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विरोध का दमन करतीं शेख हसीना

Sun, 26 Aug 2018 06:00 PM IST
taslema nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Sun, 26 Aug 2018 06:00 PM IST
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Sheikh Hasina oppresses opposition
बांग्लादेश विरोध प्रदर्शन

बांग्लादेश के स्कूली छात्र देश बदल डालेंगे, ऐसी असंभव कल्पना मैंने नहीं की। ऐसी अद्भुत कल्पना भी मैंने नहीं की कि स्कूली छात्रों के अनुरोध पर बांग्लादेश में वाहन चालक बगैर लाइसेंस के गाड़ी नहीं चलाएंगे, मोटर साइकिल चालक हेलमेट लगाएंगे और यातायात के नियमों का सभी पालन करेंगे। दो-तीन दिन के ही भीतर स्कूली छात्रों ने ढाका की सड़कों पर जिस तरह के बदलाव को संभव कर दिखाया था, उसने सिर्फ मुझे नहीं, बहुतों को मुग्ध किया था। लेकिन किसी भी सफल आंदोलन के भीतर जिस तरह गलत लोग अपना राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने घुस जाते हैं, उसी तरह सुरक्षित सड़क के इस आंदोलन में भी गलत लोग घुस आए थे। उन स्कूली छात्रों को अभियान खत्म करने के तुरंत बाद घर चले जाना चाहिए था। लेकिन पुलिस और सशस्त्र स्कवॉड के लोग तब निहत्थे छात्रों के उस समूह पर टूट पड़े, जब सड़क से हटने के उनके अनुरोधों के बावजूद छात्र सड़क पर ही डटे रहे। पुलिस और सुरक्षा बलों ने आंदोलनरत छात्रों के साथ जो किया, वह घोर निंदनीय है।


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प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बांग्लादेश में मेरी किताबों पर प्रतिबंध लगाया। यहां तक कि उन्होंने मृत्युशय्या पर पड़े मेरे पिता के पास एक रात के लिए खड़े होने की अनुमति भी मुझे नहीं दी। उनके ही निर्देश पर दूतावास मेरे पासपोर्ट का नवीकरण नहीं करते। इसके बावजूद मैं शेख हसीना का समर्थन करती हूं, क्योंकि मेरे लिए गलत होने के बावजूद वह देश के लिए अच्छी हैं। उनकी विवेचना शक्ति, ताकत और विवेक के आधार पर मैं उन्हें अच्छी नहीं कहती, बल्कि विपक्षी दल के नेताओं-नेत्रियों के साथ उनकी तुलना के आधार पर कहती हूं। अब भी खालिदा जिया की बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी से तुलना करने पर शेख हसीना के अवामी लोग को ही मैं ज्यादा अंक दूंगी। इसे मैं बांग्लादेश का दुर्भाग्य ही कहूंगी कि वह आज तक अवामी लीग से बेहतर पार्टी और शेख हसीना से अच्छी नेता या नेत्री तैयार नहीं कर पाया। शेख हसीना आदर्श नेत्री नहीं हैं, न ही अवामी लीग कोई आदर्श पार्टी है। लेकिन वहां की विपक्षी पार्टियां इतनी दुर्नीतिपरक, इतने देशद्रोही और इस किस्म के जेहादी हैं कि मैं शेख हसीना का पक्ष लेने के लिए विवश हूं। बावजूद इसके कि मैं जानती हूं कि वह एक के बाद एक गलती किए जा रही हैं। बीच-बीच मैं उनके तानाशाही तौर-तरीके भी देखती हूं। लोकतंत्र, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-इन सबमें जैसे अब उनका विश्वास नहीं रहा। ऐसे में, शांतिकामी और लोकतंत्र के पक्षधर लोगों के बीच शेख हसीना की धवल छवि आज अगर धूमिल हो रही है, तो यह स्वाभाविक ही है। अगर वह अपनी छवि और लोकप्रियता वापस पाना चाहती हैं, तो उन्हें प्रमाणित करना होगा कि वह लोकतंत्र में विश्वास करती हैं और लोगों का भला करेंगी।

