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भारतीय राजनीति की सात जुगलबंदियां: देश की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों पर दिखा इनका गहरा असर

Sun, 17 May 2026 08:58 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 17 May 2026 08:58 AM IST
सार

आजादी के बाद देश में सात राजनीतिक जोड़ियां हुई हैं, जिन्होंने देश की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों पर असर डाला है। इनके कार्यकाल का लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

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Seven Duos of Indian Politics Their Profound Impact on  Geographical Economic and Social Landscape of Country
भारतीय राजनीति में कई जोड़ियों का रहा प्रभाव - फोटो : एएनआई

विस्तार

बंगलूरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में मैं छह अगस्त, 2019 को अपने कुछ सहकर्मियों के साथ कॉफी पी रहा था। हम एक दिन पहले कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर चर्चा कर रहे थे। इस बीच एक युवा कंप्यूटर वैज्ञानिक ने टिप्पणी की—“अब हमारे सामने मोदी 2.0 नहीं, बल्कि शाह 1.0 है।” यह टिप्पणी इसलिए आई, क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने ही भारत के एकमात्र मुस्लिम-बहुल राज्य का विशेष दर्जा समाप्त करने की योजना बनाई और उसे लागू किया। शायद इसे पूरी तरह “शाह 1.0” कहना अतिशयोक्ति हो, लेकिन अब इसमें संदेह नहीं है कि अमित शाह सरकार में प्रधानमंत्री के बाद सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं और वही ऐसे मंत्री हैं, जिनके पास वास्तविक अधिकार और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है।

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मोदी-शाह की यह राजनीतिक जुगलबंदी भारतीय राजनीति में पहली नहीं है। आजाद भारत के शुरुआती वर्षों में जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल की साझेदारी इसका एक बड़ा उदाहरण थी। आज की राजनीति उन्हें प्रतिद्वंद्वी और विरोधी के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि वास्तव में वे मित्र, सहयोगी और सहकर्मी थे।
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विभाजन की त्रासदी, अभाव, संघर्ष और सामाजिक विभाजन के बीच यदि एक संयुक्त और लोकतांत्रिक भारत का निर्माण संभव हो पाया, तो उसका बड़ा कारण नेहरू और पटेल की जुगलबंदी है। पटेल ने भारत को भौगोलिक रूप से एकजुट करने में प्रमुख भूमिका निभाई-उन्होंने रियासतों का विलय कराया, प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक बनाया, हिंदू दक्षिणपंथ और कम्युनिस्ट वामपंथ के उग्र तत्वों को नियंत्रित किया, साथ ही संविधान निर्माण की प्रक्रिया का समर्थन करने का माहौल बनाया, जिसका नेतृत्व डॉ. भीमराव आंबेडकर कर रहे थे।
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दूसरी ओर, नेहरू ने भारत को भावनात्मक रूप से एकजुट करने का कार्य किया। उन्होंने धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के समान अधिकारों की वकालत की और भारी अभिजात्य विरोध के बावजूद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का दृढ़ समर्थन किया।

निश्चित रूप से नेहरू और पटेल के बीच मतभेद भी थे, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए उन मतभेदों को पीछे छोड़ दिया। यह भी सच है कि उन्हें आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली मंत्रियों और सक्षम नौकरशाहों का सहयोग मिला। फिर भी इतिहासकारों ने प्रमाण सहित दिखाया है कि बिखरे हुए भारत को एक राष्ट्र के रूप में गढ़ने में उनकी साझेदारी की निर्णायक भूमिका थी।

दिसंबर, 1950 में पटेल की मृत्यु और अगले साल आंबेडकर के इस्तीफे के बाद नेहरू मंत्रिमंडल में सबसे प्रभावशाली नेता बन गए, जो शायद पूरी तरह लाभदायक नहीं था। भारतीय राजनीति में अगली बड़ी ‘जोड़ी’ 1960 के दशक के आखिर में उभरी, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्व राजनयिक पीएन हक्सर को अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया।

