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कम टैक्स...कम बचत,खर्च ज्यादा
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बजट 2020
- फोटो : पीटीआई
नए दशक का पहला बजट भाषण लंबा और भावुकता से भरपूर था। बल्कि भाषण के शुरुआती पहले घंटे तक तो पता भी नहीं चल पा रहा था कि यह बजट भाषण है या धन्यवाद प्रस्ताव या 2014 में सत्ता में आई इस सरकार की उपलब्धियों के बारे में बताता चुनावी भाषण। इस बजट की खूबी यह है कि इसमें सब के लिए कुछ न कुछ है, और यह तीन चीजों पर केंद्रित है : ऊंची अभिलाषा करने वाला भारत, आर्थिक सुधार और देखभाल करने वाला मानवीय समाज बनने की कोशिश। बजट में 2.5 लाख की आय पर हस्तक्षेप करने का नतीजा यह है कि हमारे सामने अब आयकर की पांच प्रतिशत से 30 फीसदी तक कुल छह दरें हैं। एकमात्र राहत की बात यह है कि करदाता तीन स्लैबों वाली आयकर की पुरानी प्रणाली को भी जारी रख सकता है।
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करदाता अगर नए टैक्स स्लैब को अपनाना चाहे, तो इसमें पाने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन उसे कटौती और टैक्स छूटों को भूल जाना होगा। यानी नया टैक्स स्लैब अपनाने पर आयकर की धारा 80 सी के तहत आने वाली जीवन बीमा, पीपीएफ, पीएफ, एनपीएस, सुकन्या समृद्धि योजना, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना और पांच साल तक की फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी लोकप्रिय टैक्स छूटें खत्म हो जाएंगी। यह बड़ा फैसला है, जिसे करदाताओं पर छोड़ दिया गया है। नया टैक्स स्लैब बेशक करदाताओं के हाथ में अधिक पैसे देता है, लेकिन ऐसा वह करदाताओं को बचत के प्रति हतोत्साहित करके देता है। उम्मीद यही है कि करदाता नए टैक्स स्लैब को अपनाते हुए, जिसमें उन्हें कम टैक्स देंगे और ज्यादा पैसे भविष्य के लिए बचत या निवेश करने के बजाय खर्च करेंगे।
सामाजिक सुरक्षा के अभाव और रिटायरमेंट के बाद घटती आय की स्थितियों के बीच खर्च करने की बढ़ती प्रवृत्ति हमें बुढ़ापे में गरीबी वाले समाज की ओर ले जाएगी। पिछली सरकारों के फैसलों को देखते हुए ज्यादा संभावना यही है कि आयकर की यह नई वैकल्पिक व्यवस्था ही आगे अनिवार्य व्यवस्था बन जाए। इससे करदाता भविष्य की अनदेखी करने लगेंगे। ज्यादा संभावना यही है कि ऐसे में, लोग उपभोक्ता केंद्रित एक ऐसी अर्थव्यवस्था में प्रवेश करेंगे, जो उन्हें कम बचत और अधिक से अधिक कर्ज की ओर ले जाएगा। अगर आप पीएफ योगदान पर टैक्स कटौती का लाभ अब नहीं लेना चाहते, तो अधिक वेतन घर ले जाएंगे, लेकिन थोड़ा-थोड़ा करके जो पैसा आप रिटायरमेंट के लिए बचा रहे थे, वह पैसा अब 45 इंच स्क्रीन वाली नई टीवी पर खर्च होगा, जो आपकी जरूरत नहीं है। लाभांश वितरण कर (डीडीटी) चूंकि अब कंपनियों के बजाय लाभांश पाने वालों को चुकाना होगा ऐसे में, रिटायर्ड लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा।
बचत की नई अवधारणा रोजगार पर असर डालेगी। उन बीमा एजेंटों के पास क्या काम रह जाएगा, जो लोगों को टैक्स बचाने के लिए निवेश की पॉलिसियां बेचते हैं? ऐसा छोटी बचतों का भी यही हाल होगा। यह कदम वित्तीय सेवाएं देने वाले उद्योग को बुरी तरह प्रभावित करेगा। इसलिए करदाताओं को नए टैक्स स्लैब के तहत मिल रही ज्यादा छूट पर खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे भविष्य की बचत प्रभावित होने वाली है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)