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मोदी जी, अच्छे दिनों के वायदों का क्या हुआ?
शंकर अय्यर
Updated Sun, 01 Mar 2015 09:42 AM IST
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भारी-भरकम सुधारों के पैरोकारों और 2014 के लोकसभा चुनाव में किए गए अपने निवेश के लाभांश की अपेक्षा कर रहे मध्य वर्ग को शनिवार को एक अहम सबक मिला है। वह यह कि राजनीतिक बहुमत से उपजी आकांक्षाएं जरूरी नहीं कि यथार्थ में परिवर्तित हों। जबकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से सरकार को इससे अच्छा अवसर मिल भी नहीं सकता था। इस सरकार के पास न केवल पूर्ण बहुमत है, बल्कि अगले आठ महीने तक कोई चुनाव भी नजदीक नहीं है। वैश्विक आर्थिक परिदृश्य इससे अनुकूल नहीं हो सकता। कच्चे तेल की कीमतें तलहटी पर हैं, उपभोक्ता सामानों की कीमतें नीचे हैं और वैश्विक खाद्य कीमतें भी अपेक्षाकृत कम हैं।
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ऐसे परिदृश्य में 2015-16 के बजट में कुछ कोशिशें दिखी हैं। इसमें घाटे को अगले तीन वर्ष में जीडीपी के तीन फीसदी से नीचे लाने के साथ वित्तीय मजबूती की प्रतिबद्धता दिखती है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए। गरीबों और वंचितों को ग्रुप इंश्योरेंस का लाभ देने की पहल की गई है, लेकिन यह इस पर भी निर्भर करेगा कि इसे कितने प्रभावी तरीके से अमल में लाया जाता है। इसके साथ ही रेल, सड़क और आधारभूत ढांचे में निवेश का दायरा बढ़ाने के प्रयास भी किए गए हैं। भारतीय डाक विभाग को वित्तीय समायोजन से जोड़ने, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के लिए आधार को मंजूरी और राष्ट्रीय कृषि बाजार के निर्माण जैसी अनूठी पहल भी की गई हैं, जिनके बारे में मेरी शुरू से राय रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसे कदमों की जरूरत है।
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भारतीय और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों को लुभाने की कोशिश भी वित्त मंत्री ने की है। मसलन, कॉरपोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटाकर अगले चार वर्ष में 25 फीसदी करने और विवादास्पद कर छूटों को खत्म करने की पहल की गई है। रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लागू नहीं करने की वित्त मंत्री ने प्रतिबद्धता दोहराई है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और संस्थागत विदेशी निवेश के बीच अंतर खत्म करने की बात भी उन्होंने की है। इसी तरह जीएएआर को भी दो वर्ष के लिए टाल दिया गया है, जीएसटी पर अगले वर्ष कुछ फैसला होगा। प्रत्यक्ष कर संहिता, मंजूरी के लिए एक नियामक प्राधिकरण के गठन के वास्ते एक विधेयक लाए जाने से लेकर भूमि, बीमा और खनन से संबंधित अध्यादेशों को पारित करवाने की उम्मीद भी जताई गई है।
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मगर बजट में की गई अधिकांश घोषणाएं अमल के मामले में किंतु-परंतु और व्यवस्थागत सुस्ती में फंसी लगती हैं। वित्त मंत्री का 11,234 शब्दों का बजट भाषण घोषणाओं से तो भरा हुआ है, लेकिन समयसीमा और कार्ययोजना के मामले में आश्वस्त नहीं करता। सरकार के खर्च को ही लीजिए। मसलन सरकार को अपने साधनों से आगे जाकर पिछले वर्ष से अधिक कर्ज लेना होगा। वर्ष 2015-16 में कर्ज का बोझ छह लाख करोड़ रुपये यानी 1643 करोड़ रोजाना होगा। इसमें से तीन चौथाई हिस्सा यानी 456145 करोड़ रुपये ब्याज अदा करने में निकल जाएगा। दरअसल वित्तीय मजबूती के लिए मुद्रा प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है। पूछा जा सकता है कि आखिर खर्च प्रबंधन आयोग का क्या हुआ? खर्च में सुधार क्यों अटके हैं? सब्सिडी को ही लीजिए। भारत सरकार रोजाना 667 करोड़ रुपये या 27 करोड़ रुपये प्रति घंटे सब्सिडी पर खर्च करती रहेगी। इसका बड़ा हिस्सा राजनीतिक हितों को साधने से जुड़ा है। यही नहीं, बजट में चोरी और लीकेज को रोकने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का दायरा बढ़ाने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।
सरकार की सबसे बड़ी उम्मीद विकास के पटरी पर लौटने से जुड़ी है। मेक इन इंडिया पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा कर ढांचे में सुधार, परमिशन राज और इंस्पेक्टर राज के खात्मे, बिजली की उच्च कीमतों में संतुलन और अनावश्यक लागत बढ़ाने वाली अड़चनों को खत्म करने की मांग करती हैं। बजट में नई बिजली परियोजना की बात की गई है, लेकिन ठप पड़ी उन बिजली परियोजनाओं का क्या हुआ है, जिनमें दो लाख करोड़ से अधिक का निवेश अटका हुआ है? सरकार बिजली उत्पादन को कैसे बढ़ावा देगी, जब दीवालिया हो चुके राज्य बिजली बोर्डों को पुनर्जीवित करने का कोई ठोस समाधान नहीं दिखता।
बजट में बड़े परिवर्तन से जुड़ी आकांक्षाओं को पूरा करने की दृष्टि नहीं दिखती। बेशक, वेतनभोगी वर्ग को रियायतों की उम्मीद रही होगी, लेकिन इससे कहीं अधिक उम्मीद 'अधिकतम शासन ' से जुड़े वायदे को गति देने से जुड़ी थी। निश्चय ही, सुधार कोई एक घटना न होकर सतत प्रक्रिया है। मगर, यह भी सच है कि 28 फरवरी बड़े परिवर्तन के लिए प्रस्थान बिंदु हो सकता था।
भारत की 60 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम की है। भारत की तकरीबन आधी युवा आबादी का जन्म 1991 के सुधारों के आसपास हुआ था। यह आबादी उस समय किए गए वायदों को पूरा होते देखना चाहती है। 1991 से अब तक पेश किए जा चुके 25 बजटों के बारे में लिखते हुए हर बार मैंने महसूस किया मानो यह भारत में सुधार के गीत की पुनरावृत्ति हो। इनमें भारत की क्षमता के बारे में कई-कई पन्ने रंगे होते हैं, संसाधनों का रोना होता, खेती की बदहाली, विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की कमी, बिजली सुधार, लागत में कटौती, दीर्घकालीन वित्त की जरूरत, कर-जीडीपी अनुपात को बेहतर करने की मंशा, आधारभूत ढांचे के निर्माण की आवश्यकता, रोजगार पैदा करने की जरूरत और लीकेज और चोरी से हुए नुक्सान का दर्द समाहित होता है। भारत की कहानी यथास्थिति का शिकार लगती है। इसे बदलने की जरूरत है। मोदी सरकार को अपनी राजनीतिक पूंजी से आर्थिक लाभांश हासिल करने के रास्ते तलाशने चाहिए।