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आत्मनिर्भरता है रास्ता

Thu, 31 May 2018 06:39 PM IST
शंकर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार
शंकर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार Updated Thu, 31 May 2018 06:39 PM IST
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Self sufficiency is way
कच्चे तेल के बढ़ते दाम
भारत का आर्थिक इतिहास खुलासा करता है कि अधिकांश संकट डॉलर की कमाई की तुलना में अधिक डॉलर खर्च करने से उपजे। 1957 और 1965 में विदेशी मुद्रा संकट माल और सूखा प्रेरित खाद्य आयात के कारण पैदा हुआ था। लेकिन उसके बाद तकरीबन हर दशक में 1974, 1979, 1982, 1991, 1997 और 2013 में अर्थव्यवस्था में गिरावट तेल की वजह से आई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और रुपये की गिरती कीमत की जुगलबंदी से उपजा संकट नाटकीय राजनीति के बीच में आया है। 

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कच्चे तेल के बढ़ते दाम और रुपये में गिरावट साफ देखी जा सकती है। डॉलर 68 रुपये के आसपास है और कच्चे तेल के दाम 75 से 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं, जबकि इस वर्ष का बजट पेश करते समय यह 65 डॉलर के करीब था। जमीनी स्तर पर देखें तो दाम लगातार सत्तर बार बढ़े, जिससे दिल्ली में पेट्रोल 78 रुपये और डीजल 69 रुपये प्रति लीटर हो गया, जबकि मुंबई में इनके दाम क्रमशः 86 रुपये और 73 रुपये है। लोगों की नाराजगी और प्रदर्शन के बाद सरकार ने उनकी तकलीफें दूर करने के लिए दीर्घकालीन योजना का वायदा किया है।

कुछ पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे में भी लाने की चर्चा चल रही है, ताकि केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए गए करों में कटौती की जा सके, सब्सिडी के नए प्रारूप पर बात चल रही है और राज्यों से कहा गया है कि वे वैट कम करें। यह सब निश्चित रूप से बराबर है और यह देखते हुए कि अगले चुनावों को चार महीने हैं, राहत देने में देरी होगी। 

सुर्खियों में नजर आ रहा लोगों का गुस्सा वास्तविक है। सबसे बड़ा मुद्दा है अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की कीमत। क्या 2.5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल के तीसरे बड़े आयातक को अपनी 82 फीसदी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहना चाहिए? कच्चे तेल के दाम में एक-एक डॉलर की वृद्धि से आयात बिल आठ सौ करोड़ रुपये बढ़ गया और यदि रुपया और गिरता है, तो यह बोझ भी बढ़ेगा। आयात खर्च का एक चौथाई कच्चे तेल के आयात के भुगतान पर जाता है। 

ऐसे हालात में घरेलू उत्पादन पर नजर डालना प्रासंगिक होगा। 2017-18 के दौरान भारत का तेल उत्पादन 3.56 करोड़ टन गिर गया, जोकि छह वर्ष में सबसे न्यूनतम है। 12 वीं योजना में 2012-2017 के दौरान कच्चे तेल के उत्पादन के लिए 21.6 करोड़ टन का लक्ष्य रखा गया था। वास्तविक उत्पादन 18.6 करोड़ टन हुआ। बात सिर्फ कच्चे तेल की नहीं है, गैस उत्पादन का लक्ष्य 341  एमएमएसीएमडी (मिलियन मिट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर पर डे) रखा गया था, जबकि उत्पादन हुआ 17.88 एमएमएससीएमडी, जो कि पिछली योजना से कम था। मंत्रालय ने संसद की स्थायी समिति को इसके लिए जो कारण बताए उनमें पुराने तेल क्षेत्र से लेकर मंजूरी मिलने में देरी शामिल थी। 

तेल उत्खनन के क्षेत्र में भारत कोई नया खिलाड़ी नहीं है। वैश्विक तेल उद्योग का जन्म 1859 में हुआ था। इसके आठ साल बाद ही असम के डिगबोई में तेल की खोज कर ली गई थी। डिगबोई में 1889 में तेल का खनन शुरू हुआ और 1901 में पहली रिफाइनरी की स्थापना की गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समाजवादी राज की मेहरबानी से तेल खनन और रिफाइनिंग का काम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तक सीमित था। बॉम्बे हाई की खोज के बाद एक नए राष्ट्र के लिए तेल उत्पादन में तेजी आई।

इस क्षेत्र के लिए कई कार्यक्रम विभिन्न नामों से चलाए गए, मसलन, एनईपीएल, एचईएलपी, एनएसपी, ओएएलपी, डीएसएफ आदि। यह भी घोषणा की गई है कि ऊर्जा दक्षता, मांग प्रतिस्थापन, जैविक ईंधन और शोधन प्रक्रिया में सुधार के जरिये 2022 तक आयात निर्भरता में दस फीसदी की कमी की जाएगी। लेकिन नई खोजों के बारे में क्या है? भारत के पास 31.4 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 26 तलछटी घाटियां हैं। सरकार के पास इनमें से आधे यानी 15 लाख वर्ग किलोमीटर के बारे में भूगर्भीय डाटा उपलब्ध नहीं है। इन क्षेत्रों के आकलन के लिए राष्ट्रीय भूकंपीय कार्यक्रम चल रहा है। जिस गति से यह कार्यक्रम चल रहा है और निवेश की जो स्थिति है, उसे देखते हुए 2022 तक की समयसीमा तक लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। 

क्या भारत अमेरिका से कोई सबक सीखेगा? 2001 के बाद से अमेरिकी सरकार ने ओपेक का प्रभुत्व समाप्त करने के लिए भू-राजनीति को आर्थिक नीति के खेल का हिस्सा बना दिया। अमेरिका ने शेल ऑयल खनन और गैस के उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया। इससे 2008 के 48 लाख बैरल रोजाना होने वाला उत्पादन 2017 में बढ़कर 93 लाख बैरल रोजाना हो गया। नतीजतन 2006 में कच्चे तेल का आयात कुल 130 लाख बैरल रोजाना से गिरकर रोजाना 30 लाख बैरल रह गया। इसी साल मार्च तक उत्पादन सौ लाख बैरल रोजाना हो चुका था, और 2023 तक अमेरिका सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन सकता है। हां, वहां की भौगोलिक स्थिति, पैमाना और भूगर्भीय स्थिति भिन्न है। हालांकि भूराजनीति और निर्भरता पर आधारित परिणाम किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए भिन्न नहीं हैं।

सितंबर, 2014 में कच्चे तेल के दाम जब सौ डॉलर प्रति बैरल को छू रहे थे, तब विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विशेषज्ञों की कमेटी ने डॉ विजय केलकर की अध्यक्षता में आयात निर्भरता को कम करने के लिए एक खाका प्रस्तुत किया था। 105 पेज की इस रिपोर्ट में 52 सिफारिशें की गई थीं, जिनमें तलछटी वाले क्षेत्रों का आकलन, डाटा का विश्लेषण, उत्खनन शुरू करना, कर सुधार, मंजूरी देने में तत्परता और अनुबंध की शुचिता शामिल थी। समिति का कहना था कि यदि ये कदम उठाए गए तो भारत का उत्पादन तीन गुना हो सकता है और आयात की निर्भरता 82 फीसदी से घटकर 39 फीसदी रह सकती है। यानी रास्ता आत्मनिर्भरता में निहित है। 
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