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पाकिस्तान पर अंकुश का दिखावा, एफएटीएफ के कई सदस्य देशों और संस्थाओं ने दिया कर्जा

Fri, 18 Oct 2019 06:32 AM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Fri, 18 Oct 2019 06:32 AM IST
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Show off of curb on Pakistan

चूंकि पेरिस में एफएटीएफ की बैठक में  फैसला 18 अक्तूबर यानी आज लिया जाना है, ऐसे में, पाकिस्तानी मीडिया से बाहर निकली यह रिपोर्ट आधिकारिक नहीं हो सकती, जिसमें कहा गया है कि वित्तीय कार्रवाई कार्यबल ने फरवरी, 2020 तक पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखने का फैसला किया है। इसके बावजूद एफएटीएफ से पाकिस्तान के खिलाफ बहुत सख्ती की गुंजाइश शायद ही है। भारत के मीडिया और सरकारी हलकों में भी यह उम्मीद जताई जा रही है कि अगर 39 सदस्यीय एफएटीएफ ने कड़ा रुख अपनाया, तो पाकिस्तान प्रेरित आतंकी कार्रवाइयों पर अंकुश लग सकता है। लेकिन तथ्यों पर गौर करें, तो ऐसी धारणा गलत है, क्योंकि एफएटीएफ की स्थापना केवल सिफारिश करने के लिए की गई है, प्रतिबंध लगाने का अधिकार इसके पास नहीं है। यह केवल एक अंतरसरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 1989 में जी-7 देशों की पहल पर मुख्य रूप से मनी लॉन्डरिंग गतिविधियों से निपटने के लिए समाधान प्रदान करने के लिए और इस तरह आतंकी गतिविधियों को वित्तीय मदद पर रोक लगाने के लिए किया गया। इसके बाद यह सदस्य देशों पर निर्भर करता है कि वे प्रतिबंधों को लागू करने के लिए अपनी प्रक्रियाओं और बैंकिंग व्यवस्था को सक्रिय करें।


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इस कार्रवाई का अनिवार्य उद्देश्य आतंकी समूहों के धन प्रवाह और मनी लॉन्डरिंग की गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। एफएटीएफ को उम्मीद है कि पाकिस्तान इस गतिविधि को रोकने के लिए मुफीद कदम उठाएगा। हाल ही में पाकिस्तान की एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 'कमजोर जांच प्रक्रियाओं के कारण 11 वित्तीय संस्थाओं पर 24.7 करोड़ रुपये और बायोमीट्रिक सत्यापन पूरा न करने के चलते विभिन्न बैंकों पर भी जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा, स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने सितंबर, 2019 में अपने निर्धारित नियमों और विनियमों के उल्लंघन के लिए तीन बैंकों पर 13.33 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। ये बैंक हैं मीजान बैंक, असकरी बैंक और एमसीबी इस्लामिक बैंक। एफएटीएफ की ग्रे सूची से निकाले जाने के उद्देश्य से पाकिस्तानी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के तहत इन बैंकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है।' लेकिन इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि इस प्रक्रिया के तहत जो धन आया, वह आतंकी संगठनों तक पहुंचा। जाहिर है, ये कदम दिखावे के लगते हैं, क्योंकि समस्या कहीं और है। नापाक आतंकी फंडिंग हवाला और काले धन के जरिये से होती है, न कि बैंकिंग सिस्टम के जरिये।

इसी तरह का दिखावा करते हुए पाकिस्तान सरकार ने लश्कर-ए तैयबा, उसके मातृ संगठन जमात उद दावा और शायद जैश-ए मोहम्मद व उसके समूहों जैसे एनजीओ पर सार्वजनिक प्रतिबंध लगाया है। लेकिन इन संगठनों का चयन इसलिए किया गया, क्योंकि वे लोगों की नजर में आ गए थे।

दूसरी तरफ यह पुष्ट खबर है कि बालाकोट में आतंकियों के लिए प्रशिक्षण शिविर फिर से शुरू हो गया है और पहले की तरह कार्य कर रहा है। हमें वास्तव में आतंकी संगठनों को दुरुस्त करने की पाकिस्तान सरकार की क्षमता को देखना चाहिए, खासकर तब, जब इनमें से कई समूहों को अर्धसैनिक बलों की तरह भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा वित्तपोषित किया जाता है।

पाकिस्तान की सत्ता पर सेना का भारी नियंत्रण है और वह हर तरह के नापाक कामों में अपनी ताकत का एहसास कराती है। जैसे जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ ऐसी गतिविधि है, जिसे भारत सरकार के प्रयासों के बावजूद बंद नहीं किया जा सका है। दूसरी तरफ हाल में ब्रिटिश राजघराने के सदस्य युवराज विलियम और राजकुमारी केट मिडल्टन पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे, उनकी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान को भारी सुरक्षा करनी पड़ी थी, जो कि पाकिस्तान में नियमित रूप से संभव नहीं है, लेकिन ऐसा उसने दुनिया को दिखाने के लिए किया। पता चला है कि ब्रिटिश सरकार अपने राजघराने के सदस्यों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह तरह आश्वस्त होना चाहती थी, क्योंकि ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के आतंकवादियों द्वारा किए गए हमले को वे अतीत में झेल चुके थे। ब्रिटेन एफएटीएफ का एक प्रभावी सदस्य है।

मुख्य बात यह है कि एफएटीएफ के सदस्य देशों का रवैया दोहरा रहा है। जब आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े देशों की ग्रे सूची और काली सूची की बात हो रही है, हम पाकिस्तान के खिलाफ प्रस्तावित कदमों के बारे में नहीं जानते कि इसे काली सूची में रखा जाएगा या नहीं। देखने वाली बात यह भी है कि कई देश और वैश्विक संस्थान पाकिस्तान की खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर सार्वजनिक तौर पर उसकी वित्तीय मदद का समर्थन कर रहे हैं। चीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, विश्व बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक तथा इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक ने उसे कर्ज भी दिया है। द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कर्जों का वितरण अगले दो वर्षों में होगा। गौरतलब है कि इन्हीं देशों और संस्थाओं ने एफएटीएफ का गठन किया है। दूसरी ओर हैरानी की बात है कि पाकिस्तान के रक्षा बजट के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है, जो वहां की सेना के इशारे पर काम करने वाले आतंकी समूहों और आतंकवादियों की फंडिंग का प्रमुख स्रोत है।

मौजूदा स्थिति में भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियां चलाने की क्षमता में कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है। प्रशिक्षित आतंकी समूहों को खत्म करने की न तो कोई संभावना है और न ही संकेत। भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान को एफएटीएफ को सभी उपलब्ध दस्तावेज, तस्वीर, तथ्य और आंकड़े मुहैया कराने चाहिए, ताकि सदस्य देश प्रभावी समाधान की तरफ बढ़ सकें। अमेरिका, फ्रांस जैसी बड़ी शक्तियों का इस्तेमाल करने के अलावा हम पाकिस्तानी सेना पर मजबूत अंकुश लगाने के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ मजबूत राजनयिक संबंध बढ़ा सकते हैं।

(लेखक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)

 

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