{"_id":"671c2913ab3c455a2007e0b6","slug":"silence-on-infertility-must-be-broken-time-to-embrace-miracle-of-modern-medicine-as-well-as-magic-of-knowledge-2024-10-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"बांझपन: चुप्पी तोड़नी होगी... अब आधुनिक चिकित्सा चमत्कार के साथ-साथ ज्ञान और सहयोग के जादू को अपनाने का समय","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
बांझपन: चुप्पी तोड़नी होगी... अब आधुनिक चिकित्सा चमत्कार के साथ-साथ ज्ञान और सहयोग के जादू को अपनाने का समय
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
भारत में बांझपन पर चुप्पी तोड़ना समय की मांग
- फोटो :
अमर उजाला / एएनआई
विस्तार
भारत में हम लोग बांझपन के बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि यह पुरुष या महिला से लेकर विस्तृत परिवार तक के लिए कमी और शर्म का एक ठप्पा है। लेकिन इसके बारे में हमें बात करनी चाहिए, क्योंकि यह संकट बढ़ रहा है। इतने लंबे समय से परिवार नियोजन की कहानी को सार्वजनिक विमर्श में शामिल कर दिया गया है कि बांझपन से जूझ रहे जोड़े की चुप्पी और उनकी शर्म का कभी जिक्र ही नहीं किया गया। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 10 से 15 प्रतिशत विवाहित जोड़े (2.7 करोड़ लोग) बांझपन का सामना कर रहे हैं। वैश्विक बांझपन के आंकड़ों में अकेले भारत की हिस्सेदारी 25 फीसदी है।जीवनशैली से लेकर पर्यावरण और शरीर विज्ञान से लेकर आनुवंशिक कारणों तक, बांझपन के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, समाज भी बदल रहा है, क्योंकि लोग शहरों की तरफ जा रहे हैं और जीवनशैली में बदलाव का अनुभव कर रहे हैं। कॅरिअर की मांग और व्यस्त जीवनशैली के चलते विवाह में देरी हो रही है, खासकर शिक्षित लोगों के बीच, जो विवाह से ज्यादा कॅरिअर को तवज्जो दे रहे हैं। लंबी यात्रा, गतिहीन जीवनशैली, काम का तनाव, परिवार से दूरी और सुविधाजनक फास्ट फूड तक आसान पहुंच हार्मोन में बदलाव के चलते प्रजनन वर्षों में कमी, शुक्राणुओं की कम संख्या, मोटापा, मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति जैसी समस्याओं आदि को जन्म दे रही है, जो प्रजनन क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही है।
इसके अलावा, भारतीय समाज में परिवार और संतानोत्पत्ति पर बहुत जोर दिया जाता है। ऐसे परिदृश्य में पुरुष और स्त्री, दोनों को काफी तनाव झेलना पड़ता है। जहां महिलाओं को बच्चा पैदा करने की क्षमता के आधार पर आंका जाता है, वहीं पुरुषों से उम्मीद की जाती है कि वे वंश आगे बढ़ाएं। इसके अलावा बेटे को जन्म देने का दबाव भी होता है। हाल ही में मेरी बात प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुणा कालरा से हुई, जिन्होंने इस क्षेत्र में अपने 30 साल से ज्यादा के अनुभवों के आधार पर एक किताब लिखी है-आई वांट ए बॉय। मैं यह जानकर हैरान रह गई कि एक लड़के की चाहत शहरी, शिक्षित और उच्च मध्यम वर्ग और समाज के धनी तबके में भी उतनी ही ज्यादा है, जितनी कि गरीबों में।
जहां तक बांझपन की बात है, तो किसी भी वर्ग में महिलाओं को ही बच्चे को जन्म न दे पाने का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है, भले ही समस्या उसके पति के साथ ही क्यों न हो। खासकर ग्रामीण भारत में प्रजनन, प्रजनन क्षमता और लिंग निर्धारण कैसे काम करते हैं, इस तथ्य को अब भी पूरी तरह से समझा जाना बाकी है। जागरूकता की कमी के कारण महिलाओं को अत्यधिक दबाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम प्रजनन के बारे में ज्यादा खुली और स्पष्ट बातचीत करें। लेकिन ऐसा करने में अब भी कई सामाजिक चुनौतियां हैं, भले ही इससे बहुत दुख और दर्द होता है।
