना बढ़ गया है। पार्टियों, उम्मीदवारों का खर्च तो लाखों-करोड़ों में पहुंचता है। इनमें ज्यादातर काला धन होता है। यदि चुनाव पांच साल में एक बार हो, तो कई लाख करोड़ की बचत होगी और लोकतंत्र पर काले धन की कालिख भी पांच बार के बजाय एक बार ही लगेगी।
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आज का आर्थिक परिदृश्य चिंताजनक है। एक तरफ अमीर करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि आर्थिक विकास तो हुआ, परंतु सामाजिक न्याय नहीं हुआ। केंद्र की नई सरकार गरीब किसानों के लिए बहुत कुछ करने का प्रयत्न कर रही है, पर विरासत में मिली समस्याएं जटिल हैं। गरीबी और बेरोजगारी दूर करने के लिए ज्यादा धन और समय की जरूरत है।
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आज बहुत-सा समय और धन प्रति वर्ष चुनाव पर खर्च हो जाता है। एक साथ चुनाव होने पर सरकार का धन तो बचेगा ही, पार्टियों और उम्मीदवारों के लाखों-करोड़ों रुपये भी बच जाएंगे।
अटल जी की सरकार के समय भैरोसिंह शेखावत और मैंने इस प्रश्न पर अटल जी से कई बार बात की थी। उन्होंने सभी दलों से बातचीत प्रारंभ भी की, लेकिन बात पूरी तरह से आगे नहीं बढ़ सकी। तब एक सुझाव यह भी आया था कि पूरे देश में सभी चुनाव-पंचायतों से लेकर लोकसभा तक-पांच साल में निश्चित समय में एक बार हों। कोई स्थान खाली होने पर उप-चुनाव कराने के बजाय दूसरे स्थान पर रहने वाले को विजयी घोषित कर दिया जाए। दल-बदल कानून को और सख्त बना दिया जाए। विधानसभाओं में अविश्वास मत केवल दो तिहाई बहुमत से पारित हो, यदि कोई प्रदेश सरकार समय से पहले गिर जाए, तो बाकी के समय के लिए उस राज्य में राष्ट्रपति शासन रहे। इस प्रावधान से विधानसभाओं की स्थिरता निश्चित हो जाएगी, क्योंकि कोई भी विधायक बेकार नहीं रहना चाहेगा।
लोकतंत्र के लिए हमारी प्रतिबद्धता है, परंतु आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश के प्रत्येक नागरिक को सब प्रकार से सम्मान का जीवन दिलाना उससे भी बड़ी प्रतिबद्धता है। इसलिए लोकतंत्र को थोड़ा नियंत्रित और मर्यादित करने के लिए चुनाव प्रणाली में सुधार अत्यंत आवश्यक है।