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गांधी की नजर से भी देखें वाराणसी को

Mon, 14 Apr 2014 01:00 AM IST
रामचंद्र गुहा/जाने-माने लेखक और इतिहासकार
रामचंद्र गुहा/जाने-माने लेखक और इतिहासकार Updated Mon, 14 Apr 2014 01:00 AM IST
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महात्मा गांधी 1903 में पहली दफा वाराणसी गए। हिंदू होने की वजह से स्वाभाविक था कि उनमें काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन की इच्छा हो। मगर उन्होंने वहां जो देखा, उससे वह बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुए। मक्खियों का झुंड और दुकानदारों व तीर्थयात्रियों का शोर उनके लिए बिल्कुल असहनीय था। वह लिखते हैं, 'जिस जगह पर लोग ध्यान और शांति के माहौल की उम्मीद करते हैं, वहां यह बिल्कुल नदारद है।' मंदिर पहुंचने पर गांधीजी का सामना सड़े हुए फूलों की दुर्गंध से हुआ। उन्होंने देखा कि लोग सिक्कों को अपनी भक्ति को जाहिर करने का जरिया बनाए हुए हैं, जिसकी वजह से न केवल संगमरमर के फर्श में दरारें दिखने लगी हैं, बल्कि इन सिक्कों पर धूल के जमने से वहां काफी गंदगी भी दिख रही थी। ईश्वर की तलाश्ा में वह मंदिर के पूरे परिसर में भटकते रहे, मगर उन्हें धूल और गंदगी के सिवाय कुछ नहीं दिखा।

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तेरह वर्षों के बाद गांधीजी का एक बार फिर से इस पवित्र नगरी में जाना हुआ। दरअसल 1916 के फरवरी महीने में ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ के उद्घाटन के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। दक्षिण अफ्रीका से वापसी के बाद भारत में यह उनकी पहली बड़ी सार्वजनिक उपस्थिति थी। हालांकि समारोह में गांधी अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण अतिथि थे। ज्यादा बड़े अतिथि वे राजा और महाराजा थे, जिनकी वित्तीय मदद से विश्वविद्यालय बनकर खड़ा हुआ था। इसके अलावा कांग्रेस के बड़े नेता भी वहां मौजूद थे। इन गणमान्यों की तुलना में गांधी कहीं ज्यादा अनजाना चेहरा थे। मगर जैसा कि उनका स्वभाव था, अपनी कम प्रसिद्धि और न्यून सामाजिक प्रतिष्ठात को कभी उन्होंने सत्य की अपनी अनवरत खोज के आड़े नहीं आने दिया।
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बोलने की बारी आने पर गांधी ने देश के संभ्रांतों पर गरीबों के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया। बीएचयू के उद्घाटन को उन्होंने एक उत्कृष्टथ कदम बताया। मगर उनकी चिंता समृद्ध अभिजात्यों की वहां मौजूदगी और लाखों गरीब भारतीयों की अनुपस्थिति को लेकर थी। गांधी ने इन अभिजात्य अतिथियों को संबोधित करते हुए कहा, 'भारत तब तक मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि आप लोग खुद को कीमती गहनों के भार से मुक्त कर देशवासियों के भरोसे की खातिर न्यासी की भूमिका नहीं निभाएं।' वह आगे कहते हैं, 'अगर हम अपने किसानों को उनकी मेहनत की उचित कीमत नहीं दिलाते हैं, तो हमारे लिए स्वशासन की बात करना बेमानी होगा। हमारी मुक्ति सिर्फ किसानों के हाथों हो सकती है। वकील, डॉक्टर या अमीर जमींदार यह काम नहीं कर सकते।'
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बीएचयू में अपने संबोधन से एक दिन पहले गांधी काशी विश्वनाथ मंदिर गए। मगर उस बार भी उन्होंने इसे पहले की तरह ही गंदा पाया। उन्होंने मंदिर की दशा की दिलचस्प तुलना भारतीय समाज से की। बीएचयू के अपने संबोधन में उन्होंने कहा, 'इस महान मंदिर में कोई अजनबी आए, तो हिंदुओं के बारे में उसकी क्या सोच होगी और तब जो वह हमारी निंदा करेगा, क्या वह जायज नहीं होगी?, क्या इस मंदिर की हालत हमारे चरित्र को प्रतिबिंबित नहीं करती? एक हिंदू होने के नाते, मैं जो महसूस करता हूं वही कह रहा हूं। अगर हमारे मंदिरों की  हालत आदर्श नहीं है, तो फिर अपने स्वशासन के मॉडल को हम कैसे गलतियों से बचा पाएंगे? जब अपनी खुशी से या बाध्य होकर अंग्रेज इस देश से चले जाएंगे, तो इसकी क्या गारंटी है कि हमारे मंदिर एकाएक पवित्रता, स्वच्छता और शांति के प्रतिरूप बन जाएंगे?'

