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दार्जिलिंग में शांति की तलाश
अवधेश कुमार
Updated Wed, 21 Jun 2017 07:15 PM IST
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अवधेश कुमार
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दार्जिलिंग इस समय हिंसा की चपेट में है। विमल गुरुंग के नेतृत्व वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने फिर से अलग गोरखालैंड की मांग कर दी है, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस आंदोलन को कुचलने पर अड़ी हुई हैं।
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ममता बनर्जी के काम करने का अपना तरीका है। केंद्र ने उनसे दार्जिलिंग पर रिपोर्ट मांगी, तो उन्होंने नहीं भेजी। उल्टे वह केंद्र से और सुरक्षा बलों की मांग कर रही हैं। देखा जाए तो यह टकराव प्रदेश सरकार एवं जीजेएम के बीच है। जीजेएम की गलती यह है कि उसने आंदोलन को अहिंसक बनाए नहीं रखा।
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वैसे तो आम आंदोलनों, हड़ताल, या बंद के प्रति पुलिस प्रशासन का रवैया विरोध का रहता है, मगर जब आप हिंसा करते हैं, तो फिर पुलिस और सुरक्षा बलों को आपके खिलाफ बल प्रयोग का आधार मिल जाता है। इस समय दार्जिलिंग में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां जीजेएम के अनिश्चितकालीन बंद को विफल करने के लिए जितना संभव है, बल प्रयोग कर रही हैं। वहां सेना तक उतर चुकी है। इसमें आगे क्या होगा कहना कठिन है। देश तो चाहेगा कि दार्जिलिंग जैसे पर्यटन स्थल पर शीघ्र शांति स्थापित हो, पर वहां स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है।
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दार्जिलिंग के हालात 1986-88 वाली स्थिति की याद दिला रहे हैं। उस समय गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के नेता सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखाओं ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन आरंभ किया था, जो पूरी तरह हिंसक हो गया।
28 महीने के उस हिंसक आंदोलन में लगभग 1200 लोग मारे गए तथा 10 हजार से ज्यादा घर जला दिए गए। अंत में सुभाष घीसिंग के साथ समझौता हुआ एवं गोरखा नेशनल हिल काउंसिल यानी गोरखा राष्ट्रीय पर्वतीय परिषद का गठन हुआ।
गोरखाओं ने इसे उत्साह से अपनाया, लेकिन धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि जिस स्वायत्तता की कल्पना से उन्होंने इस परिषद को स्वीकार किया, वह एक झुनझुना है। सुभाष घीसिंग को हर कार्य के लिए कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग के चक्कर लगाने पड़ते थे। धीरे-धीरे सुभाष घीसिंग की लोकप्रियता कम होती गई। पर्वतीय परिषद पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। हालत ऐसी हो गई कि घीसिंग के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे। विमल गुरुंग पहले घीसिंग के सहयोगी थे।
वे गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा में ही थे। उन्होंने अलग गोरखा जन मुक्ति मोर्चा का गठन कर विद्रोह कर दिया। परिणामतः सुभाष घीसिंग को क्षेत्र छोड़कर चला जाना पड़ा। आज घीसिंग को याद करने वाला कोई नहीं है।
अभी आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 10 वीं तक बांग्ला भाषा अनिवार्य कर दिए जाने से हुई। गोरखाओं ने इसका विरोध किया। उनका तर्क है कि नेपाली उनकी भाषा है और वहां के ज्यादातर लोग नेपाली बोलते हैं, इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। हालांकि ममता बनर्जी ने बाद में बयान दिया कि बांग्ला को अनिवार्य नहीं किया जा रहा है।
यह बात कहने में कोई आपत्ति नहीं है कि गोरखाओं के पहाड़ी क्षेत्र की हर स्तर पर अनदेखी हुई है।
हत्वपूर्ण पर्यटक क्षेत्र होते हुए भी गरीबी और बेरोजगारी वहां की कहानी अपने-आप कहती है। गोरखा अपनी सांस्कृतिक-जातीय एवं भाषायी अस्मिता को लेकर हमेशा आक्रामक रहे हैं। नेपाली को राष्ट्रीय भाषा सूची में शामिल करने के लिए वहां व्यापक आंदोलन हुए। नेपाली को तो आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषा सूची में दर्जा मिल गया, लेकिन उसके विकास के लिए राज्य सरकार को जो कुछ करना चाहिए, नहीं किया गया। सच यह है कि विकास एवं बहुआयामी अस्मिता दोनों स्तरों पर गोरखाओं का असंतोष बिल्कुल वाजिब है। हां, इसका निदान अलग गोरखालैंड राज्य होगा यह मानने में हर्ज है।