शाकिब की हार बांग्लादेश की हार, तस्लीमा नसरीन के सुलगते सवाल
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बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता किस चरम पर है, इसका ताजा उदाहरण वहां के चर्चित क्रिकेटर और पूर्व कप्तान शाकिब अल हसन द्वारा कट्टरवादियों से माफी मांगने की घटना से समझा सकता है। दरअसल शाकिब पिछले महीने कोलकाता में थे, जहां उन्होंने कालीपूजा के एक पंडाल का उद्घाटन किया था। इसकी जानकारी होने पर बांग्लादेश के सिलहट के एक व्यक्ति ने फेसबुक पर उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी थी। हाल ही में मैंने शाकिब के दो वीडियो देखे। इनमें से एक वीडियो उनके द्वारा माफी मांगने का है, तो दूसरा उन्हें जान से मार डालने की धमकी देने का। शाकिब नास्तिक नहीं हैं, धार्मिक आस्थाओं में उनका पूरा भरोसा है। शाकिब हिंदू, बौद्ध, ईसाई या यहूदी नहीं, बल्कि गर्व बोध से भरे एक मुसलमान हैं, और हज भी करके आए हैं। तो फिर उन्हें क्यों निशाना बनाया गया?
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यदि आज कोई शाकिब को धमकी देते हुए कहे कि क्रिकेट खेलना न छोड़ने पर उनका कत्ल कर दिया जाएगा, तो क्या वह क्रिकेट छोड़ देंगे? कतई नहीं। यदि किसी मंत्री को मंत्री पद छोड़ देने की, राजनेता को राजनीति छोड़ देने की, कारोबारी और नौकरीपेशा को व्यापार और नौकरी छोड़ देने की धमकियां दी जाएं, तो क्या लोग धमकियों से डरकर ये सब छोड़ देंगे। नहीं। लेकिन कोई अगर कहे कि तुमने मेरी धार्मिक आस्था पर चोट की है, तुम्हारी खैर नहीं, तो लोग घबराकर माफी मांगने से लेकर वह सब कुछ करने को तैयार हो जाएंगे, जिसकी मांग की जाए। यह हैरान करने वाला है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि बांग्लादेश में अचानक धार्मिक आस्था इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि दूसरे सारे मुद्दे गौण हो गए हैं। धार्मिक आस्था पर आघात लगने की बात कहते हुए वहां किसी की भी नृशंस तरीके से हत्या की जा सकती है। पिछले कुछेक साल में हमने बांग्लादेश में ऐसी अनेक हत्याएं देखी हैं।
कितने ही प्रतिभाशाली और उदार चिंतकों के खून से वहां का राजपथ लाल हो चुका है। इन हत्याओं के बाद देश के कर्ताधर्ताओं ने कट्टरवादियों पर उंगली उठाने के बजाय उल्टे उदार चिंतकों पर ही दोष मढ़ दिया कि उन्हें ऐसा कुछ कहने-लिखने की जरूरत ही क्या थी, उन्होंने लोगों की धार्मिक भावना को चोट ही क्यों पहुंचाई? इसी से तो उनको निशाना बनाया गया। यानी प्रकारांतर से सत्ता व्यवस्था कट्टरवाद को मान्यता ही देती है। उदार इस्लाम आज कहां है? असलियत यह है कि बांग्लादेश में उदार इस्लाम आज धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है। इसी कारण वहां सूफी धर्मावलंबियों और बाउल फकीरों को धमकियां दी जाती हैं, उन्हें निशाना बनाया जाता है। उदार इस्लाम को हटाकर वहां सलाफियों के कट्टर इस्लाम को महत्व दिया जाने लगा है। यह वही इस्लाम है, जिस पर आईएस, अल कायदा, अल शवाब, बोको हराम जैसे आतंकवादी संगठन भरोसा करते हैं।