गांधी की स्पष्टूवादिता को झेल पाना उनके श्रोताओं के लिए खासा मुश्किल था। बीएचयू की स्था पना में प्रमुख भूमिका रखने वाली ऐनी बेसेंट और मदन मोहन मालवीय ने उन्हें रोकने की कोशिश की। गहनों से लदे राजकुमारों ने गुस्से में वहां से निकल जाने का फैसला किया। इतना ही नहीं, दरभंगा के महाराज ने मीटिंग को तुरंत बरखास्त करने में तनिक भी देर नहीं लगाई।

तब से तकरीबन 100 वर्ष बीत चुके हैं। मगर गांधी के सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। अंग्रेजों को देश छोड़े अरसा बीत चुका है, लेकिन वाराणसी समेत देश के ज्यादातर मंदिरों की दुर्दशा आज भी किसी से छिपी नहीं है। राजा-महाराजाओं का दौर बेशक खत्म हो चुका हो, मगर आज उनकी जगह कॉरपोरेट महाराजाओं ने ले ली है, जो समाज के लिए नाम मात्र का योगदान देते हुए विलासिता से भरी जिंदगी बिताते हैं।

अपने राजनीतिक सफर के कई पड़ावों पर नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल ने मोहनदास करमचंद गांधी के नाम का उपयोग किया है। मुझे नहीं लगता कि इनमें से किसी ने भी 1916 में बनारस में दिए गए गांधी के भाषण को सुना होगा। जो शख्स इतनी संवेदनशीलता के साथ समाज की बुराइयों को दूर करने की बात करता है, उसे उपासना स्थालों की सफाई की बात पर नहीं हिचकना चाहिए। दूसरी ओर, अपने साधारण अतीत की अक्सर शेखी बघ्ाारने वाले शख्स को वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलनों में अपने अरबपति साथियों से यह कहने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि वे उन गरीब भारतवासियों को लेकर संवेदनशीलता बरतें, जो ऐसे सम्मेलनों में हिस्सा नहीं ले पाते हैं।


गांधी एक खराब वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। उनकी आवाज धीमी और अस्पष्टं थी। उनकी आदत थी कि कैमरा बेशक उनके चेहरे पर हो, वह सिर झुकाकर बुदबुदाने लगते थे। वह भले ही कभी गुर्राते नहीं दिखे, मगर खुद की कमियों का लगातार परीक्षण करते रहने का उनका एक अपना शांत ढंग था। वह खुद के लिए और समाज के लिए एक आईने के समान थे। गांधी के ठीक उलट मोदी और केजरीवाल, दोनों ही उत्कृष्टट वक्ता हैं। एक ताकतवर और वाक्पटु है, तो दूसरा नटखट और तीक्ष्णे बुद्धि वाला। इनमें आत्मविश्वास है और भाषण देने का कौशल भी। मगर वाराणसी या देश में कहीं भी इनसे उन सवालों को उठाने की उम्मीद की जाती है, जो न केवल देश के लिए, खुद उनके लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

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