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सात दशकों की दोस्ती

Mon, 20 Aug 2018 06:37 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Mon, 20 Aug 2018 06:37 PM IST
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Seven-decade friendship
मोदी और ट्रंप

चूंकि भारत-अमेरिकी रिश्ते के सत्तर साल हो चुके हैं, इसलिए इस दोस्ती पर एक तटस्थ नजर डालने की जरूरत है। 140 अरब अमेरिकी डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार (अमेरिकी व्यापार घाटा 30 अरब डॉलर का है, लेकिन पिछले छह वर्षों में उसने भारत को 16 अरब डॉलर का रक्षा उत्पाद बेचा है।); 300 से ज्यादा संयुक्त सैन्य अभ्यास और सहयोग के कई क्षेत्रों को मिलाकर 37 से अधिक मिशन के साथ, जिसमें अंतरिक्ष से लेकर मानसून की भविष्यवाणी और कृषि से लेकर शिक्षा तक के क्षेत्र शामिल हैं, खासकर पिछले बीस वर्षों में द्विपक्षीय रिश्तों में आया बदलाव अविश्वसनीय रहा है! वर्ष 2000 में बिल क्लिंटन 22 साल में भारत आने वाले पहले राष्ट्रपति बने; अब अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री विभिन्न स्थानों पर साल में कई बार मिलते हैं। ओबामा ऐसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जो 2015 में भारतीय गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि थे, वह अमेरिका के अकेले राष्ट्रपति थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल में दो बार भारत की यात्रा की थी। भारत-अमेरिका संबंध इतना व्यापक और बहुआयामी पहले कभी नहीं रहा।


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हालांकि सबकुछ हमेशा संतोषप्रद नहीं रहा है। भारत और अमेरिका के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए और द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व सामरिक मुद्दों पर कई गंभीर मतभेद भी रहे, उनमें से ज्यादातर बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, व्यक्तित्वों और शीर्ष नेताओं की प्राथमिकताओं के कारण। वर्ष 1849 में जब शांतिवादी और दार्शनिक डेविड हेनरी थोरो ने नागरिक अवज्ञा पर लेख लिखा था, तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि पचास वर्ष बाद मोहनदास करमचंद गांधी नाम का एक युवा भारतीय वकील दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय शासन की भेदभावपूर्ण नीतियों के खिलाफ सत्याग्रह के जरिये संघर्ष करेगा। गांधी ने नागरिक प्रतिरोध की वकालत की थी, जबकि थोरो नागरिक अवज्ञा के पक्ष में थे। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता डॉ. मार्टिन लूथर किंग ने महात्मा गांधी के अहिंसा के विचार से प्रेरणा ग्रहण की। ओबामा गांधी का काफी सम्मान करते हैं और मार्टिन लूथर किंग की तरह उनकी भी तस्वीर अपने भोजन कक्ष में लटकाकर रखते हैं। अनेक अमेरिकी विद्वान और टीएस इलियट समेत कई कवि भारतीय दर्शन से प्रभावित थे, खासकर भगवद्गीता से।
 
इस पृष्ठभूमि के साथ भारत और अमेरिका को बहुजातीय, बहुनस्लीय, बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक, बहुभाषी, बहुलतावादी, कानून के राज द्वारा शासित जीवंत लोकतंत्र के रूप में करीबी मित्र होना चाहिए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दा पर पाकिस्तान की ओर झुकाव, पाकिस्तान को सीईएनटीओ एवं सीईएटीओ का सदस्य बनाने से उपजे संदेह और अविश्वास ने दशकों से द्विपक्षीय रिश्तों को खराब किया। नतीजतन भारत को अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सोवियत संघ के पाले में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। दो महाशक्तियों के बीच चल रहे शीतयुद्ध से भारत को अलग रखने और भारत के राष्ट्रीय हित में दोनों से अधिकतम संभव लाभ प्राप्त करने के लिए गुटनिरपेक्षता नेहरू का एक समझदार और कल्पनाशील उपकरण था। हालांकि आइजनहावर (1959) का भारत में गर्मजोशी से स्वागत किया गया, लेकिन 1961 में जॉन एफ कैनेडी के साथ नेहरू की मुलाकात बेहद ठंडी रही।
 
यह रिश्ता 1971 में तब निचले स्तर पर पहुंच गया, जब तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने जनरल याह्या खान का पक्ष लिया और भारत को धमकी दी कि वह अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज देंगे, जबकि पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार कर रही थी। एक करोड़ शरणार्थियों की समस्या का सामना करते हुए भारत ने सोवियत संघ के साथ दोस्ती की संधि पर हस्ताक्षर किया और पाकिस्तानी सेना को समर्पण करने पर मजबूर किया और एक स्वतंत्र देश के रूप में बांग्लादेश के जन्म में मदद की। पर नहीं भूलना चाहिए कि 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान अमेरिका ने सैन्य सहायता के लिए नेहरू की अपील पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। अमेरिकी गेहूं की आपूर्ति से लाखों भारतीयों की जान बचाई गई। नेहरू के समय अमेरिका ने आईआईटी की स्थापना और हरित क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 सोवियत संघ के पतन और नरसिंहा राव व मनमोहन सिंह द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को मुक्त करने की घटना से पैदा राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक स्थिति ने दोनों देशों को अपने रिश्ते को फिर से सुधारने का अवसर दिया। हालांकि 1998 में वाजपेयी के कार्यकाल में परमाणु परीक्षण के चलते राष्ट्रपति क्लिंटन ने भारत पर गंभीर प्रतिबंध लगाया, लेकिन 2000 में उनकी भारत यात्रा के दौरान भारत-अमेरिकी रिश्ते को व्यापक एवं गहरा बनाने के लिए संस्थागत तंत्र विकसित किए गए। वाजपेयी ने उन्हें 'स्वाभाविक सहयोगी' बताया था। जॉर्ज बुश और मनमोहन सिंह को कठिन प्रयासों के कारण हुए असैन्य परमाणु समझौते (2005) ने भारत के परमाणु अलगाव को खत्म कर दिया, इसने एक नई रणनीतिक साझेदारी भी विकसित की।
 
ओबामा के कार्यकाल के दौरान इसे और मजबूत किया गया, क्योंकि चीन के बढ़ते राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य वर्चस्व, दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामकता और पड़ोसी देशों के साथ उसके क्षेत्रीय विवादों के कारण अमेरिका की चिंता बढ़ गई थी। एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र के लिए ओबामा-मोदी द्वारा (जनवरी, 2015 में) रणनीतिक दृष्टिकोण घोषित किया गया। ट्रंप व मोदी द्वारा एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए पुनर्निर्मित सामरिक दृष्टिकोण का लक्ष्य चीन को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने के लिए दबाव डालना है।
 
ऐसे समय में, जब ट्रंप का तूफान पश्चिमी गठबंधन का गंभीर उल्लंघन कर रहा है, अमेरिका को भारत से बेहतर मित्र नहीं मिल सकता। तमाम संकेतों के मुताबिक, अमेरिका सभी नवाचारों का मक्का और अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकी का जनक बना रहेगा। इसलिए भारत को अपने करोड़ों अधीर युवाओं की विस्फोटक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अमेरिका के साथ बेहतर संबंध बनाए रखना चाहिए। 

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