दरअसल बांग्लादेश में सड़क सुरक्षा के आंदोलन को कवर करने गए पत्रकारों में से तेईस पत्रकार हमले का शिकार हुए हैं। दुनिया भर में पत्रकारों के हक के लिए लड़ने वाले संगठन रिपोटर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) ने इस पर चिंता जताई है। ऐसे ही ह्यूमन राइट्स वॉच ने धारा 57 लगाए जाने की तीखी आलोचना की है। यह कानून बनाया ही इसलिए गया है, ताकि सत्ताधारी पार्टी या प्रधानमंत्री के खिलाफ बोलने वालों को दंडित किया जा सके। दुनिया भर में यह खबर फैल गई है कि बांग्लादेश के चर्चित प्रेस फोटोग्राफर शहिदुल आलम के खिलाफ धारा 57 के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन्हें गिरफ्तार करने के बाद जेल में उनकी पिटाई भी हुई है। शहिदुल आलम का अपराध यह था कि उन्होंने सुरक्षित सड़क के लिए शुरू हुए छात्र आंदोलन की तस्वीरें खींची थीं, और वहां उन्होंने जो कुछ देखा, उस बारे में अल जजीरा टीवी को बताया था। दरअसल शहिदुल आलम ने छात्रों का पक्ष लेते हुए सरकार की तीखी आलोचना की थी। शहिदुल आलम ने किसी की हत्या नहीं की, सिर्फ अपने घर में बैठकर एक टीवी चैनल के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने सरकार के खिलाफ बात की, लेकिन एक लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ बोलने भर से कार्रवाई क्यों होनी चाहिए? अगर शहिदुल आलम झूठ बोल रहे थे, तो सरकार आसानी से उसे साबित कर सकती थी। पर इसके बजाय उसने दंड देने का रास्ता चुना।

मैं सोचती हूं, खुद पर आस्था हटने से ही कोई सरकार इस स्थिति में पहुंचती है कि उसे स्कूली छात्रों से डर लगने लगता है, उसे प्रेस फोटोग्राफर से डर लगने लगता है, उसे अपनी आलोचना से डर लगने लगता है। नाकारा विपक्ष सत्ता में होने पर जिन चीजों से डरता, उन्हीं चीजों से डरना बंगबंधु की बेटी शेख हसीना को शोभा नहीं देता। यह भी सच है कि जो डरता है, लोग उसे ही डराते हैं। महान व्यक्तियों में अपनी आलोचना सहने की ताकत होनी चाहिए। और महान व्यक्ति हुए बिना कोई महान राजनेता नहीं हो सकता। विकसित देशों के राजनेताओं को मैंने मामूली बातों पर इस्तीफा देते देखा है। लेकिन तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में सत्ताधारी नेता किसी भी तरीके से सत्ता पर बने रहना चाहते हैं।

बांग्लादेश के आगामी चुनाव में अगर बीएनपी जीतती है, तो उसका मतलब है तारिक जिया (खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष) जैसे भ्रष्ट व्यक्तियों के हाथों देश की बर्बादी। जमात-ए इस्लामी के सत्ता में आने पर बांग्लादेश का अफगानिस्तान बनना तय है। ऐसे ही जो दल शेख हसीना और खालिदा जिया को अलग करके गठबंधन सरकार बनाने के बारे में सोच रहे हैं, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अगर शेख हसीना अपनी गलतियां सुधार कर देश की सेवा करती रहें, तो वह सबसे अच्छा होगा।  इसके विपरीत, देश भर में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देते हुए, उदार चिंतकों को निशाना बनाते हुए और अपने आलोचकों को दंडित करते हुए वह जीतती भी हैं, तो उस जीत का कोई महत्व नहीं होगा। उससे अवामी लीग को भले ही लाभ हो, लेकिन बांग्लादेश को कोई फायदा नहीं होगा।

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