इसी बांग्लादेश में मोहसिन तालुकदार नाम के व्यक्ति को किन लोगों ने जिहादी बनाया, यह खुद उसकी स्वीकारोक्ति से स्पष्ट है। उसने इस संबंध में वाज सुनाने वाले (वे लोग जो रात-रात भर महफिलों में इस्लामी शिक्षा देते हैं) दो हुजूरों का जिक्र किया है। वाज सुनाने वाले ये हूजूर, जो कि इस्लामी देशों में सिर्फ बांग्लादेश में ही दिखते हैं, जगह-जगह जाकर लोगों को आक्रामकता और असहिष्णुता की ही शिक्षा दे रहे हैं। इन्हें वहां की सरकार का भी पूरा समर्थन और सहयोग है। इससे साफ हो जाना चाहिए कि बांग्लादेश में किस तरह मोहसिन तालुकदार जैसे कट्टरवादी तैयार किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि उस देश में शाकिब अल हसन जैसे एक सच्चे मुसलमान को कट्टरवादियों से माफी मांगनी पड़ती है। सहसा विश्वास नहीं होता कि यह वही बांग्लादेश है, जिसका जन्म लाखों लोगों के बलिदान के बाद धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर हुआ था। उसी बांग्लादेश में आज मोहसिन तालुकदार जैसे लोग कहते हैं कि धार्मिक भावना को चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति को निशाना बनाते हुए अगर मैं मर भी गया, तो उसका दुख नहीं होगा। धर्म को बचाने के लिए जान दे देने पर उसे जन्नत नसीब होगी, यह बात उस जैसे लोगों को जैसे घुट्टी में पिला दी गई है।
एक मोहसिन तालुकदार को शिकंजे में भले कस लिया गया हो, लेकिन बांग्लादेश के गांवों, कस्बों और शहरों में असंख्य मोहसिन तालुकदार जिस तरह पैदा किए जा रहे हैं, उन्हें भला कैसे रोकेंगे? यह देखकर दुख होता है कि बांग्लादेश ने शिशुओं, किशोरों और युवाओं को वास्तविक शिक्षा से वंचित कर रखा है। वहां की नई पीढ़ी लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के बारे में किसी तरह की सोच के बगैर ही बड़ी हो रही है। अगर बांग्लादेश के लोग इन सब पर विश्वास करते, इनका पालन करते, तो आज शाकिब अल हसन को जिहादियों के सामने अपना सिर झुकाना नहीं पड़ता। वह जिहादियों से यह नहीं कह पाए कि वह कहां जाएंगे और क्या करेंगे, यह उनका व्यक्तिगत मामला है। लोगों के पास यह आजादी ही न हो, तो फिर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता। स्वतंत्रता लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है, और इस अर्थ में शाकिब की हार दरअसल बांग्लादेश की हार है।
सबको पता है कि बांग्लादेश की इस परिणति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है। अपनी सत्ता को दीर्घस्थायी करने के लिए ही सत्तासीन लोग उग्रवादियों और कट्टवादियों की मदद करते आए हैं। कट्टरवाद को प्रश्रय देकर ये लोग निरंतर लोकतंत्र की कब्र खोद रहे हैं। उनकी दूरदृष्टिहीन नीतियों के कारण ही बांग्लादेश आज जिहादी कट्टरवादियों के शिकंजे में है। अगर अब भी नहीं सुधरे, तो बचे-खुचे लोकतंत्र के खत्म हो जाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें अब अपनी गलती सुधारनी होगी। जिन्होंने कथित धर्मगुरुओं को युवा मस्तिष्कों में जिहाद के बीज बोने की हरी झंडी दी, उन्हें अब जिहाद के बजाय युवा पीढ़ी को वास्तविक शिक्षा से शिक्षित करने के लिए कदम उठाने होंगे। तभी हम यह उम्मीद कर सकेंगे कि भविष्य में शाकिब अल हसन जैसे किसी और व्यक्ति को, किसी आस्तिक या नास्तिक को, हिंदू या मुसलमान को, अपने किए के लिए कठघरे में खड़ा नहीं होना पड़ेगा।