शहरी भारत भी इससे अछूता नहीं है, यहां भी 'छवि' को लेकर समस्याएं होती हैं। जिन जोड़ों को बांझपन की समस्या से गुजरना पड़ता है, वे इसे अकेले की लड़ाई मानते हैं। वे अपने संघर्ष को गोपनीय रखना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें समाज द्वारा दयनीय और कमजोर समझे जाने का भय होता है। जिन लोगों ने बांझपन का इलाज करवा कर संतानोत्पत्ति करवाई है, उनमें मशहूर हस्तियां भी शामिल हैं। लेकिन वे शायद ही कभी अपने इस संघर्ष के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलते हैं। वे दुनिया के सामने अपनी कथित 'सामान्य' छवि पेश करना पसंद करते हैं। ऐसा करके वे न केवल खुद को भावनात्मक प्रतिक्रिया से वंचित करते हैं, जो आवश्यक है, बल्कि दूसरों को आशा के उपहार से प्रेरित करने में भी विफल होते हैं।
प्रजनन में सहायता के लिए हाल के दिनों में चिकित्सा प्रौद्योगिकी में कई प्रगति हुई हैं, हालांकि वे महंगी हैं, फिर भी परिवारों को आशा प्रदान करती हैं। बहुत से दंपती इसका लाभ उठा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2022 में सहायक प्रजनन का बाजार तीन अरब डॉलर था, जिसमें प्रति वर्ष 20 प्रतिशत की दर से वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि बांझपन को लेकर चुप्पी हो सकती है, लेकिन व्यापार में वृद्धि एक अलग कहानी कहती है। और जहां पैसा है, वहां शोषणकारी और भ्रष्ट प्रथाएं होना लाजिमी है। एक आईवीएफ चक्र की लागत कम से कम एक से ढाई लाख रुपये होने के कारण, कम आय वाले जोड़े इन चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए जूझते हैं।
इसके अलावा, 'किराये पर कोख', जिसमें समृद्ध जोड़े गर्भधारण करने के लिए किराये पर गर्भाशय लेते हैं, का इस्तेमाल गरीब महिलाओं के शोषण के लिए किया जाता है। प्रजनन व्यवसाय को विनियमित करने के लिए सरकार को एआरटी विनियमन विधेयक और सरोगेसी (विनियमन) विधेयक के साथ प्रजनन क्लीनिकों में नैतिक प्रथाओं को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना पड़ा है, जो मुख्य रूप से ऐसे लोगों के लिए आशा की किरण है, जो बच्चे के लिए तो बेताब हैं, मगर चिकित्सकीय रूप से सक्षम नहीं हैं।
बांझपन के सामाजिक एवं वित्तीय प्रभावों के अलावा मानसिक स्वास्थ्य पर भी खामोश दुष्प्रभाव पड़ता है और इसका गहरा असर हो सकता है। बांझपन का सामना करने वाले जोड़े शारीरिक कमी, उदासी और आक्रोश की तीव्र भावनाओं को महसूस करते हैं, जिसके साथ जीना खतरनाक है। प्रजनन उपचार भी आर्थिक एवं भावनात्मक रूप से बहुत थकाऊ हो सकते हैं। अधिकांश आईवीएफ में एक से अधिक चक्र लगते हैं और जरूरी नहीं कि ये सफल हों।
बांझपन से जुड़ी इन परिस्थितियों को देखते हुए यह जरूरी है कि बांझपन के मुद्दे और इसकी चुनौतियों के बारे में खुलकर बातचीत हो। इस खामोश महामारी के कारण बहुत से लोग पीड़ित हैं। न केवल इसके समाधान पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है, बल्कि उन कारकों पर भी ध्यान देना चाहिए, जो पुरुषों और महिलाओं, दोनों में बांझपन को बढ़ा रहे हैं। भारतीय पारंपरिक जीवनशैली शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता करती है और सहायक सामाजिक नेटवर्क मन को इस समस्या से निपटने के लिए मजबूत बनाता है। अब समय आ गया है कि आधुनिक चिकित्सा के चमत्कारों को अपनाने के साथ-साथ हम पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों, ज्ञान और सहयोग के जादू को अपनाएं।