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जानना जरूरी है: शालिग्राम के स्पर्श से भस्म हुए पाप, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी जानकारी
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विस्तार
पूर्वकाल की बात है, मगध देश में शबर नाम का एक व्याध (शिकारी) रहता था। वह बड़ा दुष्ट और कुकर्मी था। जीव-जंतुओं की हत्या करना और कपट से दूसरों का धन लूटना ही उसका एकमात्र काम था। उसमें राग-द्वेष, काम-क्रोधादि दोष प्रचुर मात्रा में भरे हुए थे। एक दिन शबर कहीं घूमने निकाला। अपने स्वभावानुसार, वह मार्ग में प्राणियों को सताता हुआ चल रहा था। परंतु उसे यह पता नहीं था कि उसका काल समीप आ पहुंचा है।
अचानक यमराज के दूत अपना पाश लेकर शबर के पास पहुंच गए। उन्हें देखकर शबर घबरा गया। यमदूतों ने कहा ‘संपूर्ण जीवों को भय पहुंचाने वाले इस दुष्ट पापी को बांध लो। इसने कभी कोई शुभ कर्म नहीं किया, इसलिए यह रौरव नरक में जाएगा।’ यह कहकर यमदूतों ने शबर को ले जाने के उद्देश्य से उसके गले में पाश डालकर उसे बांध लिया। वे ज्यों ही शबर को ले जाने लगे, त्यों ही विष्णु के एक भक्त महात्मा वहां आ पहुंचे। महात्मा बड़े दयालु थे। उन्होंने शबर की अवस्था देखी, तो उनका हृदय करुणा से भर गया। महात्मा हाथ में शालिग्राम शिला लेकर शबर के निकट गए और उन्होंने शालिग्राम का पवित्र चरणामृत, जिसमें तुलसी-दल भी मिला था, शबर के मुख में डाल दिया। फिर उन्होंने उसके कान में राम नाम का जप किया, मस्तक पर तुलसी रखी और छाती पर महाविष्णु की शालिग्राम शिला रखकर कहा, ‘यातना देने वाले यमदूत यहां से चले जाएं। शालिग्राम शिला के स्पर्श ने शबर के पापों को भस्म कर दिया है।’
इसके बाद भगवान विष्णु के पार्षद, शबर के निकट आ पहुंचे। शालिग्राम के स्पर्श से उसके सब पाप नष्ट हो गए। विष्णु के पार्षदों ने तत्काल शबर को यमदूतों के बंधन से मुक्त कर दिया।
पार्षद यमदूतों से बोले, ‘तुम लोग किसकी आज्ञा से यह अधर्म कर रहे हो? यह शबर वैष्णव है, इसने पूजनीय देह धारण कर रखी है, फिर किसलिए तुमने इसे बंधन में डाला था?’ पार्षद की बात सुनकर यमदूत बोले, ‘यह पापी है और हम धर्मराज की आज्ञा से इसे ले जाने के लिए आए हैं। इसने कभी मन से किसी प्राणी का उपकार नहीं किया। इसने जीव-हिंसा जैसे बड़े-बड़े पाप किए हैं। इसने तीर्थ-यात्रियों तक को लूटा है। यह सदा पराई स्त्रियों का सतीत्व नष्ट करता था। इसने अनेक घोर पाप किए हैं। अतः हम इसे ले जाने आए हैं। आपने इसे बंधन-मुक्त क्यों कर दिया?’ विष्णु के दूत बोले, ‘यमदूतो! ब्रह्महत्या आदि का पाप हो या करोड़ों प्राणियों के वध करने का, शालिग्राम शिला का स्पर्श सब पापों को क्षण भर में भस्म कर डालता है। जिसके कानों में अकस्मात भी राम नाम पड़ जाता है, उसके सारे पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं, जैसे चिंगारी से रुई जलकर भस्म हो जाती है। जिसके मस्तक पर तुलसी, छाती पर शालिग्राम की शिला तथा मुख या कान में राम नाम हो, वह सब बंधनों से मुक्त हो जाता है। शबर के मस्तक पर भी तुलसी रखी हुई है, इसकी छाती पर शालिग्राम की शिला है तथा हमने अभी इसको श्रीराम का नाम सुनाया है; अतः इसके भी पाप दग्ध हो गए हैं और अब इसका शरीर पवित्र हो चुका है। तुम लोगों को शालिग्राम शिला की महिमा का ज्ञान नहीं है। यह दर्शन, स्पर्श अथवा पूजन करने पर तत्काल ही सारे पापों को हर लेती है।’ इतना कहकर भगवान विष्णु के दूत मुस्कराने लगे और यमदूत वहां से चुपचाप लौट गए।
यमदूतों ने लौटकर यह घटना यमराज को सुनाई। उधर, श्रीविष्णु के भजन में लीन रहने वाले वे वैष्णव महात्मा भी यह सोचकर कि ‘यह शबर यमराज के पाश से मुक्त हो गया और अब परमपद को प्राप्त होगा’, बहुत प्रसन्न हुए। तभी शबर को ले जाने के लिए देवलोक से बड़ा ही मनोहर, अद्भुत और उज्ज्वल विमान आया। शबर उस विमान पर सवार होकर स्वर्गलोक को चला गया। स्वर्गलोक में शबर ने अनेक प्रकार के भोगों का उपभोग किया और फिर उसका धरती पर जन्म हुआ। शबर, धरती पर काशीपुरी में एक शुद्ध ब्राह्मण वंश में जन्म लेकर विश्वनाथ की आराधना करने लगा। शबर घोर पापी था, फिर भी साधु-संगत के प्रभाव से, शालिग्राम की शिला का स्पर्श पाकर वह यमदूतों की भयंकर पीड़ा और रौरव नरक के कष्ट से मुक्त हो गया और अंत में उसने परमपद भी प्राप्त कर लिया।