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एक लम्हा अफसोस से तर

Mon, 25 May 2020 12:41 AM IST
Shashank Dubey शशांक दुबे
Updated Mon, 25 May 2020 12:41 AM IST
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shashank dubey editorial, A moment of regret
lockdown - फोटो : amar ujala

हे किशन काका, क्या हमें माफ करोगे? लॉकडाउन के लंबे दौर ने वर्षों बाद फिर हमें तुम्हारी ममता की याद दिला दी है। हम तो इतने वर्षों तक तुम्हारी दुकान पर छठे-छमासे कभी-कभी जरूरी चीज के लिए पहुंच जाते थे। लेकिन तुमने हमें याद रखा और जरूरत के समय हमारे काम भी आए। हमें याद है, बचपन में कैसे दौड़कर तुम्हारी किराने की दुकान से हम पांच पैसे की पांच गोलियां ले आते थे। तब चाहे हमारी मुट्ठी में सिक्का कैद हो या न हो, तुम अपनी मुट्ठी खोल कर संतरे की खट्टी-मीठी रसीली गोलियां हमारी हथेली पर रख दिया करते थे।


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जब हम बड़े हुए, तो तुम्हें पर्ची और थैला थमाकर बेफिक्र होने लगे। जब हमारी बेटियां दौड़ने लगीं, तो वे भी तुमसे इमली की गोलियां और मेहंदी का कोन लाने लगीं। हमारी पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन तुम्हारा व्यवहार नहीं बदला। तुमने न तो दुकान पर ‘आज नकद, कल उधार’ की कोई तख्ती टांगी और न ही हमसे कभी पैसों का तकाजा ही किया। हमने जब-जब अपना बटुआ निकाला, तुम्हारे मुंह से एक ही वाक्य निकला, ‘पैसों की इतनी भी जल्दी क्या थी? वे तो कभी भी आ जाते!’ लेकिन इधर शहर में मॉल का ऐसा जलजला आया कि अब हमें हल्दी और तेल से सने कपड़े, जो तुम्हारी कर्मठता के आभूषण थे, चुभने लगे।

तुम्हारी पोपली मुस्कान हममें टुच्ची खिल्ली पैदा करने लगी और इसका नतीजा यह हुआ कि हम हर महीने के पहले इतवार को कुछ सजे-संवरे चेहरों, कुछ बनावटी मुस्कानों के फेर में गज भर लंबी ट्रॉली ठेलते हुए सामान के ढेर की परकम्मा करते हुए कुछ जरूरी और कई गैर-जरूरी सामान ठूंसने लगे। पता नहीं काका, उन मॉल में कौन-सा काला जादू था कि भुगतान करने के लिए घंटे भर लाइन में लगे रहना, गलत सामान आने पर बदलवाने के लिए उनके संतरियों और मैनेजर के सामने गिड़गिड़ाना और थैलियों के बोझ से हाथों में छाले पड़ जाना, यह सब हमें अच्छा लगने लगा।

आज एक घटना मुझे गहरी ग्लानि से भर देती है। हुआ यह कि एक दिन सुबह बेटियों को अचानक सैंडविच की तलब लगी और तब हम अनमने से तुम्हारी दुकान पर ब्रेड लेने के लिए पहुंच गए। उस दिन रेजगारी वापस करते हुए तुमने मुझसे कहा तो कुछ न था, लेकिन हमारे दिल ने यही सुना था कि कोई जैसे आर्द स्वर में फुसफुसाते हुए मुझसे कह रहा है, 'क्या अब हम ब्रेड, बटर और मोमबत्ती के लिए ही रह गए हैं।'

तब तुम्हारी पीड़ा से हमारे भीतर का भी कहीं कोई कोना नम हुआ था, लेकिन अखबार के साथ आने वाले रंग-बिरंगे पेम्फलेट हमें भरमाते रहे और हम जाने-अनजाने तुम्हारी दुनिया से दूर होते चले गए। एक तुम ही क्या, जिस रमेश भैया से हम फल लिया करते थे, उनसे भी तो हमने निगाहें फेर ली थीं। अपने कंधे पर डली साफी के एक कोने से वे बार-बार सेब, अनार और संतरों को चमकाते रहे और हम खिसियाते हुए दस रुपये के तीन केले लेकर वापस आते रहे। हमने तो सब्जी वाले सुरेश की भी उपेक्षा ही की।

उसका ठेला हरी-भरी, रंग-बिरंगी सब्जियों से भरा होता था और हम इमर्जेंसी में उनसे हरा धनिया लेकर घर चले आते थे। आज जब तुमने हमारे एक ही फोन पर दो किलो चावल, दो किलो दाल और पांच किलो आटा हमारे घर में पहुंचा दिया, तो मारे शर्म और अपराध के हम दो गज जमीन के नीचे धंसते जा रहे हैं। सचमुच इन वर्षों में हमने तुम्हारी मुट्ठियों में कैद उन गोलियों की मिठास की नाकदरी ही की है।

क्या इसके लिए तुम हमें माफ करोगे? यदि तुम हमें माफ कर दो, तो हमारा हौसला बढ़े और हम कुछ और माफियां मांगने की हिम्मत भी जुटा सकें। मुझे तो अब रमेश भैया से और सुरेश से भी माफी मांगनी है। माफी उन डॉक्टरों से भी मांगनी है, जिन्हें हमने कभी कॉरपोरेट अस्पतालों का एजेंट कहा था। उन पुलिस वालों से भी हमें माफी मांगनी है, जिन्हें फिल्मों में नायक से पिटते देख हमने तालियां बजाई थीं। हमें माफी भी मांगनी है और कोरोना को धन्यवाद भी देना है, कम से कम इसने हमारी संवेदना के तार तो हिला दिए!

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