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रणनीतिक बदलाव का संकेत
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आर विक्रम सिंह
ऑपरेशन बालाकोट ने एक नया नियम लिखा है कि दोषी राष्ट्रों की संप्रभुताओं का उल्लंघन संभव है, यदि उन्होंने अपनी संप्रभुता का उपयोग हमारी संप्रभुता के विरुद्ध किया हो। शायद यह पहली बार है कि भारत ने अपने शत्रुओं को उनकी मांद में ही ध्वस्त करने की कार्रवाई की है। यदि यह हमारी सैन्य संस्कृति में परिवर्तन का प्रारंभ है, तो यह नई रणनीति भारत-अफगानिस्तान में मजहबी आतंक की धुरी को नेस्तानाबूद करने की क्षमता रखती है, क्योंकि अब आतंक का आधार तंत्र असुरक्षित हो गया है। आप चाहंे तो इसे ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ भी कह सकते हैं।
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हमने देखा है कि पाकिस्तान ने वर्ष 1989 से कश्मीर में नियमित आंतकी भेजने का काम बड़ी तेजी से प्रारंभ कर रखा है। इस कार्य के लिए एक पूरा प्रशासनिक तंत्र संचालित है। जैश-ए मोहम्मद, लश्कर-ए तैयबा इसके हरावल दस्ते हैं। अमेरिकी पाक समर्थित सफल जेहादी तालिबानी अभियान के बाद 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी हुई थी। अब वे तालिबानी लड़ाके खाली होने वाले थे, क्योंकि अफगानिस्तान फतह हो गया था और करीब ही कश्मीर था, जिसे आजाद कराना शेष था।
युद्ध के दौरान स्थापित हुए तालिबान पाकिस्तान आंतकी तंत्र का प्रभाव अब भारत को झेलना था। वह 1990 की 19 जनवरी की तारीख थी, जब कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करने का हुक्मनामा जारी किया गया था। उस समय किसी तरह जोड़-तोड़कर सत्ता में आई वी पी सिंह सरकार का दौर था। उस सरकार के आंतरिक विरोधाभास ही इतने बड़े थे कि उनके लिए अपनी सरकार को बचाए रखना ही बहुत बड़ी चुनौती थी। वह इस पाकिस्तान-अफगानिस्तान-अमेरिकी गठजोड़ का क्या करती, क्योंकि वह इसे समझ ही नहीं सकी। नकारात्मक राजनीति के पुरोधा वी पी सिंह ने सोचा कि मुफ्ती सईद को गृह मंत्री बनाकर उन्होंने कोई मास्टरस्ट्रोक खेला है। वही उनके गले की फांस बन गया। रूबैया सईद अपहरण के जवाब में आतंकियों को छोड़ने से कश्मीर के आतंकवाद को प्रोत्साहन मिला।
ऑपरेशन बालाकोट इस आतंक की जड़ पर पहला प्रहार है और भारत की बदल रही मानसिकता, आत्मनिर्भर रणनीति का प्रतीक है। इससे पहले दो वर्ष पूर्व सीमापार आंतकी लांचपैडों पर की गई आक्रामक कार्रवाई सीमित उद्देश्यों को लेकर हुई पहली बड़ी कार्रवाई थी। लेकिन बालाकोट एक रणनीतिक बदलाव है। नेतृत्व की परीक्षा चुनौतियों के सामने होती है। नेतृत्व सक्षम है, तभी आप बालाकोट कर सकते हैं। 26/11 का मुंबई हमला भी एक बड़ी चुनौती था, जिसमें हम सबूतों के डोजियर भेज कर और यह मानकर संतुष्ट हो गए थे कि इससे दुनिया में पाकिस्तान की बड़ी बदनामी हो रही है। उस दौर में भीरूता का आवरण इतना गहन था कि उसके जवाब में हमारे लिए ‘सैन्य प्रतिक्रिया’ जैसे शब्द का उच्चारण तक संभव नहीं था।
अब बालाकोट को केंद्र में रखकर एक संपूर्ण डॉक्ट्रिन या रणनीतिक सिद्धांत विकसित किए जाने की आवश्यकता है। जिसका उपयोग शांतिकाल में ऐसे सार्वभौमिक राष्ट्रों के विरुद्ध किया जा सके, जो अपनी सार्वभौमिकता का दुरुपयोग दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध परोक्ष युद्ध के लिए करते हैं। यह रणनीति शत्रु को आणविक प्रतिक्रिया करने की गुंजाइश नहीं देती। पाकिस्तान का यह लक्ष्य रहा है कि कश्मीर में आतंकी गतिविधियां इस हद तक बढ़ाई जाएं कि भारत वार्ता की भेज पर बैठने को बाध्य हो जाए। पुलवामा हमला भारत को चुनावों के दौर में किंकर्तव्यविमूढ़ बनाते हुए एक असहाय देश के रूप में प्रदर्शित करने के लिए किया गया था। लेकिन भारत ने नई रणनीति का सहारा लेकर इस संकट को अपनी शक्ति में बदल दिया है।