हक्सर जल्द ही इंदिरा गांधी के मंत्रियों से अधिक प्रभावशाली बन गए। 1970 से 1975 के बीच वे उनके सबसे विश्वसनीय सहयोगी और प्रमुख सलाहकार रहे। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम जैसी इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता की योजना बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। साथ ही कृषि और अंतरिक्ष जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा देने में भी उनका योगदान रहा।लेकिन इसका एक नकारात्मक पक्ष भी था। इंदिरा गांधी की केंद्रीकरण और सरकारी नियंत्रण पर आधारित आर्थिक नीतियों को तैयार करने में भी हक्सर की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसने आगे चलकर देश को नुकसान पहुंचाया।

1975 में पीएन हक्सर को किनारे कर दिया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी ने ले ली। इंदिरा गांधी और संजय गांधी की यह साझेदारी देश को निरंकुशता की ओर ले जाने के लिए जिम्मेदार थी। नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन, प्रेस पर सेंसरशिप, न्यायपालिका को नियंत्रण में करना, नौकरशाही और पुलिस को मां-बेटे के अधीन बना देना तथा सभी राजनीतिक विरोधियों को जेल में डालना-ये सब उसी दौर की विशेषताएं थीं और इंदिरा गांधी-हक्सर की साझेदारी के विपरीत, इस गठजोड़ में कोई सकारात्मक पक्ष नहीं था।

इसके बाद सरकार में जो अगली महत्वपूर्ण साझेदारी उभरी, वह थी पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की। 1991 से 1996 के बीच प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में दोनों ने मिलकर देश को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों ने तीन दशकों तक स्थिर आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे गरीबी में कमी आई, एक बड़े मध्यम वर्ग का उदय हुआ और दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी।

इसके बाद अटल बिहारी वाजपेई और आड़वाणी की साझेदारी सामने आई। 1980 और 1990 के दशकों में दोनों ने मिलकर भाजपा को कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा किया। 1998 से 2004 के बीच जब भाजपा सत्ता में रही, तब वाजपेयी प्रधानमंत्री और आडवाणी गृह मंत्री थे। उन्होंने राव और मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक उदारीकरण के रास्ते को आगे बढ़ाया, जिसमें यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह जैसे योग्य मंत्रियों का भी योगदान रहा।

क्योंकि उनकी सरकार कई दलों के गठबंधन पर आधारित थी, इसलिए संघ परिवार की बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों को पूरी तरह खुलकर काम करने का अवसर नहीं मिला। 2004 में भाजपा अप्रत्याशित रूप से सत्ता से बाहर हो गई। अगले दस वर्षों तक देश पर कांग्रेस-प्रधान बहुदलीय गठबंधन ने शासन किया। एक बार फिर दो व्यक्तियों के हाथ में सबसे अधिक शक्ति थी-प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी।

मनमोहन सिंह के नेतृत्व में देश की आर्थिक प्रगति प्रभावशाली बनी रही, वहीं सोनिया गांधी और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के मार्गदर्शन में गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र खड़ा करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए गए, लेकिन इस साझेदारी की उपलब्धियां इस वजह से फीकी पड़ गईं कि सत्ता की चाबी किसके पास है। शक्ति होनी प्रधानमंत्री के पास चाहिए थी, लेकिन स्वभाव से संकोची और जोखिम से बचने वाले मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी को उन विषयों में भी अत्यधिक हस्तक्षेप करने दिया, जो केवल उनके अधिकार क्षेत्र में आने चाहिए थे, जैसे शिक्षा नीति।


मोदी-शाह की जुगलबंदी में आर्थिक प्रगति धीमी हुई है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलता की भारतीय परंपरा पर लगातार हमले भी उनके कार्यकाल में हुए हैं। लेकिन इस लेख में जिन सात जुगलबंदियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें अंक देने या क्रमबद्ध करने से बचना चाहता हूं। फिर भी नेहरू और पटेल की जोड़ी को श्रेष्ठ और रचनात्मक मानता हूं। मैं इंदिरा गांधी-संजय गांधी और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी को देश हित में नहीं देखता हूं।

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