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दोनों चुनाव एक साथ ?
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बी के चतुर्वेदी
हमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव क्या एक साथ नहीं कराने चाहिए? आजादी के बाद जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई, तो 1952, 1957, 1962 और 1967 में सभी चुनाव एक साथ कराए गए। बाद में राज्य विधानसभाओं के समय से पहले विघटन और लोकसभा की प्रक्रिया के भी बाधित रहने के कारण लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराए जाने लगे।
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सभी चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में मजबूत तर्क हैं। पहली बात तो यह है कि बार-बार चुनाव के चलते नियमित राजनीतिक रैलियों के कारण सार्वजनिक जीवन प्रभावित होता है। जब भी चुनाव होते हैं, राजनीतिक पार्टियां चंदे जुटाती हैं। अक्सर ये चंदे दान के रूप में व्यावसायिक घराने या समृद्ध लोग देते हैं। यह भ्रष्टाचार की बुनियाद रखता है, क्योंकि जब पार्टियां चुनाव जीतकर सत्ता में आती हैं, तो अपने दानदाताओं को उपकृत करने के लिए सरकारी नीतियों को उनके अनुकूल बनाती हैं। निर्वाचन आयोग भी चुनाव कराने के लिए पैसे खर्च करता हैं। बार-बार चुनाव होने से भारी मात्रा में सार्वजनिक धन बर्बाद होता है।
दूसरी बात, जब भी चुनाव होते हैं, तो नीति निर्माण की प्रक्रिया और सामाजिक माहौल बिगड़ जाता है। बार-बार चुनाव का सामना करने वाली सरकारें दीर्घकालीन के बजाय अल्पकालीन मुद्दों पर ही ज्यादा ध्यान देती हैं। इससे सुशासन की व्यवस्था गड़बड़ा जाती है। चुनाव अभियान में अनिवार्य रूप से जाति, धर्म, उप-जाति और अन्य विभाजनकारी ताकते मजबूत होती हैं, जो हमारे राष्ट्रीय ताने-बाने को कमजोर करती हैं।
तीसरी बात, चूंकि ऐसेे चुनाव देश के कुछ हिस्से या अन्य हिस्सों में बार-बार होते हैं, इसलिए वहां चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है, जो संबंधित राज्य में सरकार के तमाम फैसलों पर प्रतिबंध लगा देती है। इसका असर योजनाओं के क्रियान्वयन एवं सुशासन पर भी पड़ता है।
चौथी बात, चुनाव के दौरान भारी संख्या में कर्मचारियों और अर्द्धसैनिक बलों की जरूरत पड़ती है। जब भी इस तरह के चुनाव होते हैं, तोे अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती होती है, जिसके चलते पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर और माओवाद प्रभावित जिलों जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उनकी पर्याप्त तैनाती नहीं हो पाती।
भले ही एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में ये तमाम तर्क वजनदार हैं, लेकिन इसके विरोध की आवाजें भी दमदार हैं। कुछ लोगों का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से हमारी संघीय प्रणाली का ताना-बाना कमजोर होगा। जब लोग एक ही बूथ पर जाकर विधानसभा और लोकसभा के लिए मतदान करेंगे, तो इसकी बहुत संभावना है कि वे एक ही राष्ट्रीय पार्टी के पक्ष में मतदान करें। अतीत में हुए ऐसे चुनावों का विश्लेषण दो संस्थानों-आईडीएफसी एवं सीएसडीएस और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के दो प्रोफेसरों द्वारा किया गया है। दोनों अध्ययनों का निष्कर्ष एक समान है-यदि एक साथ चुनाव होते हैं, तो लोगों द्वारा एक ही पार्टी को वोट देने की संभावना रहती है।
मौजूदा सांविधानिक प्रावधानों को देखते हुए एक साथ चुनावों का आयोजन संभव नहीं है। मार्च से जून, 2019 में निर्धारित लोकसभा चुनाव के साथ राज्यों के चुनाव कराने के लिए संविधान में व्यापक बदलाव, कटौती या विस्तार के लिए संशोधन की आवश्यकता होगी। एक तरफ जहां कुछ राज्यों की विधानसभा के कार्यकाल में 24 महीने की कटौती करनी होगी, वहीं कुछ राज्यों की विधानसभा में दो वर्ष से अधिक की बढ़ोतरी करनी होगी। तमाम आलोचनाओं के बावजूद अगर हम 2019 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम भी होते हैं, तो फिर यह निरर्थक हो जा सकता है, क्योंकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समय से पहले विघटन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यह देखना वाकई दिलचस्प है कि 1967 के बाद लोकसभा और विधानसभाओं का समय से पहले विघटन व्यापक पैमाने पर हुआ है। सोलह लोकसभा चुनाव में से छह लोकसभा चुनाव सदन के पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किए बिना ही आयोजित किए गए। इसी तरह पिछले सत्तर वर्षों में सौ से अधिक बार संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत आपातकालीन प्रावधान (राज्यों में राष्ट्रपति शासन) का इस्तेमाल किया गया। ऐसे कई मामलों में राज्य विधानसभाओं का समय पूर्व विघटन हुआ।
सभी विधानसभाओं और लोकसभा का चुनाव कराने का सुझाव स्पष्ट रूप से संभव नहीं है। इसलिए हमें एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पर नजर डालनी चाहिए। हम इन दोनों निकायों की निर्धारित अवधि को यथासंभव अबाधित कर प्रशासनिक प्रक्रिया के व्यवधानों को कम कर सकते हैं। इन निर्वाचित सदनों के कार्यकाल में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रावधानों की जरूरत होगी और निर्वाचन आयोग को चुनाव का समय निर्धारित करने के लिए थोड़ी छूट देनी होगी। निम्नलिखित नीतिगत परिवर्तन के बाद इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है-
पहला, संविधान में संशोधन करके राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को छह महीने घटाने या बढ़ाने की अनुमति दी जा सकती है। इससे चुनाव आयोग को ज्यादातर चुनाव एक साथ कराने के लिए एक वर्ष का समय मिलेगा। अगर भविष्य में लोकसभा समय पूर्व भंग हो जाती है, तो चुनाव आयोग इन शक्तियों का उपयोग करके एक साथ चुनाव कराने के लिए राज्यों के समूह को बढ़ा सकता है। दूसरा, इन सदनों में स्थिरता लाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव के साथ विश्वास प्रस्ताव के लिए भी मतदान की अनुमति दे सकते हैं। विधि आयोग एवं चुनाव आयोग ने भी ऐसे ही सुझाव दिए हैं। तीसरा, चुनाव आयोग को मतदाताओं को जागरूक करके एक साथ चुनाव की स्थिति में एक ही पार्टी के प्रति उनके झुकाव को कम किया जा सकता है। ऐसे अभियानों को गैर सरकारी संगठनों और अन्य संगठनों को भी संचालित करना चाहिए।