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थोड़ी संजीदगी दिखाते तो अच्छा होता
शिवदान सिंह
Updated Wed, 25 Sep 2013 07:52 PM IST
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पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह फिर विवादों के घेरे में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने टेक्निकल सपोर्ट डिविजन नाम की एक खुफिया यूनिट का गठन कर उसका इस्तेमाल दिल्ली में सत्ता में बैठे लोगों की टेलीफोन मॉनिटरिंग करने व जम्मू के एक एनजीओ यस कश्मीर को फंड देने के लिए किया।
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इस यूनिट पर उन्होंने 20 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें 12 करोड़ यूनिट के लिए खुफिया उपकरण खरीदने और आठ करोड़ अपने पक्ष में लॉबिंग कराने पर खर्च किए। इस लॉबिंग के तहत ही उन्होंने यस कश्मीर एनजीओ चलाने वाले हकीकत सिंह को ढाई करोड़ रुपये देकर जनरल विक्रम सिंह के खिलाफ झूठे एनकांउटर का एक मामला वहां की अदालत में दर्ज करवाया।
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वर्ष 2011 से ही जनरल वीके सिंह नया विवाद पैदा कर रहे हैं। पहले उन्होंने अपनी जन्मतिथि का विवाद खड़ा किया, उसके बाद जनरल तेजेंदर सिंह द्वारा रिश्वत देने का और फिर प्रधानमंत्री को लिखे पत्र द्वारा, जिसमें उन्होंने सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार और सैनिक साज-ओ-सामान की कमी का विवरण दिया था।
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मई, 2012 में जनरल विक्रम सिंह ने सेना की कमान संभाली और रक्षा मंत्री एके एंटनी ने उन्हें जनरल वीके सिंह के समय हुए विवादों को खत्म कर सेना की गरिमा और उसका अराजनीतिक स्वरूप बहाल करने का निर्देश दिया। वही काम विक्रम सिंह कर रहे हैं। कानून के विरुद्ध खड़ी की गई टेक्निकल सपोर्ट यूनिट खत्म की गई और इस पर खर्च हुए धन का हिसाब करने के लिए सेना ने सितंबर, 2012 में जनरल विनोद भाटिया की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित की, जिसमें 20 करोड़ रुपये का खर्च सामने आया। यह रिपोर्ट सेना ने सरकार को विगत में उचित कार्रवाई के लिए भेज दी।
होना तो यह चाहिए था कि रक्षा मंत्रालय जनरल वीके सिंह से सेना की कानूनी प्रणाली के अनुसार स्पष्टीकरण मांगती। इसके बजाय हुआ यह कि सेना की रिपोर्ट एक राजनीतिक हथियार की तरह उस समय देश को बताई गई, जब जनरल वीके सिंह नरेंद्र मोदी के साथ हरियाणा में रैली कर रहे थे। इसे आम नागरिक बदले की कार्रवाई ही मानेगा। हालांकि प्रथम दृष्टया सेना की रिपोर्ट में तथ्य नजर आ रहे हैं, पर खुद सरकार ने ही इस रिपोर्ट को बेअसर कर दिया है।
भारतीय सेना विश्व में एक अनुशासित, अराजनीतिक व देश के प्रजातंत्र का आदर करने वाली सेना मानी जाती है। फौजी मेसों व गलियारों में देश की राजनीति पर बात करना फौजी परंपरा के खिलाफ माना जाता रहा है। लेकिन वह परंपरा अब टूट रही है।
अभी तक भारत और पाकिस्तान की सेना अंग्रेजी सेना के कानून के मुताबिक चल रही है। यह कानून एक सेनाध्यक्ष को असीमित अधिकार देता है। यानी उसके पास एक सीमा तक सारे संसाधन होते हैं, जैसे स्वतंत्र न्याय प्रणाली, संचार व्यवस्था, चिकित्सा सुविधा आदि। इसी शक्ति का इस्तेमाल कर पूर्व के एकाधिक जनरलों ने घोटालों और अनियमितताओं को जन्म दिया था।
यदि जनरल वीके सिंह पर लगे आरोप सही हैं, तो उसी सैनिक कानून का दुरुपयोग इस बार भी हुआ है। सेनाधिकारियों के ऐसे आचरण से देश की सुरक्षा और सेना के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज हमारी सेना पर आतंकवाद का बढ़ता दबाव और सीमा पर घुसपैठ को रोकने की जिम्मेदारी बढ़ रही है। ऐसे में हमारे उच्चाधिकारियों को ऐसा आचरण करना चाहिए, जिससे सीमा पर हर तरह की कठिनाइयों से जूझते सैनिक प्रेरणा लें।
सैन्य कानून में अधिकार इसलिए दिए गए हैं कि एक सेनाधिकारी अपना कर्तव्य निभाने में किसी रुकावट व प्रक्रियागत कठिनाई महसूस न करे। पर उसी का दुरुपयोग कर पाकिस्तान की सेना ने अपने मुल्क को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। जनरल वीके सिंह के मुद्दे ने देश की छवि तार-तार की है, तो इसकी वजह सरकार का गैर पेशेवराना रवैया ही है।
आगामी लोकसभा चुनाव से पहले यह रिपोर्ट लीक कर सरकार ने विपक्ष और जनरल वीके सिंह को मौका दिया है कि वह सरकार की कार्रवाई को बदले की कार्रवाई का नाम दें। जब यह देश आतंकवाद, अलगाववाद और दंगे-फंसाद की गिरफ्त में लहूलुहान है, तब इस तरह के आरोपों से देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं।