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हिंदी विरोध की सिकुड़ती जगह : राज्य के शीर्ष नेता भी इस आंदोलन में शामिल हो गए

Sat, 24 Aug 2019 12:26 AM IST
भास्कर साई एम भास्कर साई
एम भास्कर साई Published by: भास्कर साई Updated Sat, 24 Aug 2019 12:26 AM IST
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Shrinking place of Anti hindi Movement
हिंदी आंदोलन - फोटो : a

कुछ महीने पहले यह आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में दक्षिण के गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश की गई। तमिलनाडु के राजनीतिक दल, खासकर प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक ने केंद्र की भाजपा की अगुआई वाली सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इसका उद्देश्य तमिलनाडु को धोखा देना है।


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कुछ महीने पहले यह आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में दक्षिण के गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश की गई। तमिलनाडु के राजनीतिक दल, खासकर प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक ने केंद्र की भाजपा की अगुआई वाली सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इसका उद्देश्य तमिलनाडु को धोखा देना है।

हालांकि इससे पहले कि यह मुद्दा 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलन की तरह राजनीतिक आंदोलन का रूप लेता, केंद्र ने विवादित प्रावधान को खत्म कर दिया और आश्वासन दिया कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी।

इस हफ्ते के प्रारंभ में बंगलूरू में एक जैन उत्सव के लिए लगाए गए हिंदी बैनर के कथित तौर पर तोड़फोड़ पर कन्नड़ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किए जाने के बाद पड़ोसी राज्य कर्नाटक में आंदोलन भड़क उठा। इसकी शुरुआत बीते शनिवार को हुई, जब एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होना शुरू हुआ, जिसमें दिखाया गया कि कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ता हिंदी के होर्डिंग्स में कन्नड़ के बहिष्कार से नाराज होकर नारे लगा रहे थे।

नारे लगाते हुए कार्यकर्ता सीढ़ी पर चढ़ गए और चाकू से होर्डिंग को काटकर गिरा दिया। जल्द ही यह वीडियो वायरल हो गया और जैन फेडरेशन के सदस्यों ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज की, जिसके बाद पुलिस ने कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इस मामले में छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। लेकिन यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ, बल्कि गिरफ्तारी के बाद और बढ़ गया, क्योंकि कन्नड़ अस्मिता के नाम पर 'रिलीज कन्नड़ एक्टिविस्ट' ट्वीटर पर ट्रेंड करने लगा और राज्य के शीर्ष नेता भी इस आंदोलन में शामिल हो गए।

कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अधिकारियों से अपील की कि बैनर के साथ तोड़फोड़ करने वाले कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए। उन्होंने कहा कि 'राज्य सरकार को कन्नड़ों की भूमि, पानी और भाषा के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे आंदोलन का सम्मान करना चाहिए और उनका दमन नहीं करना चाहिए। उनकी मांगें, जो वैध हैं, पूरी होनी चाहिए।'

ट्वीटर पर मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से अपील करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कहा कि 'कृपया, कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले लीजिए। आप राज्य को आवश्यक धनराशि आवंटित करने के लिए केंद्र को मनाकर अपनी मर्दानगी दिखा सकते हैं।'

जैसे ही असंतोष के स्वर उठने लगे, मुख्यमंत्री को स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक बयान जारी कर येदियुरप्पा ने कहा कि उनकी सरकार कन्नड़ और कन्नड़भाषियों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और इस मामले पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

हालांकि उन्होंने कहा कि रविवार को हुई पुलिस कार्रवाई कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से की गई थी, न कि कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए। उन्होंने कहा कि मुझे कन्नड़, कन्नड़भाषी और किसानों की बराबर चिंता है। लोगों का कल्याण ही मेरा आदर्श वाक्य है।

इस बीच कन्नड़ कार्यकर्ताओं की भी आलोचना होने लगी। बंगलूरू दक्षिण के सांसद तेजस्वी सूर्या ने ट्वीट किया, कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा एक मंदिर के हिंदी बैनर को लेकर हमारे जैन बंधुओं पर हमले से बेहद दुखी हूं। ऑल इंडिया जैन माइनरिटी फेडरेशन के कर्नाटक के अध्यक्ष पसन्ना संचेती ने कहा कि कर्नाटक के विकास में योगदान करने वाले शांतिप्रिय जैनों पर हमला करना सच्चे कन्नड़ प्रेमियों और कार्यकर्ताओं को बदनाम करना है।

ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। जैन फेडरेशन के सदस्य प्रमेश जैन के अनुसार, एक महीने के भीतर यह इस तरह की चौथी घटना है। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगलूरू में अगस्त के बाद से कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ताओं ने कई जैन मंदिरों और प्रार्थना स्थलों के बाहर लगे होर्डिंगों को तोड़ दिया।

आखिर, दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर इतनी घृणा क्यों है? तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ नेता हिंदी के खिलाफ क्यों हैं? द्रमुक नेता कार्तिक कहते हैं, 'इस मामले में हम हिंदी या किसी अन्य भाषा के खिलाफ नहीं हैं। हम केवल अपने हितों की रक्षा और अपनी मातृभाषा का संरक्षण करना चाहते हैं। हम केवल हिंदी थोपे जाने का विरोध कर रहे हैं, जैसे कि छात्रों के लिए हिंदी को अनिवार्य बना दिया गया था।

अगर कोई हिंदी सीखना चाहता है, तो वे निजी संस्थानों या शिक्षकों के माध्यम से ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं।' जब उनसे इस आरोप के बारे में पूछा गया कि द्रमुक के वरिष्ठ नेताओं के परिजनों द्वारा संचालित स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है, तो उन्होंने कहा कि 'कई निजी स्कूल हिंदी पढ़ाते हैं, अकेले हम पर क्यों निशाना साध रहे हैं? मैं फिर से दोहराता हूं कि हम हिंदी को थोपे जाने का विरोध करते हैं, अपने स्तर पर इसकी पढ़ाई या शिक्षण का नहीं।'

लेकिन भाजपा के नारायण इसका जवाब देते हैं, यह द्रमुक जैसी द्रविड़ पार्टियों के दोहरे मापदंड को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। जब निजी स्कूलों के छात्र (पैसे खर्च करने में सक्षम) हिंदी सीख सकते हैं, तो गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए इस विकल्प से क्यों इनकार किया जा रहा है? उन्होंने क्या पाप किया है? यह उनके साथ अन्याय है।

अतीत के विपरीत लोग अब हिंदी विरोधी आंदोलनकारियों के इरादों और तमिल की सुरक्षा के नाम पर की जा रही राजनीति को समझते हैं। दरअसल बाजार और रोजगार की बड़ी संभावनाओं के बीच हिंदी विरोध की राजनीति को अब उतना महत्व नहीं मिलता, क्योंकि लोग हिंदी की ताकत को समझते हैं। पहले की तरह उन्हें हिंदी विरोध के नाम पर बरगलाया नहीं जा सकता।

तमिल-हिंदी विद्वान शेषैया कहते हैं कि कोई भी भाषा सीखना निश्चित रूप से फायदेमंद है। अगर दक्षिण के छात्र हिंदी सीखेंगे, तो उसके कई फायदे हैं, उत्तर भारतीय राज्यों में नौकरी मिलने पर उन्हें काम करने में आसानी होगी। इसके बावजूद किसी पर कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए। सरकार को छात्रों को विकल्प देना चाहिए और उन्हें चुनने की अनुमति देनी चाहिए।
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