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एक साथ चुनाव की बात
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अजय सेतिया
देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। 1967 में कुछ राज्यों में बनी गठबंधन सरकारें कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं, जिससे मध्यवधि चुनावों की नौबत आई। तब से एक साथ चुनावों का सिलसिला टूट गया। पहली एनडीए सरकार के समय भाजपा को लगता था कि अटल बिहारी वाजपेयी से बड़ा कोई नेता नहीं है, इसलिए उनके व्यक्तित्व का लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं के चुनावों में भी फायदा उठाया जा सकता है। अब भी भाजपा को लगता था कि मोदी का करिश्माई नेतृत्व लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के चुनावों में भी भाजपा के लिए कारगर साबित हो सकता है, इसलिए दोनों बार एक साथ चुनाव की जोरदार मुहिम चलाई गई।
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अपनी मुहिम को सिरे चढ़ाने और क्षेत्रीय दलों को राजी करने के लिए यहां तक कहा गया कि पांच साल नहीं, तो ढाई-ढाई साल के अंतराल पर दो बार चुनाव हों। आधे राज्यों की विधानसभा का चुनाव अप्रैल 2019 में लोकसभा के साथ हो और बाकी राज्यों का इसके ढाई साल बाद अक्तूबर-नवंबर 2021 में। अगर बीच में कहीं कोई राजनीतिक संकट पैदा हो और चुनाव की जरूरत पड़े, तो वहां फिर अगला चुनाव ढाई साल के चक्र के साथ हो। पांच साल में दो बार चुनावों की अपनी मुहिम को सफल बनाने के लिए भाजपा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड की अपनी सरकारों की एक साल पहले बलि देने को तैयार बताई जा रही थी। एक साथ चुनावों का फायदा बताने के लिए देश भर में दर्जनों सेमिनार करके लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन साल भर तक एक साथ चुनावों की जोरदार पैरवी के बाद हुआ कुछ भी नहीं।
चुनाव आयोग ने छह अक्तूबर को पांच विधानसभाओं के चुनावों का एलान कर दिया। सवाल उठता है कि साल भर की मुहिम का क्या हुआ, भाजपा समय पूर्व लोकसभा चुनावों का जोखिम उठाने को तैयार क्यों नहीं हुई। या फिर मोदी के करिश्माई नेतृत्व का लाभ उठाने के लिए अपनी तीन सरकारों की बलि देते हुए पांच महीने के लिए राष्ट्रपति राज लगाकर लोकसभा के साथ चुनाव करवाने को तैयार क्यों नहीं हुई। सच यह है कि कोई आदर्श की बातें चाहे जितनी करे, पर राजनीति में कोई त्याग करने को तैयार नहीं होता। कांग्रेस और अन्य छोटे-बड़े दलों को लगता है कि मोदी अपनी पार्टी के फायदे के लिए एक साथ चुनाव की पैरवी कर रहे हैं, क्योंकि इस समय मोदी का नेतृत्व देशव्यापी है, कोई अन्य राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल उनके समक्ष कहीं नहीं ठहरता। सभी दल सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचते हैं, कभी किसी बड़े मुद्दे पर राष्ट्र को सामने रखकर नहीं सोचा जाता।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। वह यह कि एक साथ चुनाव के फायदे कम हैं और नुकसान ज्यादा हैं। छोटे-छोटे अंतराल पर किसी न किसी चुनाव का सामना करने के कारण कोई भी पार्टी या नेता चुनाव जीतने के बाद निरंकुश नहीं होता, जबकि तय समय पांच साल बाद ही चुनाव होने पर नेताओं और दलों की निरंकुशता बढ़ जाएगी। एक साथ चुनाव से भारतीय लोकतंत्र को दूसरा बड़ा नुकसान यह होगा कि क्षेत्रीय एजेंडे पर राष्ट्रीय एजेंडा हावी हो जाएगा। क्षेत्रीय दलों का महत्व कम हो जाएगा, जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ होगा। तीसरा विचारणीय विषय यह है कि अगर 1996 की त्रिशंकु लोकसभा की तरह सरकार गिर जाती है, तो क्या मध्यावधि चुनाव नहीं होंगे, होंगे तो उस का कार्यकाल पांच साल होगा या बाकी का बचा कार्यकाल। चौथा विषय यह है कि अगर सदन का कार्यकाल तय होगा, तो राज्य निरंकुश हो जाएंगे, क्योंकि राज्यपालों की तो कोई भूमिका ही नहीं रहेगी।